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​ग्लोबल शिपिंग संकट… शेयर बाजार से भी ज्यादा जोखिम भरा है समंदर का कारोबार, हार्वर्ड प्रोफेसर ने बताई वजह

जब हम बाजार से कोई नया मोबाइल खरीदते हैं, घर में इस्तेमाल होने वाला तेल लाते हैं या फिर गाड़ियों में पेट्रोल डलवाते हैं, तो कभी ये नहीं सोचते कि ये चीजें हम तक कैसे पहुंचीं. हकीकत ये है कि दुनिया भर के कारोबार की असली रीढ़ समंदर में तैरने वाले मालवाहक जहाज हैं. जब सब कुछ ठीकठाक चलता रहता है, तो किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जाता. लेकिन जैसे ही किसी बंदरगाह पर कोई जहाज फंसता है, पूरी दुनिया में हाहाकार मच जाता है.

​ग्लोबल शिपिंग संकट… शेयर बाजार से भी ज्यादा जोखिम भरा है समंदर का कारोबार, हार्वर्ड प्रोफेसर ने बताई वजह

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर मिर्तो कालोप्सिदी का कहना है कि दुनिया का कम से कम 80 फीसदी व्यापार समंदर के रास्ते होता है. इसके बावजूद ये क्षेत्र लंबे समय से दुनिया की नजरों से छिपा रहा. प्रोफेसर कालोप्सिदी के शोध के मुताबिक, जब समंदर में माल ढुलाई का सिस्टम बिगड़ता है, तो इसका उतारचढ़ाव किसी भी शेयर बाजार से कहीं ज्यादा तेज और खतरनाक साबित होता है. समंदर में पैदा होने वाली एक छोटी सी रुकावट भी वैश्विक स्तर पर महंगाई की बड़ी आग भड़का देती है.

बंदरगाहों पर कतार, ऐसे पैदा होता है बड़ा संकट

समंदर के कारोबार को समझना हो तो इसे एक व्यस्त सुपरमार्केट के बिलिंग काउंटर की तरह देखा जा सकता है. जब सुपरमार्केट में अचानक भीड़ बढ़ जाती है, तो पैसे चुकाने वाली लाइन बहुत तेजी से लंबी होने लगती है. ठीक यही स्थिति बंदरगाहों पर बनती है.

सामान को एक देश से दूसरे देश भेजने के लिए कई चरणों से गुजरना पड़ता है. सबसे पहले निर्यातक को माल ढोने के लिए जहाज तलाशना होता है. इसके बाद वो जहाज बंदरगाह पर पहुंचता है, जहां माल लादने का काम होता है. हर बंदरगाह की अपनी एक तय क्षमता होती है. वहां क्रेन, मजदूर और मशीनें सीमित संख्या में काम करते हैं. अगर किसी बंदरगाह पर अचानक जहाजों की संख्या बढ़ जाए, तो कतार इतनी लंबी हो जाती है कि उसे संभालना बेहद मुश्किल हो जाता है.

जब कोई बंदरगाह पहले से ही जाम से जूझ रहा हो, तो मांग में मामूली सी बढ़ोतरी भी हालात को बेकाबू कर देती है. जहाजों को हफ्तों तक किनारे लगने का इंतजार करना पड़ता है. इससे पूरे नेटवर्क की क्षमता घट जाती है और माल पहुंचाने का खर्च कई गुना बढ़ जाता है.

लाल सागर, होर्मुज, युद्ध के तनाव से उछला किराया

दुनिया भर में फैले समुद्री रास्ते आपस में इतने जुड़े हैं कि किसी एक कोने में हुई हलचल पूरी दुनिया को हिला देती है. मौजूदा समय में लाल सागर का संकट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. हमलों के डर से जहाजों को स्वेज नहर का छोटा रास्ता छोड़कर अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ से होकर लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है.

इस लंबे रास्ते की वजह से जहाजों को सफर पूरा करने में बहुत ज्यादा वक्त लग रहा है. जिसके चलते जहाज कम फेरे लगा पा रहे हैं. इससे समंदर में जहाजों की उपलब्धता घट गई है और मालभाड़े में अचानक भारी उछाल आ गया है. ठीक ऐसा ही दबाव कोरोना महामारी के दौरान भी देखने को मिला था, जब पूरा सिस्टम बुरी तरह चरमरा गया था.

दूसरी तरफ, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव के कारण कच्चे तेल की आवाजाही वाले अहम बंदरगाहों पर सीधा असर पड़ रहा है. इसी तरह रूस और यूक्रेन के युद्ध ने अनाज की आपूर्ति को गहरा झटका दिया. यूक्रेन के प्रमुख बंदरगाह बंद होने के कारण जहाजों को रोमानिया के बंदरगाहों की तरफ मोड़ना पड़ा. रास्ता बदलने के बाद भी पूरे नेटवर्क की काम करने की क्षमता कम हो गई, जिससे रोजमर्रा के सामान की कीमतें तेजी से बढ़ गईं.

समंदर में 40 फीसदी खाली दौड़ते जहाजों का गणित

समंदर के कारोबार से जुड़ा एक चौंकाने वाला सच ये है कि लगभग 40 फीसदी समय जहाज पूरी तरह खाली सफर करते हैं. प्रोफेसर कालोप्सिदी के शोध में जहाजों की सैटेलाइट ट्रैकिंग के जरिए ये बड़ा खुलासा हुआ है.

पहली नजर में ये बात अजीब लग सकती है, लेकिन इसके पीछे दुनिया के व्यापार का भारी असंतुलन जिम्मेदार है. मिसाल के तौर पर, चीन से अमेरिका जाने वाले कंटेनर जहाज पूरी तरह सामान से भरे होते हैं. इनमें कपड़े, जूते और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स लदे होते हैं. लेकिन जब वही जहाज अमेरिका से चीन लौटते हैं, तो वो लगभग खाली होते हैं. अमेरिका से चीन को केवल कबाड़ धातु या घास जैसी सस्ती चीजें भेजी जाती हैं, जो बहुत कम जगह घेरती हैं.

कच्चे माल के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिलती है. तेजी से तरक्की कर रहे भारत और चीन को सड़कें, कारखाने और मकान बनाने के लिए भारी मात्रा में कच्चा माल चाहिए. दोनों देश कोयला, कच्चा लोहा और बॉक्साइट के सबसे बड़े खरीदार हैं. वहीं ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देश इनके बड़े निर्यातक हैं. जब कोई जहाज ऑस्ट्रेलिया से कच्चा माल लेकर भारत या चीन आता है, तो माल उतारने के बाद उसे फिर से नया माल उठाने के लिए खाली ही दूसरे बंदरगाह जाना पड़ता है. कच्चे तेल के बाजार में तो ये असंतुलन और भी ज्यादा है, क्योंकि बेचने वाले गिनेचुने देश हैं और खरीदने वाली पूरी दुनिया.

एशियाई देशों का बढ़ता दबदबा

जहाज बनाने के उद्योग का इतिहास भी समय के साथ पूरी तरह बदल चुका है. करीब 150 साल पहले ब्रिटेन और यूरोपीय देश जहाज निर्माण में सबसे आगे थे. विश्व युद्धों के दौरान अमेरिका इस क्षेत्र का बड़ा केंद्र बना, लेकिन बाद में वो इस दौड़ से बाहर हो गया.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान ने भारी उद्योगों को सहारा देकर दुनिया में पहला स्थान हासिल किया. बाद में दक्षिण कोरिया ने जापान को पछाड़ दिया और साल 2000 के बाद चीन ने मजबूत नीतियों के दम पर पूरी दुनिया पर कब्जा जमा लिया. प्रोफेसर कालोप्सिदी का मानना है कि आने वाले 10 सालों में यूरोप इस उद्योग से लगभग गायब हो जाएगा, जापान बहुत छोटा खिलाड़ी रह जाएगा, जबकि चीन शीर्ष पर बना रहेगा. इस रेस में भारत की बाजार हिस्सेदारी भी धीरेधीरे लगातार बढ़ रही है.

इसके साथ ही अब मौसम का बदलता मिजाज भी समंदर के कारोबार के लिए गंभीर खतरा बन चुका है. बारबार आने वाले भयंकर समुद्री तूफान जहाजों का रास्ता रोकते हैं और बंदरगाहों के काम को ठप कर देते हैं. पनामा नहर में सूखे की वजह से जहाजों की आवाजाही पर कड़ा पहरा लग चुका है. समंदर का जलस्तर बढ़ने से तटीय ढांचे को नुकसान का अंदेशा बढ़ रहा है. जहाजों से होने वाले प्रदूषण को घटाने के लिए सल्फर उत्सर्जन कम करने और नए ईंधन मानकों पर काम चल रहा है, जिससे भविष्य में माल ढुलाई का खर्च पूरी तरह बदल जाएगा.

समंदर में चलने वाले ये विशाल जहाज भले ही हमारी सीधी नजरों से ओझल रहते हों, लेकिन हमारी जेब पर पड़ने वाले असर को यही तय करते हैं. जब तक जहाजों के इस जटिल नेटवर्क और इसकी कमजोरियों को गंभीरता से नहीं समझा जाएगा, तब तक दुनिया को महंगाई के अचानक आने वाले झटकों से बचाना आसान नहीं होगा.

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