
लखनऊः भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज की सोच, संस्कृति और भविष्य की दिशा तय करने वाला तत्व है। महात्मा गांधी ने अपने लेखन और प्रार्थनासभाओं में बारबार इस बात पर बल दिया था कि अपनी भाषा और शिक्षा में आत्मविश्वास के बिना स्वराज अधूरा है। उनका स्पष्ट मानना था कि विदेशी भाषा के मोह से मुक्त हुए बिना देश की आत्मा को बचाना कठिन है। आज तकनीकी उत्कृष्टता का दौर है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इस तकनीकसमृद्ध समय में हमारी आत्मा यानी राजभाषा हिंदी की क्या स्थिति है? क्या हिंदी केवल भावनात्मक और साहित्यिक भाषा बनकर रह जाएगी या वह तकनीक की भाषा बनकर करोड़ों लोगों के सशक्तिकरण का माध्यम बनेगी? यह प्रश्न केवल भाषाई अस्मिता का नहीं, बल्कि डिजिटल लोकतंत्र और समावेशी विकास का भी है, खासकर तब जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और 5 जी जैसी तकनीक हमारे जीवन, संवाद और कार्यसंस्कृति का हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसी स्थिति में यह विचार आवश्यक हो जाता है कि बढ़ता तकनीकी हस्तक्षेप हिंदी के लिए खतरा है या इसमें हिंदी के वैश्विक विस्तार के अवसर छिपे हैं।
अंग्रेजी के वर्चस्व से बदलता तकनीकी परिदृश्य
यदि हम तकनीकी परिदृश्य पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि पिछले दो दशकों में तकनीक का विकास मुख्यतः अंग्रेजी भाषा के इर्दगिर्द हुआ, इसलिए तकनीकी दक्षता और अंग्रेजी दक्षता को एकदूसरे का पूरक माना जाने लगा, लेकिन अब यह तस्वीर बदल रही है। एक बड़े हिंदी भाषी वर्ग को अलग रखकर किसी भी तकनीक के भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने कहा था कि गूगल 100 से ज्यादा भारतीय भाषाओं में लिखित शब्दों और आवाज के जरिए इंटरनेट सर्च की सुविधा मुहैया कराने के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है और हर भारतीय तक उनकी ही भाषा में सस्ती सूचनाएं सुलभ कराना कंपनी का लक्ष्य है।
इंटरनेट विस्तार के साथ हिंदी की बढ़ती ताकत
यह बात अब सच होती दिख रही है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया और कांतार की ICUBE 2024 रिपोर्ट के अनुसार भारत में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 88.6 करोड़ को पार कर चुकी है, जिनमें 55 प्रतिशत से अधिक उपयोगकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों से हैं और भारतीय भाषाओं के उपयोगकर्ता बहुसंख्यक हैं। वृद्धि दर के मामले में भी हिंदी, अंग्रेजी की तुलना में कई गुना तेजी से बढ़ रही है। यही कारण है कि माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजन जैसी वैश्विक कंपनियों को अपना इंटरफेस, वॉइस असिस्टेंट और भुगतान प्रणाली हिंदी में लाना पड़ा। आज वॉयस असिस्टेंट हिंदी समझते हैं, अनुवाद तकनीक रीयल टाइम में काम करती है और एआई मॉडल हिंदी में कविता से लेकर कोड तक लिख रहे हैं।
एआई के सामने हिंदी डेटा की चुनौती
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में चैटजीपीटी, जेमिनि जैसे बड़े भाषा मॉडल छाए हुए हैं, क्योंकि इन्हें अंग्रेजी के खरबों शब्दों पर प्रशिक्षित किया गया है। इसके विपरीत इन मॉडलों के कुल प्रशिक्षण डेटा में हिंदी की हिस्सेदारी 0.1 प्रतिशत से भी कम है। यही कारण है कि जटिल विषयों पर एआई से हिंदी में मदद लेने पर उत्तर अक्सर अंग्रेजी अनुवाद जैसा लगता है, जिसमें हिंदी का सौंदर्य और सांस्कृतिक संदर्भ नदारद होता है।
तकनीकी शब्दावली में एकरूपता जरूरी
दूसरी बड़ी चुनौती तकनीकी शब्दावली के विकास और मानकीकरण की है। एल्गोरिदम, क्लाउड कंप्यूटिंग, ब्लॉकचेन जैसे शब्दों के लिए हिंदी में या तो मानक शब्द नहीं हैं, या जो हैं वे इतने क्लिष्ट हैं कि आम व्यक्ति से दूर हो जाते हैं।’संगणक’ से कंप्यूटर का बोध आम जन को नहीं होता, जबकि कंप्यूटर अब हिंदी का ही शब्द बन चुका है। हमें संस्कृतनिष्ठ कृत्रिम शब्दों और अंग्रेजी के अंधानुकरण के बीच संतुलन बनाना होगा। वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग सहित विभिन्न संस्थानों में एक ही शब्द के अलगअलग रूप मिलते हैं। यही स्थिति कीबोर्ड, फॉन्ट और यूनिकोड में भी है। इनमें एकरूपता के लिए ठोस प्रयास आवश्यक हैं।
गुणवत्तापूर्ण डिजिटल सामग्री की कमी
सफर अभी आसान नहीं है। उत्साहवर्धक आंकड़ों के साथ कई गंभीर चुनौतियां भी मुंह बाए खड़ी हैं। प्रमुख चुनौती है हिंदी में गुणवत्तापूर्ण डिजिटल सामग्री का अभाव। ज्ञानविज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, विधि और उच्च शिक्षा जैसे गंभीर विषयों पर मौलिक, प्रामाणिक और उत्कृष्ट सामग्री अभी भी कम है। किसी भी भाषा में एआई को उत्कृष्ट बनाने के लिए विशाल, स्वच्छ और विविध डेटा चाहिए। अंग्रेजी के पास इंटरनेट पर दशकों का संगठित डेटा है, जबकि हिंदी में प्रामाणिक और त्रुटिरहित डिजिटल डेटा अपेक्षाकृत बहुत कम है। अशुद्ध वर्तनी, अंग्रेजीमिश्रित हिंदी और बोलियों की विविधता के कारण मशीन के लिए शुद्ध हिंदी सीखना कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप हमें प्रायः अंग्रेजी से हुए अधूरे अनुवाद पर निर्भर रहना पड़ता है। हम अभी भी हिंग्लिश को ही डेटा मानकर मशीन को सिखा रहे हैं।
शिक्षा में अंग्रेजी का वर्चस्व
तीसरी चुनौती शिक्षा और रोजगार में अंग्रेजी के आधिपत्य की है। देश के श्रेष्ठ तकनीकी संस्थान और बहुराष्ट्रीय कंपनियां आज भी अंग्रेजी को वरीयता देते हैं। हालांकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा में तकनीकी शिक्षा पर जोर दिया गया है, जिसके बाद अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने कई इंजीनियरिंग कॉलेजों में हिंदी में बीटेक को मंजूरी दी है। जब छात्र थर्मोडायनामिक्स या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अपनी भाषा में समझेंगे, तो उसकी रचनात्मकता कई गुना बढ़ेगी।
मातृभाषा में शिक्षा से बढ़ेगा नवाचार
शिक्षा के लोकतंत्रीकरण का परिणाम है कि आज कोई भी विद्यार्थी अपने फोन पर हिंदी में आवश्यक सामग्री देख, सुन और पढ़ सकता है। ‘स्वयं’ और ‘दीक्षा’ जैसे प्लेटफॉर्म पर हजारों पाठ्यक्रम हिंदी में उपलब्ध हैं। जब छात्र मातृभाषा में जटिल विषय समझेंगे तो वह केवल रटेंगे नहीं, बल्कि नवाचार की ओर प्रेरित होंगे।
भाषा से बनती डिजिटल सेवाएं
डिजिटल इंडिया अब नारा नहीं, वास्तविकता है। इसका अर्थ तभी सार्थक है, जब डिजिटल सेवाएं जनता की भाषा में हों। यूपीआई, भीम, जनधन, उमंग जैसे ऐप्स का हिंदी में होना एक क्रांति है। अब किसान अपनी फसल का बीमा और मजदूर अपना ईश्रम कार्ड हिंदी में अपने फोन पर बना सकता है। तकनीक ने सरकार और जनता के बीच भाषा की खाई को पाट दिया है।
तकनीकी भाषा बनाने की रणनीति
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र में कहा था, ‘हिंदी एक जनभाषा है।’ इसे जनजन की तकनीकी भाषा बनाना होगा। इसके लिए तीन रणनीतियों पर काम करना होगा।
उच्चगुणवत्ता के साथ डिजिटल भंडार
पहला, हिंदी का उच्चगुणवत्ता वाला डिजिटल भंडार बनाना। सरकार, विश्वविद्यालयों और तकनीकी कंपनियों को मिलकर विज्ञान, तकनीक और समसामयिक विषयों पर मौलिक हिंदी लेखन को प्रोत्साहित करना होगा, ताकि एआई मॉडल कचरा अनुवाद नहीं, बल्कि शुद्ध हिंदी सीखें।
डिजिटल बाजार ने खोले नए अवसर
सुखद यह है कि हिंदी में चुनौतियों के साथ अवसर भी बढ़े हैं। विराट डिजिटल बाजार और कंटेंट क्रांति ने हिंदी को बाजार की जरूरत बना दिया है। यूट्यूब पर हिंदी चैनलों की लोकप्रियता और हिंदी क्रिएटर्स की आय इसके बढ़ते वर्चस्व की कहानी कहती है। हिंदी में कंटेंट क्रिएशन एक नए करियर के रूप में उभरा है। कई देसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने साबित किया है कि हिंदी के साथ अरबों का व्यापार संभव है। इसी कारण कंटेंट क्रिएशन, लोकलाइजेशन इंजीनियरिंग, ट्रांसलेशन टेक्नोलॉजी, वॉयसओवर और हिंदी एआई ट्रेनर जैसे हजारों नए रोजगार पैदा हो रहे हैं। कई स्टार्टअप केवल हिंदी इंटरनेट यूजर्स के लिए प्रोडक्ट बना रहे हैं। हिंदी अब केवल सरकारी नौकरियों की नहीं, बल्कि स्टार्टअप और उद्यमिता की भाषा बन रही है।
भाषिणी से मजबूत होगी भाषाई पहुंच
सरकार भी तकनीक को हिंदी से जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। भारत सरकार की ‘भाषिणी परियोजना’ इस दिशा में युगांतरकारी कदम है, जिसका लक्ष्य हर भारतीय को अपनी भाषा में इंटरनेट से जोड़ना और भाषा की दीवार को गिराकर सभी भारतीय भाषाओं के बीच रीयलटाइम अनुवाद सुलभ कराना है। राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन के तहत विज्ञान और इंजीनियरिंग की उच्चस्तरीय पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया जा रहा है, जो भविष्य के प्रति आशान्वित करता है।
तकनीकी शिक्षा में हिंदी का विस्तार
दूसरा, तकनीकी शिक्षा में हिंदी को अपनाना। हिंदी में कोडिंग, रोबोटिक्स और एआई की शिक्षा के लिए सरल टूल बनाने होंगे। इनस्क्रिप्ट जैसे मानक कीबोर्ड को स्कूल स्तर से ही सिखाना होगा। जब बच्चा ‘क’ के लिए ‘k’ नहीं, बल्कि सीधे ‘क’ दबाकर लिखेगा, तभी आत्मविश्वास आएगा।
युवाओं को हिंदी और तकनीक का समझाना होगा संबंध
तीसरा, युवाओं को यह समझाना कि हिंदी और तकनीक विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। अंग्रेजी सीखना आवश्यक है, लेकिन हिंदी में सोचना और उसे नवाचार से समृद्ध करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भविष्य की तकनीक की भाषा बने हिंदी
निस्संदेह, तकनीकी उत्कृष्टता के इस दौर में हिंदी चौराहे पर नहीं, बल्कि एक नई छलांग के मुहाने पर खड़ी है। चुनौतियां वास्तविक हैं, पर अवसर उनसे बड़े हैं। इतिहास में पहली बार अर्थव्यवस्था, तकनीक और जनसंख्या तीनों हिंदी के पक्ष में हैं। जरूरत है दृष्टिकोण बदलने की। हमें हिंदी को अतीत की नहीं, भविष्य की तकनीक की भाषा के रूप में देखना होगा। यदि हम भाषा को तकनीक से जोड़ने में सफल रहे, तो वह दिन दूर नहीं, जब हिंदी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक डिजिटल जगत में भी प्रमुख शक्ति बनकर उभरेगी और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के मंत्र को तकनीक के माध्यम से साकार करेगी।
डॉ. अवनीश यादव , प्रांतीय शिक्षा सेवा संवर्ग, उप्र
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