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​जेनस देवता से जनवरी, जूलियस सीजर से जुलाई… कैलेंडर के महीनों को कैसे मिले नाम?

कैलेंडर तो देखते होंगे, लेकिन कभी सोचा है कि इसमें जनवरी से दिसंबर तक दिए महीनों के नाम कहां से आए. इनके नाम रोमन देवताओं, सम्राटों और गिनती से निकले हैं. इनमें से कुछ नाम तो अपनी जगह पर अब सही भी नहीं बैठते. आइए इसकी पूरी कहानी जानते हैं. आज जो कैलेंडर इस्तेमाल हो रहा है वो प्राचीन रोम से आया है.

​जेनस देवता से जनवरी, जूलियस सीजर से जुलाई… कैलेंडर के महीनों को कैसे मिले नाम?

परंपरा के अनुसार रोम के पहले राजा रोमुलस ने लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व में 10 महीनों वाला कैलेंडर बनाया था. इसमें साल की शुरुआत मार्च से होती थी और कुल 304 दिन होते थे. सर्दियों के लगभग 60 दिन किसी महीने में गिने ही नहीं जाते थे. बाद में राजा नूमा पोम्पिलियस ने जनवरी और फरवरी जोड़े, ताकि साल चंद्र चक्र के करीब आ सके. यहीं से 12 महीनों की नींव पड़ी.

जनवरी: दो चेहरों वाले देवता का महीना

जनवरी का नाम रोमन देवता जेनस पर पड़ा. जेनस दरवाजों, फाटकों और नई शुरुआत के देवता थे. उनके दो चेहरे दिखाए जाते थे, एक अतीत की ओर और दूसरा भविष्य की ओर. साल के दरवाज़े पर खड़े इस महीने के लिए इससे बेहतर प्रतीक क्या होता. लैटिन में इसे Ianuarius कहा गया, जो आगे चलकर जनवरी बना. 45 ईसा पूर्व में जूलियस सीजर के कैलेंडर के बाद 1 जनवरी को साल की शुरुआत माना जाने लगा.

फरवरी: शुद्धिकरण का महीना

फरवरी का नाम लैटिन शब्द फेब्रुआ से आया, जिसका मतलब है शुद्धिकरण; रोम में इस महीने फेब्रुआलिया नाम का त्योहार मनाया जाता था, जिसमें लोग पाप और अशुद्धियां धोने की रस्में करते थे. रोमन साल का आखिरी महीना होने के कारण इसे पुराने साल की सफाई का समय माना जाता था. इसी वजह से अतिरिक्त दिन, यानी लीप ईयर वाला दिन, आज भी इसी महीने में जुड़ता है.

जेनस देवता से जनवरी नाम और जूलियस सीजर से जुलाई नाम मिला.

मार्च: युद्ध के देवता का महीना

मार्च का नाम रोमन युद्धदेवता मार्स पर रखा गया. पुराने रोमन कैलेंडर में यह साल का पहला महीना था. सर्दी खत्म होने पर सैन्य अभियान इसी समय शुरू होते थे, इसलिए युद्ध के देवता का महीना सबसे पहले आया. इंग्लैंड में 1752 तक कानूनी नया साल मार्च के आखिर में ही शुरू होता था.

अप्रैल: कलियों के खिलने का महीना

अप्रैल के नाम को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं हैं. एक मत के अनुसार यह लैटिन शब्द aperire से बना है, जिसका अर्थ है खोलना. वसंत में कलियां और फूल खिलते हैं, इसलिए यह नाम सटीक बैठता है. दूसरा मत इसे यूनानी देवी एफ्रोडाइट से जोड़ता है, जिन्हें रोम में वीनस कहा गया. पक्का प्रमाण किसी के पास नहीं है.

उर्वरता की देवी माया.

मई: उर्वरता की देवी

मई का नाम आमतौर पर माया से जोड़ा जाता है, जो वृद्धि और उर्वरता की रोमन देवी थीं. वसंत की फसलें इसी समय बढ़ती हैं, इसलिए कृषि प्रधान रोम में यह देवी बहुत पूजनीय थीं. कुछ विद्वान इसे लैटिन शब्द maiores से भी जोड़ते हैं.

जून: देवताओं की रानी

जून का नाम जूनो पर पड़ा, जो रोमन देवताओं के राजा जुपिटर की पत्नी और विवाह व परिवार की देवी थीं. यही कारण है कि आज भी जून को शादियों के लिए शुभ माना जाने की धारणा कई पश्चिमी संस्कृतियों में है. एक दूसरी व्याख्या इसे Iuniores से जोड़ती है, जैसे मई को बुज़ुर्गों से.

जुलाई: जूलियस सीजर के नाम पर

जुलाई का पुराना नाम क्विंटिलिस था, यानी पांचवां महीना, क्योंकि गिनती मार्च से शुरू होती थी. 44 ईसा पूर्व में सीजर की हत्या के बाद रोमन सीनेट ने इस महीने का नाम बदलकर उनके सम्मान में Julius कर दिया. सीजर का जन्म इसी महीने में हुआ था. उन्होंने ही 45 ईसा पूर्व में जूलियन कैलेंडर लागू किया था, जो लगभग 1600 साल तक चला.

जूलियस सीजर.

अगस्त: पहले रोमन सम्राट का महीना

अगस्त का पुराना नाम सेक्स्टिलिस था, यानी छठा महीना. लगभग 8 ईसा पूर्व में इसका नाम पहले रोमन सम्राट ऑगस्टस के नाम पर रखा गया, क्योंकि उनके जीवन की कई बड़ी जीतें इसी महीने में हुई थीं.

एक लोकप्रिय कहानी कहती है कि जुलाई से बराबरी करने के लिए अगस्त को 31 दिन दिए गए और इसके लिए फरवरी से एक दिन छीन लिया गया. लेकिन आधुनिक इतिहासकार इस कहानी को संदेह से देखते हैं और इसे बाद की गढ़ी हुई बात मानते हैं.

सितंबर से दिसंबर: गिनती वाले नाम

आखिरी चार महीनों के नाम सीधे संख्याओं से बने हैं:

  • सितंबर: लैटिन Septem यानी सात
  • अक्टूबर: Octo यानी आठ
  • नवंबर: Novem यानी नौ
  • दिसंबर: Decem यानी दस

जब साल मार्च से शुरू होता था, तो ये चारों सचमुच 7वें, 8वें, 9वें और 10वें महीने थे, लेकिन जनवरी और फरवरी जुड़ने और साल की शुरुआत जनवरी से होने के बाद ये खिसककर 9वें से 12वें महीने बन गए. नाम पुराने रह गए और गिनती बदल गई. यह कैलेंडर की सबसे दिलचस्प विसंगतियों में से एक है.

ग्रेगोरियन कैलेंडर: आज का रूप

जूलियन कैलेंडर में साल की लंबाई थोड़ी ज़्यादा थी, जिससे सदियों में तारीखें खिसकती गईं. इसे ठीक करने के लिए 1582 में पोप ग्रेगरी तेरहवें ने ग्रेगोरियन कैलेंडर शुरू किया, जिसमें लीप ईयर के नियम सुधारे गए. महीनों के नाम वही रहे. ब्रिटेन और उसके उपनिवेशों ने इसे 1752 में अपनाया, इसीलिए भारत में भी अंग्रेजी राज के दौरान यही कैलेंडर प्रचलित हुआ.

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