Meerut blue drum case: मेरठ के सौरभ राजपूत की जघन्य हत्या में आरोपी उसकी पत्नी मुस्कान और प्रेमी साहिल के मसले की सुनवाई पूरी हो गई है. आरोप है कि इन दोनों ने मिलकर न केवल सौरभ की निर्मम हत्या की बल्कि शव छिपाने के इरादे से नीले ड्रम में भरकर उसमें सीमेंट भी डाल दिया. मेरठ जिला जज की अदालत 30 सितंबर यानी आज अपना फैसला सुनाएगी. इस बहुचर्चित हत्याकांड पर देश भर की निगाहें हैं.

लोगों के मन में सवाल हैं. एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है, जिन्होंने हत्या के आरोपियों की सजा खुद से ही तय कर दी है. लेकिन कानून और अदालतें जन भावनाओं से फैसले नहीं लेती. अदालत साक्ष्य, तर्क, दलीलों के आधार पर फैसले सुनाती हैं. इस मसले में क्या फैसला आएगा, यह आज तय हो जाएगा. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि अदालतें कैसे तय करती हैं फांसी या उम्र कैद? क्या होता है रेयरेस्ट ऑफ रेयर?
आरोप और दोष सिद्धि में क्या है फर्क?
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे कहते हैं कि किसी व्यक्ति पर हत्या का आरोप लगना और अदालत से दोषी ठहराया जाना दो अलगअलग बातें हैं. पुलिस जांच में जुटाए गए बयान, फॉरेंसिक रिपोर्ट, बरामदगी और अन्य सामग्री अदालत में पेश करती है. बचाव पक्ष को इन सबूतों पर सवाल उठाने और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है.
आपराधिक मुकदमे में अभियोजन को आरोप संदेह से परे साबित करने होते हैं. केवल किसी का कबूलनामा, मीडिया में चली कहानी या लोगों का गुस्सा अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है. अदालत पूरे साक्ष्य और गवाहियों को परखकर अपना फैसला सुनाती है.
हत्यारोपी मुस्कान और साहिल.
हत्या में कौन सा कानून लागू होता है और कैसे?
देश में 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता, 2023 लागू हुई. हत्या के लिए इसकी धारा 103 में सजा का प्रावधान है. इसके तहत दोष सिद्ध होने पर मृत्युदंड या आजीवन कारावास और जुर्माना हो सकता है. किसी मामले में कौन सा कानून लागू होगा, यह घटना की तारीख और लागू संक्रमण संबंधी नियमों पर निर्भर करता है.
सौरभ राजपूत की हत्या पिछले साल हुई थी. इसलिए सामान्य तौर पर नए कानून के प्रावधान लागू होंगे. यदि किसी मामले में अभियोजन का आरोप हो कि कई लोगों ने साझा इरादे से अपराध किया, तो अदालत हर व्यक्ति की भूमिका और साझा इरादे के सबूत को अलग से देखती है. एक आरोपी की भूमिका दूसरे की भूमिका का स्वतः प्रमाण नहीं बनती.
हत्या के हर मामले में फांसी नहीं दी जाती.
सामान्य सजा नहीं है फांसी?
भारत में हत्या के हर मामले में फांसी नहीं दी जाती. सुप्रीम कोर्ट ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में कहा कि मृत्युदंड केवल रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में दिया जाना चाहिए. इसका मतलब है कि अदालत को यह देखना होगा कि क्या अपराध इतना असाधारण है कि आजीवन कारावास का विकल्प पर्याप्त नहीं होगा. सिर्फ अपराध का वीभत्स होना या देशभर में चर्चा होना फांसी तय करने के लिए काफी नहीं है. अदालत को हर मुकदमे के तथ्य और दोषी व्यक्ति की स्थिति पर विचार करना होता है. अंतिम सजा न्यायिक विवेक और कानून के आधार पर तय होती है, जनभावना के दबाव पर नहीं.
क्या है रेयरेस्ट ऑफ रेयर?
रेयरेस्ट ऑफ रेयर ऐसे मामलों को माना जाता है जिसमें अदालत को लगे कि उपलब्ध विकल्पों में आजीवन कारावास न्याय के उद्देश्य को पूरा नहीं करता. यह कोई तय सूची या गणित का फार्मूला नहीं है. अदालत अपराध की प्रकृति, उसे करने का तरीका, मकसद, पीड़ित पर असर और अभियुक्त की व्यक्तिगत परिस्थितियों को साथ रखकर देखती है. सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर अपराधों को परखने के लिए अपने कई फैसलों में व्यापक पहलुओं की चर्चा की है. इनमें अपराध करने का तरीका, उसका मकसद, अपराध की गंभीरता, पीड़ित की स्थिति और अपराध का सामाजिक असर शामिल हैं. ये पहलू अपने आप में फांसी तय नहीं करते. अदालत को समग्र तस्वीर देखनी होती है.
आमतौर पर मुकदमे में पहले यह तय होता है कि आरोप साबित हुए या नहीं.
कौन से कारण फांसी के पक्ष में और कौन से खिलाफ देखे जाते हैं?
सजा सुनाते समय अदालत अपराध से जुड़े गंभीर कारणों पर विचार कर सकती है. उदाहरण के लिए, अपराध की योजना, हिंसा की प्रकृति या सबूतों से अपराध छिपाने की कोशिश. लेकिन अदालत को बचाव पक्ष की ओर से रखे गए कम करने वाले कारण भी सुनने होते हैं. इनमें उम्र, मानसिक और सामाजिक पृष्ठभूमि, सुधार की संभावना और अपराध में व्यक्ति की वास्तविक भूमिका जैसे पहलू शामिल हो सकते हैं. अदालत को यह भी देखना होता है कि दोषी व्यक्ति के सुधार और पुनर्वास की संभावना खत्म हो चुकी है या नहीं. किसी एक कारण को अलग से निर्णायक नहीं माना जाता.
पहले दोष तय होता है, फिर सजा
आमतौर पर मुकदमे में पहले यह तय होता है कि आरोप साबित हुए या नहीं. दोषसिद्धि के बाद सजा पर अलग से सुनवाई होती है. इस चरण में अभियोजन और बचाव पक्ष सजा की मात्रा के बारे में अपनी दलीलें रखते हैं. यदि अदालत मौत की सजा देती है, तो प्रक्रिया यहीं समाप्त नहीं होती. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत सेशंस कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सजा हाई कोर्ट की पुष्टि के बिना लागू नहीं की जा सकती. हाई कोर्ट मामले के रिकॉर्ड और सजा की वैधता की जांच करता है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील और कानून के अनुसार दया याचिका के रास्ते भी उपलब्ध हैं. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि सत्र अदालत ने फांसी की सजा सुनाई और व्यक्ति को फांसी पर लटका दिया गया.
सौरभ मामले में अदालत क्या देख सकती है?
इस मामले में अनेक मीडिया रिपोर्ट्स में गवाहों, कथित बरामदगी और फॉरेंसिक साक्ष्यों का उल्लेख किया गया है. अदालत को यह देखना होगा कि हर सबूत विश्वसनीय है या नहीं और क्या सभी परिस्थितियां एकदूसरे से जुड़कर आरोप साबित करती हैं. यदि मामला मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित है, तो उन परिस्थितियों की कड़ी का पूरा और भरोसेमंद होना विशेष महत्व रखता है. अदालत को मुस्कान और साहिल की कथित भूमिकाओं का अलगअलग मूल्यांकन करना होगा. यह भी जांचना होगा कि अभियोजन के दावे सबूतों से साबित हुए या नहीं. दोष सिद्धि होने पर भी सजा का फैसला अपने आप फांसी नहीं बन जाता. अदालत को आजीवन कारावास सहित उपलब्ध विकल्पों पर विचार करना होगा.
एडवोकेट अश्विनी दुबे के मुताबिक फांसी और उम्रकैद के बीच चुनाव अदालत का गंभीर और सावधानी से लिया गया फैसला होता है. रेयरेस्ट ऑफ रेयर का अर्थ केवल जघन्य अपराध नहीं, बल्कि ऐसा असाधारण मामला है जिसमें अदालत सभी पक्षों और परिस्थितियों को देखकर मृत्युदंड को आवश्यक माने. मेरठ के सौरभ हत्याकांड में भी अंतिम निष्कर्ष अदालत के फैसले और उसके कारणों से ही निकलेगा. आरोप, जांच और जनचर्चा न्यायिक निर्णय का विकल्प नहीं हैं.



