वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक से हीरे बनाए हैं. इसके लिए लेजर का इस्तेमाल किया है. यह प्रयोग जर्मनी की रिसर्च लैब हेल्महोल्ट्ज़सेंट्रम ड्रेसडेनरोसेनडॉर्फ और रोस्टॉक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने किया है. इस प्रयोग को चेक गणराज्य की राजधानी प्राग के पास मौजूद एक्सट्रीम लाइट इंफ्रास्ट्रक्चर नाम की लेजर लैब में किया गया है. रिसर्च की शुरुआत एक दिलचस्प सवाल से हुई. नेपच्यून और यूरेनस जैसे ग्रहों के अंदर क्या होता है? वहां तापमान कई हजार डिग्री सेल्सियस होता है और दबाव पृथ्वी के वायुमंडलीय दबाव से लाखों गुना ज्यादा होता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इतने भयानक दबाव और गर्मी में कार्बन हीरे में बदल जाता है.

इसी स्थिति को प्रयोगशाला में दोहराने के लिए वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक पर ताकतवर लेजर का इस्तेमाल किया. प्लास्टिक में कार्बन होता है, इसलिए उम्मीद थी कि हीरा बनेगा. हीरा बना भी, लेकिन शुरुआत में वैज्ञानिक उसे सिर्फ बहुत कम समय के लिए ही देख पाते थे. असली चुनौती यह थी पूरी प्रक्रिया के दौरान इन हीरों को बचाकर हाथ में कैसे लिया जाए. जानें इसका पूरा .
हीरा बनने की प्रक्रिया को ऐसे समझें
Scitechdaily की रिपोर्ट के मुताबिक, हीरा बनने की प्रक्रिया को कुछ चरणों में समझी जा सकती है.
- प्लास्टिक की पतली फिल्म: वैज्ञानिकों ने PET प्लास्टिक की एक बेहद पतली फिल्म ली. इसकी मोटाई करीब 100 माइक्रोमीटर थी. PET वही प्लास्टिक है, जिससे आमतौर पर पानी की बोतलें बनती हैं.
- लेजर का तेज वार: प्लास्टिक की फिल्म पर पावरफुल लेजर डाली गई, यह लेजर एक मिनट में तीन बार चलती थी.
- शॉक वेव:हर लेजर पल्स से प्लास्टिक के अंदर एक शॉक वेव यानी झटके की लहर पैदा हुई. इसने प्लास्टिक में एक दबाव पैदा किया. यह दबाव लगभग 100 गीगापास्कल था, यानी करीब 14.5 करोड़ पाउंड प्रति वर्ग इंच.
- कार्बन बना हीरा: इतने दबाव और गर्मी में प्लास्टिक के कार्बन परमाणु नए ढंग से जुड़ गए और नैनोडायमंड बन गए. वैज्ञानिकों ने खुद माना कि हीरे बनने की रफ्तार ने उन्हें हैरान कर दिया.
वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक पर लेजर का प्रयोग किया. फोटो: AI Generated
सबसे बड़ी चुनौती थी हीरों को बचाना
हीरे बनाना एक बात है लेकिन उन्हें सहीसलामत बचा पाना दूसरी. जब शॉक वेव प्लास्टिक के दूसरे सिरे से निकलकर निर्वात में जाती है, तो वह हीरों को करीब 10 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से आगे फेंकती है. यह रफ्तार 22,000 मील प्रति घंटे से भी ज्यादा है, जो किसी उल्का पिंड के टकराने जैसी है.
इतनी तेज रफ्तार से आते हीरों को रोकने के लिए बहुत नर्म चीज चाहिए थी. वैज्ञानिकों ने इसके लिए पानी में घुलने वाली एक खास आयनिक जेल इस्तेमाल की, जो वैक्यूम में भी काम करती है. इसे आप ऐसे समझ सकते हैं, जैसे तेज गेंद को पकड़ने के लिए कोई मुलायम गद्दा लगा दिया जाए. हीरे इस जेल में आकर धंस गए और सुरक्षित बच गए.
वैज्ञानिकों ने नैनोडायमंड बनाए हैं. फोटो: Pexels
कितने हीरे बने और कितने छोटे?
आंकड़े चौंकाने वाले रहे. हर लेजर शॉट से लगभग 10 ट्रिलियन हीरे बने. हर हीरे का औसत आकार सिर्फ 3 नैनोमीटर था, यानी एक मीटर का तीन अरबवां हिस्सा. एक हीरे में करीब 3,000 कार्बन परमाणु थे.कुछ सौ माइक्रोग्राम हीरे जमा करने में करीब 100 शॉट लगे.
इन हीरों की जांच रोस्टॉक यूनिवर्सिटी के ELMIMV इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से की गई, जो अलगअलग परमाणुओं तक को देख सकता है. शोध के मुख्य लेखक बेन ह्यूजर का कहना है, इन शुद्ध हीरों को सीधे देखना उनके लिए एक खास पल था, जिसके लिए वे सालों से मेहनत कर रहे थेऋ
यह तरीका खास क्यों है?
अभी तक नैनोडायमंड बनाने का आम तरीका विस्फोट है, लेकिन उस तरीके में हीरों का आकार एक जैसा नहीं रहता और शुद्धता भी कम होती है; लेजर वाले तरीके में तीन बड़े फायदे हैं.
1 हीरे बहुत शुद्ध बनते हैं,
2 आकार बेहद छोटा होता है।
3 सभी कणों का साइज़ लगभग बराबर रहता है.
नैनोडायमंड सख्त, स्थिर और गर्मी सहने वाले होते हैं. फोटो: AI Generated
इन नन्हे हीरों का क्या इस्तेमाल होगा?
नैनोडायमंड सख्त, स्थिर और गर्मी सहने वाले होते हैं. अभी इनका इस्तेमाल घिसाई और पॉलिश करने वाली चीजों में होता है, लेकिन छोटे, साफ और एक समान कण कई नई जगहों पर काम आ सकते हैं.
- चिकित्सा: स्कैन में कंट्रास्ट एजेंट के तौर पर, खासकर MRI में.
- क्वांटम सेंसर: बेहद संवेदनशील मापन उपकरणों में.
- ऊर्जा: हीरे जितने छोटे होंगे, उतना ही उनका कुल सतही क्षेत्रफल बढ़ेगा. इससे वे सूरज की रोशनी से CO2 को तोड़ने जैसी प्रक्रियाओं में बेहतर उत्प्रेरक बन सकते हैं.
प्लास्टिक से शुरू करने का एक और फायदा यह है कि इसमें दूसरे तत्वों के परमाणु मिलाना आसान हो जाता है. इससे हीरों को जरूरत के हिसाब से ढाला जा सकता है.



