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​Swachh Space Mission: अंतरिक्ष का कचरा कैसे साफ करेगा भारत, क्या है स्वच्छ स्पेस मिशन 2030?

भारत सरकार ने स्वच्छ स्पेस मिशन की शुरुआत की है. इसके तहत साल 2030 तक स्पेस में बड़ी मात्रा में उपलब्ध कचरा साफ किये जाने या मलबा मुक्त करने का लक्ष्य है. इस पहल को डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन कहा जाता है. इसकी घोषणा साल 2024 में हुई थी. इसका मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष के पुराने कचरे को एक बार में साफ कर देना नहीं, बल्कि भारतीय सरकारी और निजी अंतरिक्ष गतिविधियों से नया मलबा बनने से रोकना भी है. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि आखिर क्या है भारत स्वच्छ स्पेस मिशन? अंतरिक्ष में कितना कचरा मौजूद है, भारत कैसे करेगा सफाई? दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां इसमें कैसे करेंगी मदद?

​Swachh Space Mission: अंतरिक्ष का कचरा कैसे साफ करेगा भारत, क्या है स्वच्छ स्पेस मिशन 2030?

असल में अंतरिक्ष मानव जीवन, पर्यावरण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. यहीं से हमें मौसम, संचार, दिशा और आपदा प्रबंधन से जुड़ी जरूरी जानकारी मिलती है. लेकिन पृथ्वी की कक्षाओं में इंसानों के बनाए उपग्रहों और रॉकेटों के पुराने हिस्से भी घूम रहे हैं. इन्हें अंतरिक्ष मलबा या स्पेस डेब्रिस कहा जाता है. यह मलबा सक्रिय उपग्रहों और अंतरिक्ष यात्रियों के लिए खतरा बन सकता है. इसलिए इसकी सफाई भी उतनी ही जरूरी है जितनी नए उपग्रहों को अंतरिक्ष तक पहुंचाना.

अंतरिक्ष में कितना कचरा है?

अंतरिक्ष में कचरे की सटीक संख्या बताना आसान नहीं है. बड़े टुकड़ों को दूरबीन और रडार से देखा और दर्ज किया जा सकता है. लेकिन बहुत छोटे कणों को लगातार पहचानना कठिन होता है. उपलब्ध अनुमानों के अनुसार पृथ्वी की कक्षा में दस करोड़ से अधिक मानवनिर्मित मलबे के टुकड़े हो सकते हैं. इनमें से अधिकतर बहुत छोटे हैं लेकिन इनकी संख्या बड़ी है और उनमें से अधिकतर को नियमित रूप से ट्रैक नहीं किया जा सकता.

भारत से जुड़े ट्रैक किए जा सकने वाले मलबे के बारे में सरकार ने मार्च 2026 में जानकारी दी थी. उस समय कक्षा में भारतीय अंतरिक्ष अभियानों से जुड़े 129 मलबे के टुकड़े दर्ज थे. इनमें निष्क्रिय उपग्रह, रॉकेट के बचे हुए हिस्से और एक पुराने रॉकेट के टूटने से बने टुकड़े शामिल थे. इसरो भारतीय अंतरिक्ष गतिविधियों का आकलन करने के लिए हर साल रिपोर्ट भी जारी करता है.

अंतरिक्ष का कचरा खतरनाक क्यों है?

कक्षा में घूमती वस्तुएं बहुत तेज गति से चलती हैं. ऐसे में छोटा टुकड़ा भी किसी उपग्रह की सतह, सौर पैनल या दूसरे उपकरण को नुकसान पहुंचा सकता है. किसी बड़े टुकड़े की टक्कर से वह टूटकर कई छोटे टुकड़े बना सकता है. इससे आगे और टकराव होने का खतरा बढ़ता है. हर टकराव से अंतरिक्ष में मलबा बढ़ सकता है. इसलिए समस्या केवल पुराने रॉकेट या बंद पड़े उपग्रहों की नहीं है. नए अभियानों को इस तरह बनाना भी जरूरी है कि वे अपने काम के बाद कक्षा में लंबे समय तक बेकार न घूमते रहें.

भारत का लक्ष्य क्या है?

भारत का लक्ष्य 2030 तक सरकारी और निजी क्षेत्र के भारतीय अंतरिक्ष अभियानों से नया मलबा पैदा होने से रोकना है. इसरो की योजना में मिशन के डिजाइन से लेकर उसके खत्म होने के बाद तक मलबे को ध्यान में रखना शामिल है. उपग्रह और रॉकेट ऐसे बनाए जाएं कि उनके हिस्से अनियंत्रित ढंग से न टूटें. मिशन की कक्षा और उड़ान की योजना बनाते समय टक्कर के जोखिम पर विचार किया जाए.

भारत ने यह भी कहा है कि अंतरिक्ष यानों और रॉकेटों के मिशन के बाद उनके सुरक्षित निपटान की योजना पहले से बनाई जानी चाहिए. इसरो के दिशानिर्देशों में मिशन समाप्त होने के बाद संबंधित यान या रॉकेट हिस्से को कक्षा से हटाने पर जोर है.

NASA के मुताबिक, अंतरिक्ष में कचरे के 27,000 टुकड़े 25,266 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तैर रहे हैं.

उपग्रहों को कक्षा से कैसे हटाया जाएगा?

इसका एक तरीका यह है कि उपग्रह को मिशन पूरा होने के बाद उसकी कक्षा से नीचे लाया जाए. कम ऊंचाई पर आने पर वह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर सकता है और उसके हिस्से घर्षण से जल सकते हैं. इस प्रक्रिया को डीऑर्बिट करना कहा जाता है. इस काम के लिए उपग्रह के पास पर्याप्त ईंधन होना चाहिए. इसलिए इसरो मिशन की शुरुआती योजना और डिजाइन के समय ही मिशन के बाद के निपटान के लिए ईंधन रखने पर जोर दे रहा है. यह कदम खास तौर पर जरूरी है, क्योंकि उपग्रह का ईंधन पूरी तरह खत्म हो जाए तो उसे नियंत्रित करना कठिन हो सकता है.

कचरे पर नजर रखने की व्यवस्था

अंतरिक्ष मलबा हटाने से पहले यह जानना जरूरी है कि वह कहां है और किस दिशा में जा रहा है. इसरो का नेत्रा कार्यक्रम पृथ्वी की कक्षा में वस्तुओं की निगरानी और अंतरिक्ष की स्थिति का आकलन करने में मदद करता है. यह जानकारी उपग्रहों को संभावित टक्कर से बचाने के लिए काम आती है. जोखिम दिखाई देने पर उपग्रह के रास्ते में बदलाव की सलाह दी जा सकती है. IS4OM नाम की इसरो प्रणाली भी अंतरिक्ष गतिविधियों को सुरक्षित और लंबे समय तक टिकाऊ बनाने के काम में सहयोग करती है. नेत्रा के तहत ट्रैकिंग और निगरानी की क्षमता बढ़ाने के लिए भारत अपनी सुविधाओं पर भी काम कर रहा है. नेत्रा परियोजना की स्वीकृत लागत 509.01 करोड़ रुपये है.

स्पाडेक्स और रोबोटिक तकनीक की भूमिका

भविष्य में केवल मलबा बनने से रोकना काफी नहीं होगा. पुराने और खतरनाक टुकड़ों को पकड़कर कक्षा से हटाने की तकनीक भी विकसित करनी पड़ सकती है. इसके लिए एक अंतरिक्ष यान को दूसरे यान के पास पहुंचना, उसकी गति के साथ तालमेल बनाना और सुरक्षित रूप से उससे जुड़ना होता है. इस प्रक्रिया को रेंडेजवू और डॉकिंग कहा जाता है. भारत के स्पाडेक्स मिशन ने 2025 में अंतरिक्ष में यानों के मिलने, जुड़ने और अलग होने की तकनीक का प्रदर्शन किया. यह अनुभव भविष्य की सर्विसिंग और मलबा हटाने वाली गतिविधियों के लिए उपयोगी हो सकता है. इसरो ने रोबोटिक आर्म और रोबोटिक उपकरणों का भी प्रदर्शन किया है. हालांकि, इन तकनीकों का प्रदर्शन अपने आप में यह नहीं बताता कि भारत ने बड़े पैमाने पर पुराने अंतरिक्ष कचरे को हटाना शुरू कर दिया है. सक्रिय मलबा हटाने के लिए आगे और परीक्षण तथा मिशन की जरूरत होगी.

निजी कंपनियों की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण

भारत के स्वच्छ अंतरिक्ष लक्ष्य में निजी कंपनियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. हैदराबाद की Cosmoserve Space जैसी कंपनियां उपग्रहों की सेवा, मरम्मत और संभावित मलबा हटाने से जुड़ी तकनीक पर काम कर रही हैं. कंपनी ने अंतरिक्ष में रोबोटिक उपकरणों और सर्विसिंग की क्षमता विकसित करने की दिशा में कदम उठाए हैं. ऐसी तकनीकें भविष्य में पुराने उपग्रहों को पकड़ने या उनकी कक्षा बदलने में मदद कर सकती हैं. इस क्षेत्र में तकनीक अभी विकसित हो रही है. सरकार ने भी Cosmoserve Space की सुविधाओं और मलबा हटाने से जुड़े काम का उल्लेख है.

आगे की चुनौतियां भी कम नहीं

अंतरिक्ष मलबा किसी एक देश की समस्या नहीं है. कई देशों और कंपनियों के उपग्रह एक ही पृथ्वीकक्षा का उपयोग करते हैं. इसलिए निगरानी, जानकारी साझा करना और सुरक्षित नियम अपनाना जरूरी है. भारत, नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और जापान की अंतरिक्ष एजेंसी के साथ सहयोग करता है. अंतरराष्ट्रीय तालमेल से टक्कर का जोखिम समझने और मलबा कम करने के उपाय बेहतर हो सकते हैं. स्वच्छ स्पेस मिशन का महत्व इसी में है कि यह अंतरिक्ष में नए कचरे को रोकने पर जोर देता है. भारत निगरानी, उपग्रहों के सुरक्षित निपटान और नई तकनीक के विकास पर काम कर रहा है. पुराने मलबे को हटाने की क्षमता भी भविष्य में अहम हो सकती है. 2030 का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकारी संस्थाओं, निजी कंपनियों और दूसरे देशों के बीच लगातार सहयोग जरूरी होगा.

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