
लखनऊ, अमृत विचार। पूर्वजों की आत्मशांति और पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का पर्व पितृ पक्ष इस वर्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होने वाला पितृ पक्ष अश्विन मास की अमावस्या को समाप्त होगा। भाद्रपद पूर्णिमा के बाद शुरू होने वाला पितृपक्ष इस वर्ष 27 सितंबर से शुरू होगा। इसके साथ ही मांगलिक और अन्य शुभ कार्यों पर विराम लग जाएगा।
अज्ञात तिथि वालों का अमावस्या पर होगा श्राद्ध
जगद्गुरु राम दिनेशाचार्य ने बताया कि पितृपक्ष के 14 दिनों के दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान समेत विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करेंगे। पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। कहा कि जिन लोगों को पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, वे सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध और तर्पण कर सकते हैं।
पूर्वजों की पुण्यतिथि पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विधान
ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल के अनुसार, पितृ पक्ष में पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने का विधान है। मान्यता है कि इस अवधि में पितर पृथ्वी लोक पर आते हैं और श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मों से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
उन्होंने बताया कि जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि को उनके नाम से यथाशक्ति श्राद्ध कर्म करना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ गाय, कौआ, कुत्ते और चीटियों को भी भोजन कराने की परंपरा है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, उनका श्राद्ध, तर्पण और दान 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर किया जाता है।
श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त सुबह 11:33 से दोपहर 12:21 बजे, रोहिण मुहूर्त 12:21 से 1:09 बजे और अपराह्न काल 1:09 से 3:33 बजे तक रहेगा। इस अवधि में श्राद्ध करना उचित माना गया है।
पितृ पक्ष की तिथियां
26 सितंबर—पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर—प्रतिपदा
28 सितंबर—द्वितीया
29 सितंबर—तृतीया
30 सितंबर—चतुर्थी
1 अक्टूबर—पंचमी
2 अक्टूबर—षष्ठी व सप्तमी
3 अक्टूबर—अष्टमी
4 अक्टूबर—नवमी
5 अक्टूबर—दशमी
6 अक्टूबर—एकादशी
7 अक्टूबर—द्वादशी
8 अक्टूबर—त्रयोदशी
9 अक्टूबर—चतुर्दशी
10 अक्टूबर—सर्वपितृ अमावस्या



