
नई दिल्ली: जब भी ट्रेन से सफर करते हैं, तो पटरियों के नीचे और दोनों तरफ बिछे छोटे-छोटे नुकीले पत्थर जरूर दिखाई देते हैं। देखने में ये साधारण गिट्टी लगती है, लेकिन रेलवे ट्रैक को सुरक्षित और मजबूत बनाए रखने में इनकी अहम भूमिका होती है। रेलवे की भाषा में इन पत्थरों को बैलास्ट (Ballast) कहा जाता है। ये ट्रेन का भारी वजन संभालने, पटरी को अपनी जगह बनाए रखने और बारिश के पानी की निकासी में मदद करते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि रेलवे ट्रैक पर साधारण गोल कंकड़ डालने के बजाय नुकीले पत्थर ही क्यों इस्तेमाल किए जाते हैं? इसके पीछे इंजीनियरिंग का एक खास विज्ञान काम करता है।
1. हजारों टन की ट्रेन का वजन संभालते हैं पत्थर
एक भारी ट्रेन का कुल वजन हजारों टन तक हो सकता है। ट्रेन का यह भार पहियों से रेल, रेल से स्लीपर और फिर गिट्टी की परत के जरिए नीचे जमीन तक पहुंचता है।
अगर पटरी के नीचे पर्याप्त मजबूत आधार न हो, तो लगातार पड़ने वाले भार से जमीन धंस सकती है और ट्रैक की स्थिति बिगड़ सकती है। बैलास्ट इस भार को बड़े क्षेत्र में फैलाने में मदद करता है, जिससे जमीन पर पड़ने वाला दबाव नियंत्रित रहता है।
यही वजह है कि रेलवे ट्रैक के नीचे गिट्टी की एक मोटी परत बिछाई जाती है। यह परत रेल और स्लीपरों को स्थिर आधार देने का काम करती है।
2. नुकीले पत्थर ही क्यों इस्तेमाल किए जाते हैं?
रेलवे ट्रैक पर बिछाए जाने वाले पत्थरों के किनारे आमतौर पर कोणीय और खुरदरे होते हैं। जब इन्हें एक-दूसरे के ऊपर बिछाया जाता है, तो इनके किनारे आपस में फंसकर मजबूत पकड़ बनाते हैं।
इसके उलट, गोल कंकड़ एक-दूसरे के ऊपर आसानी से लुढ़क सकते हैं। ट्रेन के लगातार गुजरने से वे ज्यादा खिसक सकते हैं, जिससे ट्रैक की स्थिरता प्रभावित होने की आशंका रहती है।
इसीलिए बैलास्ट के लिए ऐसे कठोर पत्थर चुने जाते हैं, जो भारी भार और बार-बार पड़ने वाले दबाव को सहन कर सकें। ग्रेनाइट, बेसाल्ट और क्वार्टजाइट जैसे पत्थर इसके लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
3. बारिश में पटरी को धंसने से बचाने में मदद
रेलवे ट्रैक के नीचे पानी जमा होना एक गंभीर समस्या बन सकता है। पानी के कारण नीचे की मिट्टी कमजोर हो सकती है और ट्रैक का आधार अस्थिर हो सकता है।
बैलास्ट के पत्थरों के बीच खाली जगह होती है। इनसे बारिश का पानी बहकर निकल सकता है, जिससे पानी जमा होने की समस्या कम होती है। हालांकि, पानी की सही निकासी के लिए ट्रैक के नीचे की मिट्टी और आसपास की ड्रेनेज व्यवस्था का ठीक होना भी जरूरी है।
इस तरह गिट्टी रेलवे ट्रैक को स्थिर बनाए रखने के साथ-साथ जल निकासी में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।
4. ट्रेन के झटकों और कंपन को नियंत्रित करते हैं पत्थर
जब कोई भारी ट्रेन पटरियों से गुजरती है, तो पहियों और रेल के संपर्क के कारण कंपन और गतिशील भार पैदा होता है। बैलास्ट की परत इस भार को नीचे की संरचना तक पहुंचाने और ट्रैक के व्यवहार को नियंत्रित करने में मदद करती है।
इसके अलावा, पत्थरों की परत स्लीपरों को अपनी जगह बनाए रखने में सहायक होती है। इससे ट्रेन के बार-बार गुजरने के कारण पटरी के खिसकने की आशंका कम होती है।
हालांकि, बैलास्ट अकेले ही सभी झटकों को खत्म नहीं करता। ट्रैक की मजबूती रेल, स्लीपर, फास्टनिंग सिस्टम, बैलास्ट और नीचे की जमीन सहित पूरी संरचना पर निर्भर करती है।
5. घास-फूस और खरपतवार को बढ़ने से रोकने में मदद
रेल की पटरियों के आसपास अगर बड़ी मात्रा में घास-फूस और झाड़ियां उगने लगें, तो रेलवे कर्मचारियों के लिए ट्रैक का निरीक्षण और रखरखाव मुश्किल हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में वनस्पति पानी की निकासी को भी प्रभावित कर सकती है।
गिट्टी की मोटी परत पौधों को जड़ें जमाने के लिए अनुकूल मिट्टी उपलब्ध होने से रोकने में मदद करती है। हालांकि, इससे खरपतवार पूरी तरह खत्म नहीं होते और रेलवे को समय-समय पर सफाई तथा रखरखाव करना पड़ता है।
क्या हर ट्रेन की पटरी पर पत्थर बिछाए जाते हैं?
नहीं। पारंपरिक रेलवे ट्रैक में बैलास्ट का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है, लेकिन कुछ आधुनिक रेल प्रणालियों में बैलास्ट-लेस ट्रैक या स्लैब ट्रैक तकनीक अपनाई जाती है।
इस व्यवस्था में रेल को कंक्रीट की मजबूत स्लैब पर लगाया जाता है। इसका इस्तेमाल कुछ उच्च गति वाले रेल मार्गों और विशेष परिस्थितियों में किया जाता है। इसमें नियमित गिट्टी की जरूरत कम होती है, लेकिन निर्माण और मरम्मत की लागत अलग-अलग हो सकती है।
भारत की मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना में भी स्लैब ट्रैक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि, पारंपरिक गिट्टी वाले ट्रैक भारतीय रेलवे के बड़े हिस्से में आज भी उपयोग किए जाते हैं।
आखिर रेलवे ट्रैक पर नुकीले पत्थर क्यों जरूरी हैं?
रेलवे ट्रैक पर बिछे ये पत्थर केवल खाली जगह भरने के लिए नहीं होते। ये ट्रेन के भार को जमीन तक पहुंचाने, स्लीपरों को स्थिर रखने, पानी की निकासी में मदद करने और ट्रैक की मजबूती बनाए रखने वाली इंजीनियरिंग व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं।
अगली बार जब आप ट्रेन की खिड़की से पटरियों के नीचे बिछी गिट्टी देखें, तो याद रखिए कि इन साधारण दिखने वाले पत्थरों के पीछे यात्रियों की सुरक्षित और सुचारु रेल यात्रा सुनिश्चित करने वाला महत्वपूर्ण विज्ञान काम करता है।
सत्य रिपोर्ट डिस्क्लेमर: यह लेख रेलवे ट्रैक की सामान्य इंजीनियरिंग और बैलास्ट के उपयोग से जुड़ी जानकारी पर आधारित है। अलग-अलग रेल मार्गों पर ट्रैक की संरचना और तकनीकी मानक भिन्न हो सकते हैं।



