IndiaUttar Pradesh

​क्यों चढ़ता है मां शाकंभरी को हरी सब्जियों का भोग? नवरात्रि पर जानें इसका रहस्य, शिवालिक की पहाड़ियों में बसा है मंदिर

Saharanpur News: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में शिवालिक पहाड़ियों की मनोरम वादियों के बीच बसा सिद्धपीठ मां शाकंभरी देवी मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर यहां सहारनपुर सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली और राजस्थान से लाखों भक्त माता के दर्शन के लिए जुटने लगे हैं. इस सिद्धपीठ की सबसे अनूठी बात मां शाकंभरी देवी का स्वरूप है, जिन्हें अन्न, वनस्पति और जीवन का पोषण करने वाली देवी माना जाता है. मंदिर में माता को हरी शाकसब्जियों का भोग लगाने की विशेष परंपरा है, जो धरती को भीषण अकाल और जल संकट से उबारने की पौराणिक कथा की याद दिलाती है.

​क्यों चढ़ता है मां शाकंभरी को हरी सब्जियों का भोग? नवरात्रि पर जानें इसका रहस्य, शिवालिक की पहाड़ियों में बसा है मंदिर

मां शाकंभरी देवी का यह ऐतिहासिक मंदिर सहारनपुर जिले की बेहट तहसील के जसमौर क्षेत्र में स्थित है. यह धाम सहारनपुर जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दूर शिवालिक पर्वतमालाओं से घिरा हुआ है. मुख्य मंदिर से करीब 1 किलोमीटर पहले बाबा भूरादेव का मंदिर स्थित है. मान्यता है कि भूरादेव माता के रक्षक और क्षेत्रपाल हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो श्रद्धालु मुख्य मंदिर से पहले बाबा भूरादेव के दर्शन नहीं करते, उनकी यात्रा और पूजा संपूर्ण नहीं मानी जाती और उन्हें माता का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता है.

क्या है ‘शाकंभरी’ नाम के पीछे की पौराणिक कथा?

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्राचीन काल में दुर्गमासुर नामक दैत्य के बढ़ते अत्याचारों के कारण वर्षा रुक गई और पूरी धरती पर भयानक अकाल व सूखा पड़ गया. अन्न और जल के अभाव में मनुष्य, पशुपक्षी और जीवजंतु तड़पतड़पकर मरने लगे. संकट से मुक्ति पाने के लिए ऋषिमुनियों और देवताओं ने आदिशक्ति की कठोर तपस्या की.

प्रसन्न होकर प्रकट हुईं देवी ने अपनी शक्ति से पूरे भूभाग पर दिव्य शाक , फल और वनस्पतियां उत्पन्न कीं, जिससे जीवों का पोषण हुआ और अकाल समाप्त हुआ. शाक उत्पन्न कर संसार का भरणपोषण करने के कारण ही माता का नाम ‘शाकंभरी’ पड़ा. इसके पश्चात माता शाकंभरी ने देवताओं को प्रताड़ित करने वाले महादैत्य दुर्गमासुर का वध कर संपूर्ण संसार को उसके भय से मुक्ति दिलाई.

हरी सब्जियों का भोग और नवरात्र मेले का आयोजन

जहां आमतौर पर मंदिरों में मिठाइयों का भोग लगता है, वहीं मां शाकंभरी के दरबार में ताजी हरी शाकसब्जियों का भोग चढ़ाया जाता है. यह परंपरा माता के अन्नपूर्णा और पोषणकर्ता स्वरूप के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है. सिद्धपीठ में वर्ष में दो बार चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र में विशाल लक्खी मेले का आयोजन होता है. इस दौरान पूरे शिवालिक क्षेत्र में भजनकीर्तन, मुंडन संस्कार और धार्मिक अनुष्ठानों की गूंज रहती है.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply