सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें नीट पेपर लीक के विरोध प्रदर्शन के मामलों में दर्ज FIR को वापस ले सकती है या बंद कर सकती है. शर्त यह है कि उनके खिलाफ पहले से कोई जघन्य अपराध दर्ज न हों. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने स्पष्ट किया है कि पूर्व में इस मामले में दिए गए आदेश में आपराधिक पृष्ठभूमि का मतलब केवल और केवल गंभीर अपराधों से है. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता के उस तर्क के बाद दिया कि छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों में केंद्र सरकार गंभीर है लेकिन इसमें कुछ कानूनी पेंच भी हैं. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि राज्य सरकारें कब एफआईआर वापस ले सकती हैं और कब नहीं? क्या है पूरी प्रक्रिया? कौनकौन से अपराध माने जाते हैं गंभीर?

एफआईआर वापस लेना आम बोलचाल का शब्द है. कानूनी रूप से एफआईआर दर्ज होने के बाद उसे केवल शिकायतकर्ता की इच्छा से खत्म नहीं किया जा सकता. एफआईआर राज्य बनाम आरोपी के रूप में आगे बढ़ती है, इसलिए मामला निजी व्यक्ति और आरोपी के बीच ही सीमित नहीं रहता. शिकायतकर्ता यह कह सकता है कि समझौता हो गया है. वह बयान बदल सकता है. वह आगे कार्रवाई न चाहने की बात भी कह सकता है. लेकिन अंतिम निर्णय पुलिस, अभियोजन एजेंसी और अदालत की तय प्रक्रिया से होता है. देश में 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत भी मूल सिद्धांत यही है कि गंभीर अपराधों में राज्य की भूमिका प्रमुख रहती है.
राज्य कब मामला खत्म करने की पहल कर सकता है?
राज्य कुछ स्थितियों में आपराधिक कार्रवाई आगे न बढ़ाने की पहल कर सकता है. इसके मुख्य तरीके अलगअलग हैं.
- पहला तरीका: जांच के दौरान यदि पुलिस को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलता, आरोप झूठा पाया जाता है या आरोपी के खिलाफ केस बनता ही नहीं है तो पुलिस क्लोजर रिपोर्ट या अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर सकती है. इसमें पुलिस अदालत को बताती है कि आगे मुकदमा चलाने योग्य सामग्री नहीं मिली. लेकिन क्लोजर रिपोर्ट से मामला यूं ही नहीं समाप्त होता. मजिस्ट्रेट रिपोर्ट देखता है. शिकायतकर्ता को भी सुनने का अवसर मिल सकता है. शिकायतकर्ता विरोध याचिका यानी प्रोटेस्ट पिटीशन, दे सकता है. अदालत पुलिस की रिपोर्ट स्वीकार भी कर सकती है और आगे जांच का आदेश भी दे सकती है.
सुप्रीम कोर्ट
- दूसरा तरीका: यह मुकदमा शुरू होने के बाद होता है. सरकारी अभियोजक अदालत की सहमति से अभियोजन वापस लेने का आवेदन दे सकता है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 360 इस विषय से जुड़ी है. पहले इसी प्रकार का प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 321 में था. अभियोजक केवल इसलिए केस वापस नहीं ले सकता कि पक्षों में समझौता हो गया है. उसे अदालत को उचित कारण बताना होता है. कारण न्याय, सार्वजनिक हित, साक्ष्य की स्थिति या मुकदमे की वास्तविक आवश्यकता से जुड़ा होना चाहिए.
क्या सरकार अपनी इच्छा से केस वापस ले सकती है?
सामान्य तौर पर ऐसा नहीं हो सकता. सरकार या अभियोजन एजेंसी का निर्णय अंतिम नहीं होता. अदालत की अनुमति आवश्यक होती है. अदालत यह देखती है कि केस वापस लेने का कारण ईमानदार है या नहीं. अदालत यह भी देखती है कि कहीं राजनीतिक दबाव, पक्षपात, प्रभावशाली व्यक्ति को लाभ, या पीड़ित के साथ अन्याय तो नहीं हो रहा. सरकारी अभियोजक को स्वतंत्र कानूनी सोच के साथ काम करना चाहिए.
वह केवल सरकार के आदेश का माध्यम नहीं बन सकता. अदालत यह जांच सकती है कि अभियोजन वापसी न्याय के हित में है या नहीं. यदि अदालत अनुमति दे देती है, तो आरोपी को आरोप तय होने से पहले आमतौर पर डिस्चार्ज माना जा सकता है. आरोप तय होने के बाद अनुमति मिलने पर परिणाम बरी होने जैसा हो सकता है.
नीट पेपर लीक प्रदर्शन
शिकायतकर्ता के समझौते का क्या असर पड़ता है?
समझौता हर मामले में एक जैसा असर नहीं डालता. छोटे, निजी और व्यक्तिगत विवादों में समझौता महत्वपूर्ण हो सकता है. जैसे साधारण मारपीट, गालीगलौज, कुछ प्रकार के झगड़े, या पारिवारिक विवाद. कुछ अपराध कानून में समझौता योग्य होते हैं. इन्हें कम्पाउंडेबल ऑफेंस कहा जाता है.
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 359 में ऐसे अपराधों के समझौते का प्रावधान है. कुछ अपराध बिना अदालत की अनुमति के समझौते से खत्म हो सकते हैं. कुछ में अदालत की अनुमति जरूरी होती है, लेकिन जिन अपराधों को कानून समझौता योग्य नहीं मानता, उनमें केवल समझौता पर्याप्त नहीं है. पीड़ित और आरोपी का निजी समझौता राज्य की कार्रवाई समाप्त करने का स्वतः अधिकार नहीं देता.
कानून में गंभीर अपराध को अलग से इंगित किया गया है. फिर भी अदालत अपराध की प्रकृति, सजा, पीड़ित पर असर, समाज पर असर और उपलब्ध साक्ष्य देखती है.इन मामलों में अपराध केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं माना जाता. इसका असर समाज, कानूनव्यवस्था और जनता के भरोसे पर भी पड़ता है. इसलिए ऐसे मामलों में समझौते के आधार पर केस खत्म करना बहुत कठिन होता है.
किन मामलों में समझौते को अदालत महत्व दे सकती है?
अदालत निजी विवाद वाले मामलों में समझौते को महत्व दे सकती है. उदाहरण के लिए पड़ोसियों का विवाद, सीमित चोट वाला झगड़ा, व्यापारिक लेनदेन से पैदा हुआ विवाद, वैवाहिक विवाद, या परिवार के भीतर का कुछ तनाव. फिर भी अदालत हर तथ्य को देखती है. यदि साधारण दिखने वाले मामले में धमकी, दबाव, चोट की गंभीरता, बारबार हिंसा, या सार्वजनिक शांति भंग होने का तत्व हो, तो अदालत समझौते को स्वीकार न करे. महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों में अदालत विशेष सावधानी बरतती है. अदालत यह देखती है कि समझौता स्वेच्छा से हुआ है या दबाव में.
हाईकोर्ट से केस रद्द कराने का रास्ता
कुछ मामलों में पक्षकार हाईकोर्ट से एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग कर सकते हैं. इसे क्वैशिंग कहा जाता है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों से संबंधित है. पहले इसी तरह की शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत प्रयोग होती थी. हाईकोर्ट निजी प्रकृति के विवादों में समझौते के आधार पर केस रद्द कर सकता है. पर, यह कोई अधिकार नहीं है. यह अदालत का विवेक है. हत्या, बलात्कार, यौन अपराध, आतंकवाद, बड़े भ्रष्टाचार, गंभीर आर्थिक अपराध और समाजविरोधी अपराधों में हाई कोर्ट आमतौर पर केवल समझौते के कारण केस रद्द नहीं करता.
पीड़ित की सहमति क्यों महत्वपूर्ण है?
पीड़ित की सहमति बहुत महत्वपूर्ण है. अदालत पीड़ित का बयान सुन सकती है. खासकर तब, जब कहा जाए कि समझौता हो गया है. अदालत यह जांच सकती है कि पीड़ित पर दबाव तो नहीं है. धमकी, पैसे का अनुचित दबाव, सामाजिक दबाव या पारिवारिक दबाव भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं. यदि समझौता स्वतंत्र नहीं है, तो अदालत उसे मानने से इनकार कर सकती है.
इस तरह कहा जा सकता है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद मामला केवल शिकायतकर्ता का निजी मामला नहीं रहता. राज्य का भी उसमें हित होता है, इसलिए एफआईआर को सीधे वापस नहीं लिया जा सकता. कम गंभीर और निजी प्रकृति के विवादों में समझौता, कम्पाउंडिंग, क्लोजर रिपोर्ट या हाई कोर्ट से राहत संभव हो सकती है. पर गंभीर अपराधों में राज्य और अदालत का रुख कठोर रहता है. हर मामले के तथ्य अलग होते हैं. अपराध की धाराएं, साक्ष्य, पीड़ित की स्थिति और सार्वजनिक हित अंतिम निर्णय को प्रभावित करते हैं.



