
कश्मीर का फैसला लगभग हो चुका था. लेकिन पाकिस्तान के साथ लॉर्ड माउंटबेटन और जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री रामचंद्र काक ने अपनी हरकते नहीं छोड़ी थीं. सभी मिलकर महाराज हरि सिंह को इस बात के लिए राजी करना चाहते थे कि वह जम्मू-कश्मीर का विलय पाकिस्तान में कर दें. लेकिन अचानक सभी के मंसूबों पर पानी फिर गया. काक को प्रधानमंत्री के पद से बर्खास्त तो किया ही गया, उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर दिया गया. वहीं, भारत में लाहौर के शामिल होने की क्या थी बात, जानने के लिए पूरी खबर.
12 August 1947: 12 अगस्त 1947 की सुबह कोलकाता (तब कोलकाता) के सोडेपुर स्थिति महात्मा गांधी के आश्रम में लोगों के बीच एक नया सवाल तैर रहा था. हर कोई यह जानने के लिए व्याकुल हो रहा था कि 5000 से अधिक हिंदुओं की हत्या करने वाला सुहरावर्दी आखिर महात्मा गांधी से मिलने क्यों आया था. आश्रम में मौजूद हर शख्स के जहन में मौजूद इस सवाल से अब गांधी भी अनभिज्ञ नहीं थे. लिहाजा, उन्होंने सुबह की प्रार्थना सभा में सुहरावर्दी के आश्रम आने की वजह साफ करने का मन बना लिया था. प्रार्थना सभा के बाद गांधी ने हजारों हिंदुओं के हत्यारे को सुहरावर्दी साहब का संबोधन देकर अपनी बात कहना शुरू की.
उन्होंने कहा कि कल रात सुहरावर्दी साहब मुझे एक सलाह देने के लिए आश्रम आए थे. उन्होंने मुझे सलाह दी है कि ऐसी अशांत परिस्थितियों के बीच मुझे कोलकाता नहीं छोड़ना चाहिए. उन्होंने मुझे यह भी सलाह दी है कि कोलकाता में सबकुछ शांत होने तक मै यहीं रहूं. हालांकि, उनकी सलाह को मानने से पहले उनके सामने मैनें अपनी एक शर्त रही है. वह शर्त यह है कि कोलकाता के किसी दंगाग्रस्त इलाके में सुहरावर्दी साहब मेरे साथ एक ही छत के नीचे रहें. इस दौरान, वहां पर ना ही पुलिस की मौजूदगी हो और ना ही सेना की कोई तैनाती हो. उन्होंने बताया कि सुहरावर्दी मेरी यह शर्त मानने के लिए तैयार हो गए हैं.
अपने संबोधन में महात्मा गांधी ने यह भी कहा कि सीमा आयोग बंटवारे की तय हुई लकीरों को अगले एक या दो दिन में साफ कर देगा. ऐसे मुश्किल हालात में हिंदू और मुसलमानों को आयोग की तरफ से होने वाले हर फैसले का सम्मान करना चाहिए. हालांकि गांधी के साफ करने के बावजूद लोगों के मन में यह सवाल बना रहा कि हजारों हिंदुओं की हत्या के पाप को किसी तमगे की तरह मानने वाले हत्यारे के मन में अचानक से शांति का ख्याल कहां से आ गया. वहीं, सुहरावर्दी के आश्रम आने की वजह साफ करने के बाद महात्मा गांधी ने दूसरे विषयों पर अपनी राय रखना शुरू कर दी.
किसी मूर्खता से कम नहीं 15 अगस्त को आजादी…
महात्मा गांधी के संबोधन का अगला पडाव गोवा, दमन, दीव और पुदुचेरी के मौजूदा हालात की तरफ मुड गया. उन्होंने कहा कि मुझे पता चला है कि इन इलाकों में रहने वाले भारतीय भी 15 अगस्त के दिन स्वतंत्रता की घोषणा करने वाले हैं. जबकि ये इलाके अभी भी पुर्तगाल और फ्रांस के शासन में हैं. उन्होंने कहा कि 15 अगस्त को यदि इस इलाके में रहने वाले भारतीय आजादी का ऐलान करते हैं तो ऐसा करना पूरी तरह से मूर्खता होगा. इसका मतलब तो यही निकलेगा कि हम भारतीय घमंड में आ गए हैं. फिलहाल, ब्रिटिशर्स ने भारत छोड़ने का फैसला किया है, फ्रेंच और पुर्तगाल ने नहीं. उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि इन इलाकों में रहने वाले लोग आने वाले दिनों में स्वतंत्र हो ही जाएंगे, ऐसे में कानून अपने हाथ में लेने की कोई जरूरत नहीं है.
क्या लाहौर को भारत में शामिल करने की थी तैयारी?
बीती रात लाहौर में यह खबर किसी आग की तरह फल चुकी थी कि रेडक्लिफ सीमा आयोग ने लाहौर को भारत में शामिल करने का फैसला कर लिया है. इस खबर ने पहले से दंगों की आग में झुलस रहे लाहौर की तपिश बढ़ा दी थी. शहर में चल रहे दंगों ने रौद्र रूप धारण कर लिया था. मुस्लिम नेशनल गार्ड के लोगों ने हिंदू और सिख बाहुल्य इलाकों को अपने निशाने में ले लिया था. मुस्लिम नेशनल गार्ड ने तय किया था कि शहर में रहने वाला एक भी हिंदू और सिख बचना नहीं चाहिए. हिंदू बहुल इलाकों में एक डिप्टीगंज में भी मुस्लिम नेशनल गार्ड ने रात से कत्लेआम मचा दिया था. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस कत्लेआम में इलाके में रहने वाले 50 से अधिक हिंदू और सिख नागरिकों की हत्या की गई थी. असल में जान गंवाने वाले लोगों की संख्या सरकारी आंकड़ों के कई गुना अधिक थी. शाम होते-होते लाहौर से शुरू हुआ कत्लेआम ने गुरुदासपुर और लायलपुर को भी अपनी चपेट में ले लिया था.
काइयां काक को महात्मा गांधी ने कराया नजरबंद
बंटवारे की सुगबुहाट के साथ पाकिस्तान की आंखें कश्मीर पर जमी हुईं थी. मोहम्मद अली जिन्ना ने कश्मीर को अपने पाले में लाने के लिए हर दाव चल दिया था. इधर लॉर्ड माउंटबेटन भी नहीं चाहते थे कि कश्मीर का विलय भारत के साथ हो. लिहाजा, माउंटबेटन ने महाराजा हरि सिंह को जम्मू और कश्मीर का विलय पाकिस्तान के साथ करने की सलाह दी थी. हालांकि, माउंटबेटन की इस सलाह को महाराजा हरि सिंह ने सिरे से खारिज कर दिया. वहीं, महाराजा हरि सिंह का यह फैसला उनके प्रधानमंत्री रामचंद्र काक को पसंद नहीं आई. उन्होंने नई चाल चलते हुए महाराजा हरि सिंह को बहकाना शुरू कर दिया. काक चाहते थे कि कश्मीर का विलय यदि पाकिस्तान में नहीं हो सकता है तो उसे स्वतंत्र ही रखा जाए.
हालांकि इसी बीच काक की चाल की भनक पंडित जवाहर लाल नेहरू को लग चुकी थी. उन्होंने इस मसले पर महात्मा गांधी से बात की और उन्हें महाराजा हरि सिंह से बात करने के लिए कहा. कुछ दिनों बात, श्रीनगर पहुंचे महात्मा गांधी ने काक की हरकतों के बारे में महाराजा हरि सिंह से बात की. महात्मा गांधी के कहने पर महाराजा हरि सिंह ने 12 अगस्त 1947 को एक कड़ा फैसला लिया. इस फैसले के तहत काक को बर्खास्त कर दिया गया और जनक सिंह को जम्मू और कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया गया. साथ ही, भागने की कोशिश कर रहे रामचंद्र काक को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया गया. (इस खबर के कुछ अंश प्रशांत पोल ने पुस्तक ‘वे पंद्रह दिन’ से लिए गए हैं.)



