अध्याय 5 : मृत्यु का रहस्य
भाग 5.1 (अध्याय–1)

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो नारायणाय ॥
गरुड़ पुराण का नाम सुनते ही अधिकांश लोगों के मन में मृत्यु, यमलोक और नरक का विचार आता है। इसलिए बहुत से लोग इस ग्रंथ को केवल किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही सुनते या पढ़ते हैं। किंतु यह धारणा पूर्णतः सही नहीं है। गरुड़ पुराण केवल मृत्यु का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने का मार्गदर्शन देने वाला दिव्य शास्त्र है।
जब भगवान श्रीहरि विष्णु के वाहन और परम भक्त गरुड़ जी ने भगवान से पूछा—
“हे प्रभु! मृत्यु क्या है? मनुष्य इससे इतना भयभीत क्यों रहता है? और मृत्यु के बाद वास्तव में क्या होता है?”
तब भगवान विष्णु ने अत्यंत करुणा के साथ मृत्यु का रहस्य बताना प्रारम्भ किया।
भगवान ने कहा—
“हे गरुड़! मृत्यु वह नहीं है जिसे संसार का अज्ञानी मनुष्य समझता है। मृत्यु किसी जीव का अंत नहीं, बल्कि उसके शरीर का अंत है। आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। वह केवल एक शरीर को छोड़कर दूसरे मार्ग पर आगे बढ़ती है।”
यही गरुड़ पुराण का मूल संदेश है।
मृत्यु से मनुष्य क्यों डरता है?
भगवान विष्णु कहते हैं कि मनुष्य मृत्यु से नहीं, बल्कि अज्ञान से डरता है।
जिसे यह ज्ञान नहीं कि वह वास्तव में शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है, वह मृत्यु को सब कुछ समाप्त हो जाना मान लेता है।
मनुष्य सोचता है—
- मेरा परिवार छूट जाएगा।
- मेरा धन यहीं रह जाएगा।
- मेरा घर, मेरा व्यवसाय, मेरी प्रतिष्ठा समाप्त हो जाएगी।
- अब मेरा क्या होगा?
यही मोह और अज्ञान मृत्यु के भय का सबसे बड़ा कारण है।
लेकिन जो मनुष्य आत्मा के स्वरूप को जान लेता है, उसके लिए मृत्यु भय का विषय नहीं रहती। वह इसे ईश्वर की बनाई हुई एक स्वाभाविक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करता है।
मृत्यु क्या है?
गरुड़ पुराण के अनुसार—
“जब आत्मा अपने कर्मों के अनुसार इस शरीर में रहने का समय पूर्ण कर लेती है, तब वह इस शरीर को छोड़ देती है। इसी घटना को मृत्यु कहते हैं।”
अर्थात मृत्यु केवल शरीर और आत्मा का अलग होना है।
शरीर पंचमहाभूतों से बना है—
- पृथ्वी
- जल
- अग्नि
- वायु
- आकाश
इन पाँच तत्वों का एक दिन अपने मूल स्वरूप में लौट जाना निश्चित है।
आत्मा इन पाँच तत्वों से नहीं बनी है। इसलिए वह इनकी तरह नष्ट भी नहीं होती।
शरीर और आत्मा में अंतर
गरुड़ पुराण बार-बार समझाता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान बैठता है।
शरीर बदलता है—
- बचपन
- युवावस्था
- वृद्धावस्था
लेकिन इन सभी अवस्थाओं में “मैं” का अनुभव करने वाला कौन है?
वह आत्मा है।
शरीर बीमार होता है, बूढ़ा होता है और अंत में समाप्त हो जाता है।
आत्मा इन सबसे परे है।
इसीलिए भगवान विष्णु कहते हैं कि बुद्धिमान मनुष्य शरीर की देखभाल तो करता है, लेकिन अपना पूरा जीवन केवल शरीर के सुख में व्यर्थ नहीं करता। वह आत्मा के कल्याण का भी प्रयास करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रमाण
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥” (गीता 2.20)
भावार्थ :
आत्मा का कभी जन्म नहीं होता और न कभी मृत्यु होती है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और सनातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।
गरुड़ पुराण इसी सिद्धांत को और विस्तार से समझाता है।
संसार में जो आया है, उसे जाना भी होगा
भगवान विष्णु गरुड़ जी से कहते हैं—
इस संसार का यही नियम है।
- जो जन्मा है, वह एक दिन अवश्य मरेगा।
- जो बना है, वह एक दिन नष्ट होगा।
- जो मिला है, वह एक दिन छूट जाएगा।
राजा हो या भिखारी…
विद्वान हो या अज्ञानी…
धनी हो या निर्धन…
मृत्यु किसी में भेदभाव नहीं करती।
इसीलिए ऋषि-मुनियों ने कहा है कि मृत्यु संसार का सबसे बड़ा सत्य है।
फिर मनुष्य को क्या करना चाहिए?
यदि मृत्यु निश्चित है, तो क्या मनुष्य सब कुछ छोड़कर बैठ जाए?
भगवान विष्णु कहते हैं—नहीं।
मृत्यु का ज्ञान मनुष्य को आलसी नहीं, बल्कि सजग बनाना चाहिए।
मनुष्य को चाहिए कि—
- सत्य बोले।
- धर्म का पालन करे।
- माता-पिता की सेवा करे।
- किसी के साथ अन्याय न करे।
- भगवान का स्मरण करे।
- अपने कर्मों को पवित्र बनाए।
क्योंकि मृत्यु के बाद धन नहीं, कर्म साथ जाते हैं।
गरुड़ पुराण का पहला संदेश
भगवान विष्णु कहते हैं—
“हे गरुड़! जो मनुष्य मृत्यु को समझ लेता है, वह जीवन को भी सही अर्थों में समझ लेता है।”
जो व्यक्ति मृत्यु को भूलकर जीता है, वह अक्सर लोभ, क्रोध, मोह और अहंकार में फँस जाता है।
लेकिन जो यह स्मरण रखता है कि एक दिन यह शरीर छूट जाएगा, वह अपने प्रत्येक कर्म को सोच-समझकर करता है।
ऐसा व्यक्ति दूसरों को दुःख नहीं देता, क्योंकि उसे ज्ञात होता है कि प्रत्येक कर्म का फल उसे अवश्य मिलेगा।
जीवन की शिक्षा
गरुड़ पुराण हमें मृत्यु से डरना नहीं सिखाता, बल्कि मृत्यु के माध्यम से सही जीवन जीना सिखाता है।
यदि हम प्रतिदिन यह स्मरण रखें कि यह शरीर नश्वर है, तो—
- हमारा अहंकार कम होगा।
- क्रोध कम होगा।
- लालच कम होगा।
- दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा बढ़ेगी।
- भगवान के प्रति श्रद्धा दृढ़ होगी।
यही मृत्यु के ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य है।
अगले अध्याय में
गरुड़ पुराण – अध्याय 5.1 (भाग–2)
“मृत्यु क्यों होती है? क्या हर मृत्यु पहले से निश्चित होती है? प्रारब्ध, काल और ईश्वर की व्यवस्था का गूढ़ रहस्य।”
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे



