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बीजेपी का वोट बांटने की जुगत में राहुल-अख‍िलेश, क्‍या है कांग्रेस-सपा का 32-21 फॉर्मूला

चुनावों की आहट के साथ ‘यूपी के दो लड़के’ एक बार फ‍िर व‍िजय का ख्‍वाब लेकर मैदान में उतर गए हैं. मुकाबला उस बीजेपी से है, जो सोशल इंजीन‍ियर‍िंग के दम पर दो बार व‍िपक्ष को पटक चुकी है. इसल‍िए राहुल गांधी, अख‍िलेश यादव 3221 के फार्मूला तरकश से न‍िकाल लाए हैं. 32 का मतलब समाजवादी पार्टी का मौजूदा वोट शेयर और 21 का मतलब उत्तर प्रदेश की करीब 21 फीसदी दलित आबादी. कांग्रेस और सपा की सोच ये है क‍ि अगर अखिलेश यादव अपने पारंपरिक वोट को मजबूती से संभाल लें और राहुल गांधी दलितों के बीच कांग्रेस की पुरानी जमीन वापस ले आएं, तो बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत पर चोट की जा सकती है. लेकिन क्‍या ये इतना आसान है?

बीजेपी का वोट बांटने की जुगत में राहुल-अख‍िलेश, क्‍या है कांग्रेस-सपा का 32-21 फॉर्मूला

अखिलेश के पास क्या है?
2024 के लोकसभा चुनाव ने समाजवादी पार्टी को नई ताकत दी. पार्टी का वोट शेयर 33 फीसदी के आसपास पहुंच गया. यह सिर्फ आंकड़ा नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि अखिलेश यादव अब सिर्फ यादवों के नेता नहीं रहना चाहते. उन्होंने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का नारा देकर अपनी राजनीति का दायरा बढ़ाने की कोशिश की. फिर भी सच्चाई यह है कि सपा की सबसे मजबूत पकड़ आज भी यादव और मुस्लिम वोटरों पर ही मानी जाती है. यही उसका कोर वोट बैंक है. यही उसकी चुनावी रीढ़ भी है.

राहुल की नजर 21 फीसदी पर क्यों?
राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं, उसमें एक बात लगातार दिखती है. संविधान, आरक्षण, सामाजिक न्याय, जातीय जनगणना और दलित अधिकार उनके भाषणों के स्थायी विषय बन चुके हैं. वे दलित बस्तियों में जाते हैं, सफाईकर्मियों से मिलते हैं, अंबेडकर की विरासत की बात करते हैं और यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि कांग्रेस ही सामाजिक न्याय की असली लड़ाई लड़ रही है. इसके पीछे सिर्फ विचारधारा नहीं, चुनावी गणित भी है.

उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21 फीसदी है. कभी यही वर्ग कांग्रेस का सबसे भरोसेमंद वोट बैंक था. बाद में कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में यह वोट बसपा के साथ चला गया. पिछले एक दशक में इसी वोट का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ जुड़ता दिखाई दिया. अब कांग्रेस मानती है कि बसपा कमजोर हुई है, इसलिए खोई हुई जमीन वापस पाने का मौका है.

लेकिन दलित सीधे सपा के साथ क्यों नहीं जाते?
यही इस पूरे फॉर्मूले की सबसे कमजोर कड़ी है. उत्तर प्रदेश में दलित समाज का एक बड़ा वर्ग समाजवादी पार्टी को लेकर पूरी तरह सहज नहीं माना जाता. इसके पीछे सिर्फ राजनीति नहीं, स्थानीय सामाजिक समीकरण भी हैं.

कई जिलों में दलित और यादव समुदाय के बीच लंबे समय से सामाजिक वर्चस्व की लड़ाई रही है. पंचायत चुनाव हों, गांव की राजनीति हो या स्थानीय विवाद, दोनों समुदाय कई जगह आमनेसामने भी रहे हैं.पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में दलित और मुस्लिम समुदाय के बीच भी तनाव के मामले सामने आते रहे हैं.

इसी वजह से दलित समाज का एक हिस्सा सपा को अपने राजनीतिक विकल्प के रूप में आसानी से स्वीकार नहीं करता. विरोधी दल वर्षों से सपा पर ‘यादववाद’ और ‘गुंडाराज’ का आरोप लगाते रहे हैं. चाहे सपा इन आरोपों को खारिज करती रही हो, लेकिन राजनीति में धारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी वास्तविकता.

यही कारण है कि कांग्रेस को लगता है कि अगर दलित वोट बीजेपी से खिसकेगा तो वह सीधे सपा के बजाय कांग्रेस की तरफ आ सकता है.

बीजेपी पहले से तैयार खड़ी…
विपक्ष की सबसे बड़ी मुश्किल यही है. 2014 के बाद बीजेपी ने दलित समाज को सिर्फ भाषणों से नहीं, योजनाओं से जोड़ने की कोशिश की. गरीब परिवारों तक सरकारी योजनाएं पहुंचीं और उनका सबसे बड़ा फायदा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को मिला, जिनमें बड़ी संख्या दलितों की भी है.

किसी को प्रधानमंत्री आवास योजना में घर मिला. किसी के घर शौचालय बना. किसी को उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन मिला. किसी को मुफ्त राशन मिला. किसी परिवार का इलाज आयुष्मान भारत योजना से हुआ.इन योजनाओं ने जाति से ऊपर उठकर लाभार्थी की नई राजनीति तैयार की.

बीजेपी लगातार यही संदेश देती रही कि उसका रिश्ता वोटर से जाति के आधार पर नहीं, लाभार्थी के आधार पर है. सिर्फ योजनाएं नहीं, सम्मान की राजनीति भी. बीजेपी ने यह भी समझा कि सिर्फ योजनाएं काफी नहीं होंगी. इसलिए पार्टी ने दलित महापुरुषों और संतों को लेकर भी लगातार काम किया. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर से जुड़े कार्यक्रम हों, संत रविदास की जयंती हो या संविधान दिवस, बीजेपी ने इन आयोजनों को राजनीतिक संदेश का हिस्सा बनाया. सरकार ने अंबेडकर से जुड़े स्थलों के विकास पर जोर दिया. संगठन स्तर पर अनुसूचित जाति सम्मेलन, समरसता सहभोज और दलित संपर्क अभियान चलाए गए. यानी पार्टी ने दलित वोटर के साथ भावनात्मक और राजनीतिक, दोनों तरह का रिश्ता बनाने की कोशिश की.

बसपा की कमजोरी किसके काम आएगी?
यह सवाल हर चुनाव से पहले पूछा जाता है कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी पहले जैसी ताकत में नहीं दिख रही. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसका पूरा वोट बैंक किसी दूसरी पार्टी की जेब में चला जाएग

ा. दलित समाज एकरूप नहीं है. जाटव, पासी, वाल्मीकि, कोरी, धोबी, खटीक जैसी कई उपजातियां हैं और हर समुदाय का राजनीतिक व्यवहार अलगअलग हो सकता है. कुछ इलाकों में बसपा अब भी असर रखती है.कई जगह बीजेपी मजबूत है. कुछ क्षेत्रों में कांग्रेस अपनी वापसी की कोशिश कर रही है. यानी दलित वोट अब पहले की तरह एकमुश्त किसी एक पार्टी के साथ नहीं जाता.

क्या सिर्फ जाति का गणित काफी होगा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति की अहमियत कभी खत्म नहीं होगी. लेकिन अब सिर्फ जातीय समीकरण चुनाव नहीं जिताते. आज का वोटर यह भी देखता है कि उसके घर कौनसी योजना पहुंची, सड़क बनी या नहीं, कानूनव्यवस्था कैसी है, स्थानीय विधायक कैसा है और सरकार ने पांच साल में क्या किया. यही वजह है कि हर चुनाव में जाति के साथ विकास, नेतृत्व और कल्याणकारी योजनाएं भी निर्णायक भूमिका निभाती हैं.

आखिर 3221 फॉर्मूला कितना मजबूत है?
अगर कागज पर देखें तो यह फॉर्मूला शानदार लगता है. एक तरफ सपा का मजबूत आधार और दूसरी तरफ दलित वोट का बड़ा हिस्सा. लेकिन राजनीति में वोट सिर्फ जोड़ने से नहीं मिलते, भरोसा जीतना पड़ता है. कांग्रेस को पहले यह साबित करना होगा कि वह दलितों की स्वाभाविक राजनीतिक पसंद फिर बन सकती है. समाजवादी पार्टी को यह भरोसा दिलाना होगा कि उसकी राजनीति सिर्फ यादवों तक सीमित नहीं है. और दोनों दलों को मिलकर बीजेपी की उस पकड़ को कमजोर करना होगा, जो उसने पिछले दस साल में योजनाओं, संगठन और सामाजिक पहुंच के दम पर बनाई है. यही इस फॉर्मूले की सबसे बड़ी परीक्षा है.

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