रूस पर प्रतिबंध लगाने और उसकी एनर्जी से दूरी बनाने की कोशिशों के बीच यूरोप का रुख विरोधाभासी नजर आ रहा है. एक तरफ यूरोपीय देश रूस से तेल और गैस की खरीद कम करने की बात कर रहे हैं. अमेरिका के रूस पर प्रतिबंध हटाए जाने पर नाराज हो रहे हैं. वहीं, दूसरी तरफ रूस से LNG भी बड़ी मात्रा में खरीद रहे हैं. जर्मन रिसर्च ग्रुप उर्गेवाल्ड के मुताबिक, जनवरी से सितंबर 2026 के बीच यूरोपीय यूनियन के बंदरगाहों पर 1.2 करोड़ टन से ज्यादा रूसी आर्कटिक LNG पहुंची. यह पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 9.5% ज्यादा है. इस मामले में फ्रांस सबसे आगे है.

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रूस से जुड़े एनर्जी प्रतिबंधों में ढील देने के फैसले पर भी यूरोपीय नेताओं ने नाराजगी जताई है. यूरोपीय यूनियन ने रूसी डीजल पर प्रतिबंध अस्थायी रूप से हटाने के अमेरिकी फैसले पर खेद जताया. ऐसे में सवाल है कि जब यूरोप रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखना चाहता है और अमेरिका के फैसले से खुश नहीं है, तो वह रूस से गैस खरीद क्यों बढ़ा रहा है? यूरोपीय देशों की ऐसी क्या गरारी अटक रही है कि वे एक तरफ रूस की आलोचना भी कर रहे हैं और दूसरी तरफ रूसी गैस से भरे जहाजों को अपने बंदरगाहों पर आने भी दे रहे हैं?
विरोध के बावजूद रूस से गैस क्यों खरीद रहा यूरोप?
यूरोप के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी एनर्जी जरूरतों को पूरा करना है. रूसयूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने रूसी एनर्जी पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश की है. इसके बावजूद रूस से गैस की खरीद पूरी तरह बंद नहीं हुई है.
कच्चे तेल के मुकाबले नेचुरल गैस की सप्लाई का सिस्टम अलग है. पाइपलाइन, LNG टर्मिनल, गैस स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए खास इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है. ऐसे में किसी एक सप्लायर की जगह दूसरे देश से तुरंत और पूरी मात्रा में गैस मंगाना आसान नहीं होता. एनर्जी की मांग, गैस की उपलब्धता और कीमतें भी खरीद के फैसलों को प्रभावित करती हैं.
LNG को जहाजों के जरिए एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाया जा सकता है. लेकिन इसके लिए गैस को लिक्विड बनाने, जहाजों से ट्रांसपोर्ट करने और उसे दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाने वाले इंपोर्ट टर्मिनल की जरूरत होती है. इसलिए यूरोप के जिन देशों के पास रूसी LNG मंगाने की व्यवस्था है. उनके लिए दूसरे देशों से गैस खरीदने की ओर पूरी तरह शिफ्ट होने में समय लग सकता है. यही वजह है कि रूस पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव बनाए रखने की कोशिशों के बावजूद यूरोप के कुछ देश उससे गैस खरीद रहे हैं.
अमेरिका ने रूस पर प्रतिबंधों में क्यों दी ढील?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के जरिए रूस से जुड़े कई प्रस्तावित प्रतिबंधों को रोक दिया. इस महीने की शुरुआत में ट्रंप ने रूसी डीजल को ग्लोबल मार्केट में लाने के लिए एक समझौते की घोषणा की थी. अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि इससे एनर्जी की बढ़ती कीमतों को कम करने में मदद मिल सकती है. ईरान के खिलाफ अमेरिकाइजराइल संघर्ष के दौरान एनर्जी मार्केट में कीमतों पर दबाव बढ़ा था.
अमेरिकी ट्रेजरी ने अप्रैल 2027 तक रूसी डीजल की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों में छूट दी है. हालांकि, यूरोप को चिंता है कि रूस से एनर्जी खरीदने को लेकर अमेरिका का यह कदम प्रतिबंधों के जरिए बनाए जा रहे दबाव को कमजोर कर सकता है. लेकिन जब यूरोप के गैस खरीद के आंकड़े देखते हैं, तो उसकी यह चिंता विरोधाभासी नजर आती है.
9 महीने में कितना बढ़ा रूसी LNG का इंपोर्ट?
जर्मन रिसर्च ग्रुप उर्गेवाल्ड के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से सितंबर 2026 के बीच यूरोपीय संघ के बंदरगाहों पर 1.2 करोड़ टन से ज्यादा रूसी आर्कटिक LNG पहुंची. पिछले साल की इसी अवधि में इसके मुकाबले इंपोर्ट कम था. इस तरह सालाना आधार पर इसमें 9.5% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
थिंक टैंक सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के मुताबिक, सितंबर में यूरोपीय यूनियन के देशों ने रूस से 81.7 करोड़ यूरो की पाइपलाइन गैस और 61.5 करोड़ यूरो की LNG इंपोर्ट की. यानी रूस से यूरोप पहुंचने वाली गैस में पाइपलाइन के जरिए आने वाली गैस और जहाजों से पहुंचने वाली LNG, दोनों शामिल हैं. LNG के इंपोर्ट में बढ़ोतरी यूरोप की एनर्जी पॉलिसी के सामने मौजूद चुनौती को दिखाती है.
फ्रांस और नीदरलैंड रूसी LNG के बड़े खरीदार
CREA के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में यूरोपीय यूनियन के देशों में फ्रांस और नीदरलैंड रूसी LNG के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल रहे. फ्रांस ने 44.6 करोड़ यूरो और नीदरलैंड ने 11.6 करोड़ यूरो की LNG इंपोर्ट की. फ्रांस का LNG इंपोर्ट पिछले महीने के मुकाबले 103% बढ़ गया.
वहीं, रूसी पाइपलाइन गैस के इंपोर्ट में हंगरी सबसे आगे रहा. सितंबर में उसने 41.4 करोड़ यूरो यानी करीब 4,300 करोड़ रुपये की गैस खरीदी. स्लोवाकिया ने 1,700 करोड़ रुपये और बुल्गारिया ने करीब 1,400 करोड़ रुपये की पाइपलाइन गैस खरीदी है.
LNG और रूसी पाइपलाइन में अंतर
रूसी LNG और रूसी पाइपलाइन गैस में मुख्य अंतर इन्हें सप्लाई करने के तरीके का है. LNG यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस में प्राकृतिक गैस को करीब माइनस 162 डिग्री सेल्सियस पर ठंडा करके लिक्विड बनाया जाता है और खास जहाजों के जरिए दूसरे देशों तक पहुंचाया जाता है. वहां टर्मिनल पर इसे दोबारा गैस में बदला जाता है. वहीं, पाइपलाइन गैस को गैस के रूप में ही बड़ी पाइपलाइनों के जरिए एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाया जाता है. LNG को समुद्री रास्ते से उन देशों तक भी भेजा जा सकता है, जहां रूस से सीधे पाइपलाइन कनेक्शन नहीं है, जबकि पाइपलाइन गैस की सप्लाई के लिए पाइपलाइन नेटवर्क का होना जरूरी है.
अगर पूरी तस्वीर देखें तो समझ आता है कि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि यूरोप रूस से गैस क्यों खरीद रहा है, बल्कि यह भी है कि वह दूसरे देशों से गैस मंगाने का इंतजाम कितनी जल्दी कर सकता है. जब तक एनर्जी की जरूरत और सप्लाई के बीच यह अंतर बना रहेगा, रूस से गैस खरीद पूरी तरह बंद करना यूरोप के लिए एक बड़ी चुनौती बना रह सकता है और यूरोप का चाहकर भी पूरी तरीके से रूस से दूरी बनाना कठिन होगा.



