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फोर्स्ड लेबर के नाम पर भारत पर 10% एक्स्ट्रा टैरिफ, क्या है इसका मतलब?

अमेरिका ने भारत से आने वाले कुछ सामानों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की है. यह कार्रवाई फोर्स्ड लेबर यानी जबरन मजदूरी से जुड़ी चिंताओं के आधार पर की गई है. अमेरिका ने कई व्यापारिक साझेदार देशों की नीतियों की समीक्षा के बाद यह कदम उठाया है. भारत को 10 प्रतिशत की अपेक्षाकृत कम दर वाले समूह में रखा गया है.

फोर्स्ड लेबर के नाम पर भारत पर 10% एक्स्ट्रा टैरिफ, क्या है इसका मतलब?

यह टैरिफ बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, ब्रिटेन समेत कई एशियाई देशों के साथ ही लैटिन अमेरिकी कुछ देशों पर भी लगाया गया है. आइए इसी बहाने समझते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में फोर्स्ड लेबर क्या है?

क्या है फोर्स्ड लेबर की परिभाषा?

किसी व्यक्ति से उसकी मर्जी के बिना काम कराना फोर्स्ड लेबर की श्रेणी में आता है. यदि कोई मजदूर नौकरी छोड़ना चाहता है, लेकिन उसे जाने नहीं दिया जाता, तो यह जबरन मजदूरी हो सकती है. यदि उसे धमकाकर काम कराया जाता है, तब भी मामला गंभीर हो सकता है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन फोर्स्ड लेबर को मानवाधिकारों का उल्लंघन मानता है. इसमें काम करने वाले व्यक्ति की सहमति वास्तव में स्वतंत्र नहीं होती. वह किसी दबाव में काम कर रहा होता है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन फोर्स्ड लेबर को मानवाधिकारों का उल्लंघन मानता है. फोटो: AI PIC

केवल कम वेतन फोर्स्ड लेबर नहीं

हर कम वेतन वाली नौकरी को फोर्स्ड लेबर नहीं कहा जा सकता. कई देशों में मजदूरों को कम मजदूरी मिलती है. काम के घंटे भी लंबे हो सकते हैं. यह श्रम अधिकारों का मुद्दा जरूर हो सकता है, लेकिन फोर्स्ड लेबर साबित करने के लिए दबाव या नियंत्रण के ठोस संकेत देखे जाते हैं. मिसाल के तौर पर, कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से कम वेतन पर काम कर रहा है और कभी नौकरी छोड़ सकता है. ऐसी स्थिति फोर्स्ड लेबर की कानूनी परिभाषा में हमेशा नहीं आएगी. लेकिन यदि उसे वेतन न देने, पुलिस कार्रवाई, हिंसा, कर्ज या पासपोर्ट जब्त करने का डर दिखाया जाए, तो मामला अलग हो जाता है.

फोर्स्ड लेबर के प्रमुख संकेत क्या हैं?

फोर्स्ड लेबर की पहचान कई संकेतों से की जाती है. इनमें नौकरी छोड़ने की आजादी न होना, मजदूर को धमकी देना, मारपीट या हिंसा का डर दिखाना, पासपोर्ट, पहचान पत्र या अन्य दस्तावेज छीन लेना, वेतन रोक लेना, बहुत अधिक कर्ज देकर बांध देना, मजदूर की आवाजाही पर रोक लगाना, भर्ती के नाम पर भारी शुल्क वसूलना, बच्चों से खतरनाक या बाध्यकारी काम कराना, मजदूर को अलगथलग रखकर नियंत्रण करना आदि प्रमुख हैं. इन संकेतों में से एक या कई बातें किसी मामले को संदेह के घेरे में ला सकती हैं.

फोर्स्ड लेबर की पहचान कई संकेतों से की जाती है. फोटो: Pexels

कर्ज के जरिए मजदूरी का जाल

फोर्स्ड लेबर का एक आम रूप कर्ज से जुड़ा होता है. इसे बंधुआ मजदूरी भी कहा जाता है. मान लीजिए, किसी मजदूर को भर्ती एजेंट विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर बड़ा कर्ज दे देता है. बाद में मजदूर को बताया जाता है कि वह कर्ज चुकाए बिना नौकरी नहीं छोड़ सकता. उसका वेतन भी काट लिया जाता है. ऐसी स्थिति में मजदूर आर्थिक जाल में फंस जाता है. कई बार कर्ज इतना बढ़ा दिया जाता है कि मजदूर वर्षों तक उसे चुका नहीं पाता. यही स्थिति अंतरराष्ट्रीय व्यापार में गंभीर चिंता का विषय बनती है.

दस्तावेज जब्त करना भी बड़ा संकेत

विदेशी मजदूरों के मामलों में पासपोर्ट जब्त करना एक गंभीर संकेत माना जाता है. पासपोर्ट न होने पर व्यक्ति देश छोड़ने या नई नौकरी खोजने में कठिनाई महसूस करता है. नियोक्ता इस स्थिति का गलत फायदा उठा सकता है. यदि कंपनी सुरक्षा के लिए दस्तावेज रखती भी है, तो मजदूर को उन्हें आसानी से वापस पाने का अधिकार होना चाहिए. जब दस्तावेज रोककर मजदूर की स्वतंत्रता सीमित की जाए, तब यह फोर्स्ड लेबर की आशंका पैदा करता है.

बच्चों से कराया गया जबरन काम

बाल श्रम और फोर्स्ड लेबर जुड़े हुए मुद्दे हैं, लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हैं. हर बाल श्रम फोर्स्ड लेबर नहीं होता. फिर भी, यदि बच्चों को धमकी, कर्ज, तस्करी या दबाव के कारण काम पर लगाया जाता है, तो यह गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन है. खतरनाक फैक्ट्रियों, खदानों, खेतों या अवैध गतिविधियों में बच्चों से काम कराना विशेष चिंता का विषय है. अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में ऐसी सामग्री मिलने पर कंपनियों और देशों की जवाबदेही बढ़ जाती है.

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में यह मुद्दा क्यों अहम है?

आज एक उत्पाद कई देशों से होकर बनता है. कपड़ा एक देश में उगाए गए कपास से बन सकता है. धागा दूसरे देश में तैयार हो सकता है. कपड़ा तीसरे देश में सिला जा सकता है. फिर अंतिम उत्पाद चौथे देश से अमेरिका या यूरोप भेजा जा सकता है. इसे ग्लोबल सप्लाई चेन कहा जाता है. इस व्यवस्था में किसी एक स्तर पर फोर्स्ड लेबर का आरोप पूरे उत्पाद को विवादित बना सकता है। खरीदार देश यह सवाल उठाते हैं कि उत्पाद के निर्माण में श्रमिकों के अधिकारों का सम्मान हुआ या नहीं?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप.

अमेरिका का रुख क्या है?

अमेरिका लंबे समय से फोर्स्ड लेबर से बने सामान के आयात पर रोक या कार्रवाई की नीति रखता है. उसका तर्क है कि ऐसे उत्पाद सस्ते पड़ते हैं क्योंकि मजदूरों को उचित स्वतंत्रता, मजदूरी या सुरक्षा नहीं मिलती. इससे उन कंपनियों को अनुचित लाभ मिल सकता है जो श्रम कानूनों का पालन नहीं करतीं. दूसरी ओर, नियमों का पालन करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ती है. इसी वजह से अमेरिका फोर्स्ड लेबर को मानवाधिकार के साथसाथ निष्पक्ष व्यापार का मुद्दा भी मानता है. अमेरिका ने इसे आधार बनाकर भारत सहित कई देशों पर नए शुल्क लगाए हैं. यह कार्रवाई अमेरिकी ट्रेड एक्ट, 1974 की धारा 301 के तहत बताई गई है.

भारत पर 10 प्रतिशत टैरिफ का संदर्भ

अमेरिका ने भारत को उन देशों के समूह में रखा है जिनके आयात पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया है. अमेरिका ने ऐसे देशों से अधिक सख्त कदम उठाने को कहा है जो फोर्स्ड लेबर से जुड़े सामान के आयात को रोकने में पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर पाए हैं. यह कहना सही नहीं होगा कि भारत के हर उत्पाद या हर उद्योग पर फोर्स्ड लेबर का आरोप है. व्यापक नीति स्तर पर यह टैरिफ दबाव का एक साधन है. इसका उद्देश्य सप्लाई चेन की जांच, पारदर्शिता और श्रम मानकों के पालन को बढ़ाना बताया जा रहा है.

भारतीय निर्यातकों पर कितना पड़ेगा असर?

अतिरिक्त टैरिफ से भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं. यदि उत्पाद महंगा होगा, तो अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों के विकल्प तलाश सकते हैं. निर्यातक अपनी कीमत कम करने का दबाव भी महसूस कर सकते हैं. इससे उनके मुनाफे पर असर पड़ सकता है. टेक्सटाइल, गारमेंट्स, चमड़ा, जेम्स एंड ज्वेलरी, कृषि उत्पाद और कुछ इंजीनियरिंग सामान जैसे क्षेत्रों पर असर की आशंका जताई जा रही है. हालांकि, वास्तविक प्रभाव उत्पाद, बाजार, पहले से लागू शुल्क और खरीदारों के व्यवहार पर निर्भर करेगा.

इस तरह कहा जा सकता है कि फोर्स्ड लेबर मानवाधिकार और व्यापार, दोनों का मुद्दा है. इसका मतलब किसी व्यक्ति से दबाव, डर या नियंत्रण के जरिए काम कराना है. अंतरराष्ट्रीय बाजार अब सिर्फ उत्पाद की कीमत नहीं देखता. वह यह भी देखता है कि उत्पाद किन परिस्थितियों में बना है. अमेरिका का अतिरिक्त टैरिफ इसी बदलते व्यापारिक माहौल का संकेत है. भारत के लिए चुनौती यह है कि वह श्रमिक अधिकारों की रक्षा मजबूत करे, सप्लाई चेन को पारदर्शी बनाए और निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करे. इससे केवल टैरिफ का जोखिम कम नहीं होगा, बल्कि भारतीय उत्पादों के प्रति भरोसा भी बढ़ेगा.

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