DharamIndiaTrending

मां पार्वती के 10 महाविद्या स्वरूपका रहस्य क्या है? दर्शन कर शिवजी भी रह गए थे चकित…

मां पार्वती के 10 महाविद्या स्वरूपका रहस्य क्या है? दर्शन कर शिवजी भी रह गए थे चकित…

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अधिकांश व्यक्ति मोह-माया से ग्रसित है जिसके कारण सभी के अंदर दैवीय शक्ति के साथ आसुरी शक्ति के अंश भी विद्यमान रहते हैं, इस आसुरी शक्ति के मोह का नाश देवी पूजन करने से होता है, देवी का भक्त अध्यात्म के डगर पर श्रद्धा से निर्भीक होकर आगे बढ़ता है तथा इस लोक में सफलता प्राप्त करने के साथ परलोक में भी अपना स्थान सुखद बनाता है। देवी पावर्ती के अन्दर विराजमान हैं समस्त शक्तियां।

दशमहाविद्या दस प्रकार की शक्तियों का प्रतीक हैं और अलग-अलग कार्यों हेतु शिव के वरदान स्वरूप इनकी उत्पत्ति हुई है। दसमाविद्या साधक को भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती है। दशमहाविद्या माता पार्वती के शरीर से ही प्रकट हुई हैं। जब देवाधिदेव महादेव ने मां पार्वती को पिता दक्ष के यज्ञ में जाने से मना कर दिया तब अपनी अवहेलना होते देख मां पार्वती क्रोधित हो गईं और उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया। शिव जी ने जब ध्यान से देखा तो पार्वती के दसों दिशाओं में विभिन्न दैवीय रूप को स्तम्भित हो गए।

मां पार्वती के 10 महाविद्या रूप
मां पार्वती ने शिव जी को अपने दस महाविद्या स्वरूप का दर्शन कराते हुए बताया कि, ‘‘स्वामी! आपके समक्ष जो कृष्ण-वर्णा देवी स्थित हैं वह ‘काली’ हैं, आपके ऊपर महाकाल स्वरूपिणी जो नील-वर्णा देवी हैं वह ‘तारा’ हैं, आपके पश्चिम में श्याम वर्णा और कटे हुए शीश को उठाए जो देवी खड़ी हैं वह ‘छिन्नमस्तिका’ हैं, आपके बाईं तरफ देवी ‘भुवनेश्वरी’ खड़ी हैं, आपके पृष्ठ पर शत्रु मर्दन करने वाली देवी ‘बगलामुखी’ खड़ी हैं, आपके अग्निकोण में विधवा रूपिणी ‘धूमावती’ खड़ी हैं, नैऋत्य कोण में देवी ‘त्रिपुरसुन्दरी’ खड़ी हैं, वायव्य कोण पर ‘मातंगी’ खड़ी हैं, ईशान कोण पर देवी ‘षोडशी’ खड़ी हैं तथा ‘भैरवी’ रूप होकर मैं स्वयं उपस्थित हूं।’’

कैसा है मां धूमावती का स्वरूप
सभी महाविद्याओं में धूमावती का रूप अत्यंत विद्रुप है। इन्होंने ऐसा रूप शत्रुओं के हृदय में भय-संचार के लिए अपना रखा है। इनका अंतर यद्यपि करुणा पूर्ण है, किंतु बाह्य रूप अत्यंत ही विकट है। विधवा हैं, वर्ण विवर्ण है, यह मलिन वस्त्र धारण करती हैं। केश उन्मुक्त और रुक्ष हैं। इनके रथ के ध्वज पर काक का चिन्ह है तथा इनके पयोधर शिथिल और लटके हुए हैं। इन्होंने हाथ में शूर्प धारण कर रखा है। इनकी नाक बडी एवं फैली है तथा नेत्र कुटिल हैं।

धर्मशास्त्रों में प्राप्त विवरण अनुसार यह देवी शत्रुओं के भक्षण एवं उनके रक्त-पान के लिए तत्पर रहती हैं, यह भय-कारक एवं कलह-प्रिय हैं। जगत की अमांगल्यपूर्ण अवस्था की अधिष्ठात्री के रूप में ये देवी त्रिवर्णा, विरलदंता, चंचलाविधवा, मुक्तकेशी, शूर्पहस्ता, कलहप्रिया, काकध्वजिनी आदि विशेषणों से वर्णित हैं। ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी को बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता धूमावती के दर्शन कर उन्हें धार्मिक मान्यता के अनुरूप काले तिल की पोटली व नारियल का गोला अर्पित कर मन्नत मांगते हैं।

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply