अमेरिकी बॉन्ड बाजार में बिकवाली तेज होने से वैश्विक वित्तीय बाजारों की चिंता बढ़ गई है. अमेरिका की 30 साल की ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड 5.444% तक पहुंच गई, जो 2004 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. वहीं 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड भी 5.145% तक पहुंच गई, जो ग्लोबल वित्तीय परिसंपत्तियों की कीमत तय करने में अहम भूमिका निभाती है.

बॉन्ड यील्ड बढ़ने का मतलब क्या है?
बॉन्ड की कीमत और उसकी यील्ड एकदूसरे के उलट चलती हैं. जब निवेशक बड़ी मात्रा में बॉन्ड बेचते हैं, तो उनकी कीमत गिरती है और यील्ड बढ़ती है. मौजूदा तेजी को अमेरिका की मजबूत आर्थिक गतिविधियों, महंगाई की चिंता, ऊंचे सरकारी कर्ज और तेल की बढ़ती कीमतों से जोड़कर देखा जा रहा है.
सितंबर में अमेरिका के सर्विसेज PMI की रीडिंग 58.7 रही, जो करीब पांच साल का सबसे मजबूत स्तर है. मैन्युफैक्चरिंग PMI भी 56.7 पर पहुंच गया, जो चार साल से ज्यादा समय का उच्च स्तर है. मजबूत आर्थिक आंकड़ों से बाजार में यह उम्मीद बढ़ी है कि फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को ज्यादा समय तक ऊंचा रख सकता है.
फेड की ब्याज दर का डर क्यों बढ़ा?
बॉन्ड यील्ड में तेजी के बीच फेड की अगली बैठक पर बाजार की नजर है. रिपोर्ट के मुताबिक, फेड फंड्स फ्यूचर्स बाजार में अक्टूबर में दर बढ़ने की संभावना 66% तक पहुंच गई, जबकि इससे पहले यह 53% थी. एक महीने पहले यह संभावना 10% से भी कम थी.
अगर अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो अमेरिकी सरकारी बॉन्ड निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं. ऐसे माहौल में उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी पर दबाव बढ़ सकता है. इससे भारत जैसे बाजारों में इक्विटी वैल्यूएशन और विदेशी निवेश प्रभावित होने की आशंका रहती है.
भारतीय शेयर बाजार पर क्या असर पड़ा?
24 सितंबर को अमेरिकी यील्ड में उछाल और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच भारतीय शेयर बाजार में भी दबाव देखने को मिला. सेंसेक्स 1,247.71 अंक यानी 1.67% गिरकर 73,580.54 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 383.70 अंक यानी 1.64% गिरकर 23,063.10 पर आ गया.
भारतीय बाजार के लिए चिंता सिर्फ अमेरिकी बॉन्ड यील्ड नहीं है. कच्चे तेल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाना भी महंगाई और भारत के आयात बिल पर दबाव डाल सकता है. इससे बाजार की चिंता बढ़ी है.
क्या बाजार में आगे भी गिरावट का जोखिम है?
आगे की दिशा कई संकेतकों पर निर्भर करेगी. अमेरिकी महंगाई, रोजगार और आर्थिक आंकड़े, फेड का रुख, बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की कीमतें बाजार के लिए अहम रहेंगी. फिलहाल ऊंची अमेरिकी यील्ड और महंगे तेल ने वैश्विक शेयर बाजारों के लिए जोखिम बढ़ाया है, लेकिन इससे भविष्य की गिरावट को निश्चित नहीं माना जा सकता.



