
शिव रूद्राष्टकम का वर्णन तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के उत्तरकांड में आता है। रामायण में ही इसका जिक्र है। जिसमें यह लिखा गया है। रामायण में जब कागभुशुण्डि जी गरूड़ को अपने पूर्व जन्म की कथा सुनाते हैं वो उस घटना का वर्णन करते हैं जब वो शिव की पूजा में लगे थे तो तभी उनके गुरु वहां आ पहुंचे। लेकिन कागभुशुण्डि जी ने अभिमानवश उन्हें प्रणाम नहीं किया। गुरुजी भी बुरा ना मानें, लेकिन शिव को इस बात पर बहुत गुस्सा आया। पर गुरुका अपमान बहुत बड़ा पाप है; अतः महादेवजी उसे नहीं सह सके। मन्दिर में आकाशवाणी हुई कि अरे हतभाग्य! मूर्ख! अभिमानी ! तुझको मैं शाप दूंगा, नीतिका विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता। तू गुरुक सामने अजगरकी भांति बैठा रहा। इस अधोगति (सर्पकी नीची योनि) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़ के खोखले में जाकर रह। शिवजी का भयानक शाप सुनकर गुरुजी ने हाहाकार किया। वे श्रीशिवजी के सामने हाथ जोड़कर मेरी लिए विनती करने लगे वो विनती ही शिव रुद्राष्टकम बनी। ऐसे लिखा गया था शिव रुद्राष्टकम
श्री शिव रूद्राष्टकम
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम् ॥
निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम् ॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥
चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥
प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम् ।
त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम् ॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम् सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥
रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये
ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति।।



