
चंगनास्सेरी, केरल: बारिश का नाम सुनते ही मन में पानी की बूंदों की तस्वीर आती है, लेकिन क्या आपने कभी लाल रंग की बारिश के बारे में सुना है? केरल में साल 2001 के दौरान ऐसी ही एक असामान्य घटना सामने आई थी। बारिश का पानी लाल रंग का दिखाई देने लगा था। लोगों ने जब इस पानी को बर्तनों में इकट्ठा किया, तो उसका रंग देखकर वे हैरान रह गए। कुछ जगहों पर कपड़ों पर भी लाल दाग पड़ गए थे।
शुरुआत में इस घटना को लेकर कई तरह की आशंकाएं जताई गईं। किसी ने इसे खून की बारिश कहा, तो किसी ने इसके पीछे उल्कापिंड और अंतरिक्ष से आए कणों की संभावना बताई। मामला इतना चर्चा में आया कि वैज्ञानिकों ने बारिश के पानी के नमूने इकट्ठा करके उनकी जांच शुरू कर दी।
25 जुलाई 2001 को पहली बार सामने आई थी लाल बारिश
इस घटना की शुरुआत 25 जुलाई 2001 को केरल के कोट्टायम जिले के चंगनास्सेरी इलाके में हुई थी। सुबह करीब 8:30 बजे यहां लाल रंग की बारिश दर्ज की गई। इसके बाद राज्य के कई अन्य हिस्सों से भी ऐसी बारिश की खबरें सामने आने लगीं।
यह घटना एक-दो दिन तक सीमित नहीं रही। 25 जुलाई से 23 सितंबर 2001 तक अलग-अलग इलाकों में लाल रंग की बारिश की घटनाएं दर्ज की गईं। कुछ जगहों पर बारिश का रंग लाल था, जबकि कुछ स्थानों से पीले रंग की बारिश की भी खबरें आईं।
सबसे हैरानी की बात यह थी कि कई बार सामान्य बारिश और लाल बारिश आसपास के अलग-अलग इलाकों में दर्ज की गई। इस वजह से वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि आखिर बारिश के पानी का रंग अचानक कैसे बदल रहा है?
वैज्ञानिकों ने पानी की जांच की तो सामने आई चौंकाने वाली बात
लाल बारिश के रहस्य को समझने के लिए केरल के सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज (CESS) और ट्रॉपिकल बॉटैनिकल गार्डन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (TBGRI) के वैज्ञानिकों ने पानी के नमूनों की जांच की।
जांच में पता चला कि बारिश के पानी में बड़ी संख्या में बेहद छोटे लाल रंग के कण मौजूद थे। ये कण कुछ समय तक पानी में तैरते रहते थे और बाद में नीचे बैठ जाते थे।
जब इन कणों को माइक्रोस्कोप से देखा गया, तो वे सूक्ष्म जीवों के बीजाणुओं जैसे दिखाई दिए। आगे की जांच में इन्हें ‘ट्रेंटेपोहलिया’ (Trentepohlia) नाम के शैवाल के समूह से जुड़ा पाया गया।
पेड़ों और दीवारों पर उगने वाले लाइकेन से जुड़ा था मामला
वैज्ञानिकों की जांच में एक और दिलचस्प जानकारी सामने आई। चंगनास्सेरी इलाके में पेड़ों, चट्टानों और बिजली के खंभों पर लाइकेन काफी मात्रा में मौजूद थे। लाइकेन एक ऐसा जीवित समुदाय है, जिसमें शैवाल और कवक साथ रहते हैं।
वैज्ञानिकों ने इलाके से लाइकेन के नमूने लेकर प्रयोगशाला में उनका अध्ययन किया। जांच में इनसे विकसित हुए शैवाल बारिश के पानी में मिले कणों से मिलते-जुलते पाए गए।
नवंबर 2001 में सामने आई CESS और TBGRI की रिपोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि लाल बारिश का रंग स्थानीय स्तर पर मौजूद लाइकेन बनाने वाले शैवाल के बीजाणुओं की वजह से होने की सबसे अधिक संभावना थी।
यानी बारिश में खून नहीं मिला था, बल्कि लाल रंग के सूक्ष्म जैविक कण पानी के साथ नीचे आए थे।
क्या अंतरिक्ष से आए थे ये लाल कण?
लाल बारिश की घटना के बाद कुछ वैज्ञानिकों ने यह संभावना भी जताई कि ये कण पृथ्वी के बाहर से आए हो सकते हैं। वर्ष 2006 में भौतिक विज्ञानी गॉडफ्रे लुईस और ए. संथोष कुमार ने एक शोधपत्र प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने इन कणों के संभावित बाहरी अंतरिक्ष से आने की परिकल्पना पर चर्चा की थी।
इस विचार ने दुनिया भर में उत्सुकता बढ़ा दी। हालांकि, अंतरिक्ष से जीवन या कणों के आने का दावा प्रमाणित नहीं हुआ। इसे एक परिकल्पना के रूप में ही देखा जाता है। उपलब्ध सरकारी जांच में स्थानीय शैवाल के बीजाणुओं को लाल रंग का संभावित कारण बताया गया था।
क्या केरल में दोबारा भी हुई है ऐसी बारिश?
साल 2001 की घटना के बाद भी केरल में कुछ वर्षों में रंगीन बारिश की खबरें सामने आईं। 2012 और 2013 में भी ऐसी घटनाएं दर्ज की गईं। लाल बारिश की घटना ने वैज्ञानिकों के साथ-साथ आम लोगों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा।
केरल की यह घटना आज भी मौसम और पर्यावरण से जुड़ी सबसे चर्चित असामान्य घटनाओं में गिनी जाती है। जिस बारिश को देखकर लोगों को खून बरसने का भ्रम हुआ था, उसके पीछे वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म शैवाल के कणों की भूमिका बताई।
Satya Report डिस्क्लेमर: यह लेख 2001 में केरल में हुई लाल बारिश और वैज्ञानिक जांच पर आधारित है। बारिश के पानी में खून होने या कणों के अंतरिक्ष से आने का कोई प्रमाण नहीं मिला। लाल रंग के लिए शैवाल के बीजाणुओं को संभावित कारण माना गया था।



