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भगवान शिव ने मगरमच्छ बनकर क्यों ली थी माता पार्वती की परीक्षा? जानें इस अद्भुत पौराणिक कथा का रहस्य

भगवान शिव ने मगरमच्छ बनकर क्यों ली थी माता पार्वती की परीक्षा? जानें इस अद्भुत पौराणिक कथा का रहस्य

सावन माह में भगवान शिव की आराधना करने के साथ कथा सुनने का भी महत्व है। शिव पुराण में भगवान शिव से जुड़े कई प्रसंग वर्णित हैं। इसमें भगवान शिव के अवतारों और वरदान से जुड़ी कथाएं भी वर्णित हैं। आज हम आपको बता रहे हैं कि आखिर क्यों भगवान शिव ने मगरमच्छ का रूप धारण कर माता पार्वती की परीक्षा ली थी। पढ़ें यहां कथा।

जब लड़के को मगरमच्छ ने पकड़ लिया

भगवान शिव प्रकट हुए और माता पार्वती को वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। इतने में जहां माता तप कर रही थीं, वहीं पास में मगरमच्छ ने एक लड़के को पकड़ लिया। लड़का जान बचाने के लिए चिल्ला रहा था। माता पार्वती लड़के की चीख नहीं सुन सकी और उसकी मदद के लिए तालाब के पास पहुंचीं। माता पार्वती ने देखा कि एक मगरमच्छ लड़के को अंदर की ओर ले जा रहा है।

लड़के ने माता पार्वती से कहा कि माता मेरी आप रक्षा करें। मेरी ना तो मां हैं और ना ही पिता। ना ही कोई मित्र। पार्वती जी ने मगरमच्छ से लड़के को छोड़ने के लिए कहा। मगरमच्छ बोला- दिन के छठे पहर में जो मिलता है, उसे अपना आहार समझ कर खाना मेरा नियम है। पार्वती जी ने कहा- इसे छोड़ दो, बदले में मुझसे जो चाहिए वह बता दो।

मगरमच्छ ने मांगा माता पार्वती से तप का फल

मगरमच्छ बोला- मैं एक ही शर्त पर छोड़ सकता हूं। आपने अपने तप से भगवान शिव से जो वरदान प्राप्त किया, अगर उसका फल आप मुझे दे दें, तो मैं इसे छोड़ दूंगा। माता पार्वती अपने तप का फल देने के लिए राजी हो गईं।

मगरमच्छ ने समझाया कि देवी सोच लीजिए। आपने हजारों वर्षों तक जैसा तप किया है वह देवी-देवताओं के लिए संभव नहीं है। पार्वती जी ने कहा कि उनका फैसला अडिग है। मगरमच्छ ने पार्वती माता से तपदान का संकल्प करवाया। तप का दान होते ही मगरमच्छ का शरीर चमकने लगा। मगर माता पार्वती से बोला- देवी आपके तप के प्रभाव से मैं तेजस्वी बन गया हूं। आपने अपने जीवन भर की पूंजी बच्चे के लिए व्यर्थ कर दी। आप चाहें मैं आपको एक और मौका दे सकता हूं।

माता पार्वती कहती हैं- मैं तप फिर से कर सकती हूं लेकिन तुम इस लड़के को निगल जाते, तो इसका जीवन वापस कैसे मिल पाता? देखते ही देखते मगरमच्छ और लड़का दोनों ही विलुप्त हो गए।

भगवान शिव हुए प्रकट

माता पार्वती के मन में विचार आया कि तप का फल दान कर दिया था। अब पुन: तप प्रारंभ करना चाहिए। पार्वती जी ने तप प्रारंभ करने के लिए संकल्प लिया। भगवान शिव प्रकट हुए और बोले- पार्वती, अब क्यों तप कर रही हो?

पार्वती जी ने भगवान शिव से कहा- मैंने अपने तप का फल दान कर दिया है। आपको पति के रूप में पाने के लिए वैसा ही घोर तप करूंगी और आपको प्रसन्न करूंगी। भोलेनाथ बोले- मगरमच्छ और लड़के के रूप में मैं ही था। मैंने परीक्षा लेने के लिए यह पूरी लीला रची थी। तुमने अपने तप का दान मुझे ही दिया है, इसलिए पुन: तप करने की आवश्यकता नहीं है। माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रणाम करते हुए प्रसन्न मन से विदा किया।

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