
जब भी कोई रॉकेट लॉन्च होता है, तो शुरुआत में वह आसमान की ओर बिल्कुल सीधा उठता दिखाई देता है। लेकिन कुछ ही देर बाद उसका रास्ता मुड़ने लगता है और वह तिरछी दिशा में उड़ने लगता है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर रॉकेट को अंतरिक्ष में जाना है, तो उसे सीधा ऊपर ही क्यों नहीं भेजा जाता? आखिर बीच रास्ते में उसकी दिशा क्यों बदल दी जाती है?
इसके पीछे कोई गलती नहीं, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत काम करता है। रॉकेट को केवल पृथ्वी से ऊपर उठना ही नहीं होता, बल्कि उसे पृथ्वी की कक्षा में पहुंचने के लिए सही गति और दिशा भी हासिल करनी होती है।
शुरुआत में रॉकेट सीधा क्यों उड़ता है?
रॉकेट लॉन्च होते ही सबसे पहले सीधा ऊपर उठता है, ताकि वह लॉन्च पैड और जमीन के आसपास मौजूद संरचनाओं से सुरक्षित दूरी बना सके। इसके अलावा शुरुआती उड़ान में उसे पृथ्वी के घने वायुमंडल से गुजरना होता है।
इस दौरान रॉकेट पर हवा का दबाव और खिंचाव लगता है। शुरुआत में सीधा ऊपर उठने से उसे शुरुआती ऊंचाई हासिल करने में मदद मिलती है। इसके बाद मिशन की योजना के अनुसार उसकी दिशा धीरे-धीरे बदली जाती है।
अंतरिक्ष में पहुंचने के लिए सिर्फ ऊंचाई काफी नहीं
बहुत से लोगों को लगता है कि रॉकेट का काम केवल पृथ्वी से ऊपर जाकर अंतरिक्ष तक पहुंचना है। लेकिन किसी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के लिए केवल ऊंचाई हासिल करना पर्याप्त नहीं होता।
उपग्रह को पृथ्वी के चारों ओर घूमते रहने के लिए पर्याप्त क्षैतिज गति भी चाहिए। यदि रॉकेट लगातार सीधा ऊपर जाता रहे, तो वह ऊंचाई तो हासिल कर सकता है, लेकिन उपग्रह को इच्छित कक्षा में स्थापित करने के लिए जरूरी गति और दिशा हासिल नहीं कर पाएगा।
इसीलिए रॉकेट को ऊपर उठने के साथ-साथ आगे की ओर भी तेज गति दी जाती है।
रॉकेट को तिरछा मोड़ने की प्रक्रिया क्या कहलाती है?
रॉकेट की उड़ान के दौरान दिशा बदलने की इस प्रक्रिया को आमतौर पर ग्रैविटी टर्न (Gravity Turn) कहा जाता है। इसमें रॉकेट शुरुआत में लगभग सीधा ऊपर उठता है और फिर धीरे-धीरे अपनी दिशा बदलते हुए क्षैतिज गति हासिल करता है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य रॉकेट को उसकी निर्धारित कक्षा तक कुशलता से पहुंचाना है। सही दिशा में मुड़ने से ईंधन का बेहतर इस्तेमाल करने और उड़ान के दौरान रॉकेट पर लगने वाले अनावश्यक दबाव को सीमित रखने में मदद मिलती है।
यह मोड़ अचानक या हर रॉकेट में एक जैसा नहीं होता। इसकी दिशा और समय रॉकेट के डिजाइन, मिशन और लक्ष्य कक्षा पर निर्भर करते हैं।
पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी है बड़ी वजह
पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण हर वस्तु को अपनी ओर खींचती है। उपग्रह को पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने के लिए ऐसी गति चाहिए, जिसमें वह लगातार पृथ्वी की ओर गिरने की अवस्था में रहते हुए उसकी सतह तक न पहुंचे।
आसान भाषा में समझें तो उपग्रह आगे की ओर इतनी तेजी से चलता है कि पृथ्वी की सतह उसकी गिरने की दिशा के साथ-साथ नीचे की ओर मुड़ती रहती है। इस तरह वह पृथ्वी से टकराने के बजाय कक्षा में घूमता रहता है।
इसी वजह से रॉकेट को केवल ऊंचाई नहीं, बल्कि सही दिशा में पर्याप्त गति भी हासिल करनी होती है।
अगर रॉकेट सीधा ऊपर जाता रहे तो क्या होगा?
अगर किसी रॉकेट को लगातार सीधा ऊपर भेजा जाए, तो वह ऊंचाई तो हासिल कर सकता है, लेकिन पृथ्वी की कक्षा में उपग्रह स्थापित करने के लिए आवश्यक क्षैतिज गति नहीं मिलेगी। मिशन के हिसाब से उसे बाद में दिशा और गति बदलनी पड़ सकती है।
कुछ अंतरिक्ष मिशनों में रॉकेट का रास्ता अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए, किसी विशेष प्रक्षेप पथ पर जाने या किसी दूसरे खगोलीय पिंड की ओर बढ़ने के लिए अलग उड़ान योजना बनाई जाती है। इसलिए हर रॉकेट का रास्ता एक जैसा नहीं होता।
रॉकेट का टेढ़ा उड़ना कोई गलती नहीं
रॉकेट का शुरुआत में सीधा उठना और फिर तिरछा होकर आगे बढ़ना एक सोची-समझी वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसका मकसद उसे केवल अंतरिक्ष तक पहुंचाना नहीं, बल्कि निर्धारित कक्षा या गंतव्य के लिए सही गति और दिशा देना है।
यही वजह है कि रॉकेट का रास्ता जमीन से देखने पर टेढ़ा नजर आता है। असल में, यह अंतरिक्ष मिशन को सफल बनाने के लिए की जाने वाली सटीक उड़ान योजना का हिस्सा है।
डिस्क्लेमर: यह लेख रॉकेट प्रक्षेपण और कक्षीय गति से जुड़े सामान्य वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। किसी विशेष मिशन का वास्तविक उड़ान मार्ग उसके डिजाइन और उद्देश्य के अनुसार अलग हो सकता है।



