
अक्टूबर-नवंबर का महीना आते ही मौसम में बदलाव महसूस होने लगता है। सर्दियों की शुरुआत के साथ कई इलाकों में शाम के समय हवा में एक तेज, मीठी और कुछ अलग तरह की खुशबू घुलने लगती है। कई लोग इस महक को पहचान नहीं पाते और सोचने लगते हैं कि आखिर यह खुशबू कहां से आ रही है। दरअसल, इसके पीछे सप्तपर्णी नाम का पेड़ हो सकता है, जिसे अंग्रेजी में ‘डेविल्स ट्री’ भी कहा जाता है।
इस पेड़ के फूल आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर के बीच खिलते हैं। इनकी तेज महक दूर तक फैल सकती है। खास बात यह है कि कुछ लोगों को इसकी खुशबू बेहद पसंद आती है, जबकि कुछ लोगों को इससे सिरदर्द और एलर्जी जैसी परेशानियां हो सकती हैं।
क्या है सप्तपर्णी पेड़ और कैसे पड़ा इसका नाम?
सप्तपर्णी का वैज्ञानिक नाम Alstonia scholaris है। इसकी पहचान इसके पत्तों से भी की जा सकती है। इसकी टहनियों पर पत्ते अक्सर एक ही स्थान से गोल घेरे में निकलते हैं। आमतौर पर एक घेरे में सात पत्ते दिखाई देते हैं। इसी बनावट के कारण इसे सप्तपर्णी नाम दिया गया है।
साल के ज्यादातर समय यह पेड़ सामान्य हरे-भरे पेड़ की तरह दिखाई देता है, लेकिन अक्टूबर से दिसंबर के बीच इस पर छोटे-छोटे सफेद या हल्के हरे रंग के फूल खिलते हैं। शाम के समय इन फूलों की महक अधिक महसूस हो सकती है। इसी वजह से दिवाली और सर्दियों की शुरुआत के आसपास कई जगहों पर इसकी खुशबू लोगों का ध्यान खींचती है।
क्यों कहा जाता है इसे ‘डेविल्स ट्री’?
सप्तपर्णी को अंग्रेजी में ‘डेविल्स ट्री’ कहा जाता है। इसके साथ पुराने समय से कई तरह की मान्यताएं और लोककथाएं जुड़ी हुई हैं। कुछ इलाकों में लोग इसे भूतों या रहस्यमयी शक्तियों से जोड़कर देखते थे।
हालांकि, इस नाम के पीछे किसी अलौकिक शक्ति का प्रमाण नहीं है। पेड़ की रात में फैलने वाली तेज महक और इसकी कुछ खास शारीरिक विशेषताओं ने शायद ऐसी धारणाओं को बढ़ावा दिया।
इसकी टहनियों या पत्तों को तोड़ने पर सफेद दूध जैसा रस निकलता है, जिसे लेटेक्स कहा जाता है। इस रस के संपर्क में आने से परेशानी हो सकती है, इसलिए इसे छूने या चखने से बचना चाहिए। पेड़ के किसी हिस्से को नुकसान पहुंचाने या उसके रस के साथ प्रयोग करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।
स्कूल की स्लेट और ब्लैकबोर्ड से भी जुड़ा है इसका इतिहास
सप्तपर्णी का संबंध केवल अपनी खुशबू और रहस्यमयी पहचान से ही नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल पुराने समय में पढ़ाई से जुड़ी चीजें बनाने में भी होता था।
इसकी लकड़ी हल्की और अपेक्षाकृत मुलायम होती है। पहले के समय में इसका उपयोग बच्चों की स्लेट और स्कूलों के ब्लैकबोर्ड बनाने के लिए किया जाता था। इसके वैज्ञानिक नाम Alstonia scholaris में ‘scholaris’ शब्द का संबंध विद्यार्थियों और शिक्षा से है।
यही वजह है कि इस पेड़ को पुराने स्कूलों और पढ़ाई के सामान से जुड़ी एक खास पहचान भी मिली।
आखिर इसकी खुशबू में ऐसा क्या है?
सप्तपर्णी के फूलों की तेज महक के पीछे कई सुगंधित रासायनिक तत्वों की भूमिका होती है। इनमें लिनालूल नाम का कंपाउंड भी शामिल है, जो लैवेंडर जैसे कई सुगंधित फूलों में पाया जाता है। इसी वजह से इसकी खुशबू में कुछ लोगों को लैवेंडर जैसी महक महसूस हो सकती है।
हालांकि, हर व्यक्ति की सूंघने की क्षमता और खुशबू के प्रति प्रतिक्रिया अलग होती है। किसी को यह महक अच्छी लग सकती है, तो किसी को यह बहुत तेज या असहज महसूस हो सकती है।
कुछ लोगों को हो सकती हैं ये परेशानियां
सप्तपर्णी के फूलों की तेज खुशबू हर किसी को अनुकूल नहीं लगती। जिन लोगों को तेज सुगंध या परागकणों से संवेदनशीलता होती है, उन्हें इसके आसपास रहने पर छींक, नाक में जलन, आंखों में परेशानी या सिरदर्द महसूस हो सकता है।
अगर किसी व्यक्ति को इसकी महक के आसपास रहने पर परेशानी होती है, तो उसे उस जगह से दूर हो जाना चाहिए। सांस लेने में दिक्कत या गंभीर एलर्जी के लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
प्रकृति का अनोखा पेड़ है सप्तपर्णी
सप्तपर्णी ऐसा पेड़ है, जिसकी एक पहचान उसकी तेज खुशबू है, तो दूसरी पहचान पुराने समय में शिक्षा से जुड़ी चीजों के निर्माण में इसका इस्तेमाल रहा है। इसके नाम के साथ भले ही कई रहस्यमयी कहानियां जुड़ी हों, लेकिन इसकी खासियतों को समझने के लिए वैज्ञानिक जानकारी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
Satya Report डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध सामान्य जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। पेड़ की खुशबू और उससे होने वाली शारीरिक प्रतिक्रियाएं व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।


