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मृत्यु के समय भगवान का स्मरण क्यों आवश्यक है? – गरुड़ पुराण का आध्यात्मिक रहस्य..?

मृत्यु के समय भगवान का स्मरण क्यों आवश्यक है? – गरुड़ पुराण का आध्यात्मिक रहस्य..?

अध्याय 5 : मृत्यु का रहस्य

भाग 5.1 (अध्याय–6)

॥ ॐ नमो नारायणाय ॥

जब भगवान श्रीहरि विष्णु ने गरुड़ जी को मृत्यु का रहस्य बताया, तब गरुड़ जी ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा—

“हे प्रभु! यदि मृत्यु निश्चित है, तो मनुष्य उस समय ऐसा क्या करे जिससे उसका कल्याण हो? मृत्यु के अंतिम क्षण में भगवान का स्मरण इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है?”

भगवान श्रीहरि मुस्कुराए और बोले—

“हे गरुड़! जिस प्रकार अंधकार में दीपक मार्ग दिखाता है, उसी प्रकार मृत्यु के समय ईश्वर का स्मरण आत्मा के लिए सबसे बड़ा सहारा बनता है।”


अंतिम क्षण का महत्व

गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य का अंतिम समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि उस समय मन का भाव अत्यधिक प्रभावशाली होता है।

लेकिन भगवान विष्णु स्पष्ट करते हैं कि अंतिम क्षण का स्मरण तभी सहज होता है, जब पूरे जीवन में भगवान का नाम, भक्ति और सदाचार का अभ्यास किया गया हो।

यदि किसी ने कभी ईश्वर का स्मरण ही नहीं किया, तो केवल अंतिम क्षण में मन को पूरी तरह भगवान में स्थिर कर लेना सरल नहीं होता।


जीवनभर की साधना

भगवान विष्णु कहते हैं—

जो व्यक्ति प्रतिदिन कुछ समय भगवान का नाम लेता है, सत्य बोलता है, धर्म का पालन करता है और दूसरों के प्रति करुणा रखता है, उसका मन धीरे-धीरे निर्मल होने लगता है।

ऐसा मन मृत्यु के समय भी कम विचलित होता है।

इसीलिए संतजन कहते हैं—

“जैसा अभ्यास, वैसा अंतिम स्मरण।”


क्या केवल अंतिम समय का नाम-जप पर्याप्त है?

यह प्रश्न कई लोगों के मन में आता है।

गरुड़ पुराण का संदेश यह नहीं है कि मनुष्य जीवनभर अधर्म करे और अंत में केवल भगवान का नाम लेकर सब कुछ समाप्त हो जाए।

शास्त्रों में सच्ची भक्ति का अर्थ है—

  • ईश्वर में विश्वास
  • धर्ममय आचरण
  • निष्कपट पश्चाताप
  • जीवन में सुधार का प्रयास
  • भगवान के प्रति प्रेम

इसलिए भगवान का नाम केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन की दिशा है।


भगवान का नाम और मन की शांति

जब मनुष्य भगवान का नाम लेता है—

  • उसका मन शांत होता है।
  • भय कम होता है।
  • मोह धीरे-धीरे कम होने लगता है।
  • ईश्वर पर विश्वास बढ़ता है।

गरुड़ पुराण का संदेश है कि मृत्यु के समय सबसे अधिक आवश्यकता मन की शांति की होती है, और भक्ति उस शांति का महत्वपूर्ण साधन है।


शास्त्रीय प्रमाण

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

“अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥”
(भगवद्गीता 8.5)

भावार्थ:

जो मनुष्य अंतिम समय में मेरा स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह मेरी दिव्य अवस्था को प्राप्त होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

गरुड़ पुराण इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए बताता है कि यह अंतिम स्मरण पूरे जीवन की साधना का फल है।


परिवार को क्या करना चाहिए?

गरुड़ पुराण के अनुसार जब किसी व्यक्ति का अंतिम समय निकट हो, तब परिवार को—

  • झगड़ा और शोर से बचना चाहिए।
  • भगवान के नाम का शांतिपूर्वक कीर्तन करना चाहिए।
  • रोगी को सांत्वना और प्रेम देना चाहिए।
  • यदि वह स्वयं भगवान का नाम ले सके तो उसे प्रोत्साहित करना चाहिए।

यह वातावरण मन को स्थिर रखने में सहायक माना गया है।


क्या मृत्यु से डरना चाहिए?

भगवान विष्णु कहते हैं—

“जो मनुष्य धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलता है, उसके लिए मृत्यु भय का नहीं, बल्कि ईश्वर की ओर एक नए चरण का द्वार बन सकती है।”

इसलिए गरुड़ पुराण का उद्देश्य मृत्यु का भय फैलाना नहीं, बल्कि जीवन को पवित्र बनाना है।


इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

  • भगवान का स्मरण जीवनभर का अभ्यास होना चाहिए।
  • धर्म और भक्ति मन को शांति प्रदान करते हैं।
  • अंतिम समय में प्रेम और शांत वातावरण का महत्व है।
  • ईश्वर का नाम भय नहीं, विश्वास देता है।
  • सच्ची तैयारी मृत्यु की नहीं, श्रेष्ठ जीवन की करनी चाहिए।

अध्याय 5.1 समाप्त

अगले भाग में

श्री गरुड़ महापुराण – सम्पूर्ण हिन्दी व्याख्या

अध्याय 5 : मृत्यु का रहस्य

भाग 5.2 (अध्याय–1)

यमदूत कौन हैं? – गरुड़ पुराण में यमदूतों का स्वरूप, कार्य और वास्तविक वर्णन

हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
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