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FD का पैसा रोकना बैंक को पड़ा भारी! कोर्ट ने ब्याज और मुआवजा देने को कहा

हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि जनता का पैसा संभालने वाले बैंकों की जिम्मेदारी है कि वे जमाकर्ताओं का पैसा समय पर लौटाएं. अदालत ने यह टिप्पणी त्रिशूर के एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसकी 5 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट 2015 में मैच्योर हो गई थी, लेकिन बैंक ने तकनीकी कारणों का हवाला देकर भुगतान नहीं किया.

FD का पैसा रोकना बैंक को पड़ा भारी! कोर्ट ने ब्याज और मुआवजा देने को कहा

क्या था पूरा मामला?

त्रिशूर के मुल्लमकुन्नाथ कावु निवासी सेतुमाधवन ने बैंक में 5 लाख रुपये की एफडी कराई थी, जिसकी मैच्योरिटी 2 जून 2015 को थी. तय समय पर जब वह अपनी रकम लेने बैंक पहुंचे, तो बैंक ने तकनीकी दिक्कतों का हवाला देकर भुगतान करने से इनकार कर दिया.

इससे परेशान होकर उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , त्रिशूर में शिकायत दर्ज कराई. आयोग ने 31 दिसंबर 2021 को बैंक को आदेश दिया कि वह 5 लाख रुपये की एफडी की राशि 12% सालाना ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजे व खर्च के साथ लौटाए.

बैंक ने हाई कोर्ट में दी चुनौती

उपभोक्ता आयोग के आदेश के बावजूद बैंक ने भुगतान नहीं किया और 825 दिन की देरी से केरल हाई कोर्ट में अपील दायर की. बैंक का कहना था कि दिसंबर 2014 से मई 2022 तक उसका प्रबंधन प्रशासक के अधीन था, इसलिए अपील में देरी हुई. हालांकि, हाई कोर्ट की एकल पीठ ने बैंक की दलील खारिज कर दी और उपभोक्ता आयोग के आदेश को बरकरार रखा.

इसके बाद भी बैंक ने रकम नहीं लौटाई और मामले को हाई कोर्ट की बड़ी पीठ के सामने ले गया. इस बार बैंक ने दलील दी कि वह एक सहकारी बैंक है, इसलिए इस मामले पर केरल सहकारी समितियां अधिनियम, 1969 लागू होता है और उपभोक्ता आयोग या हाई कोर्ट की एकल पीठ को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है.

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

2 जून 2026 को केरल हाई कोर्ट की बड़ी पीठ ने बैंक की सभी दलीलें खारिज कर दीं और कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया विशेष कानून है. इसलिए इसकी व्यवस्था सहकारी समितियों के कानून पर प्राथमिकता रखती है.

अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि सहकारी कानून में विवाद निपटाने का अलग प्रावधान है, इससे उपभोक्ताओं का उपभोक्ता आयोग जाने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता.

तकनीकी बहाने स्वीकार नहीं

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि बैंक सार्वजनिक धन से जुड़ी संस्था है और उसकी जिम्मेदारी है कि वह जमाकर्ताओं को समय पर उनकी जमा राशि लौटाए. अदालत ने यह भी कहा कि जब यह विवादित ही नहीं है कि एफडी की राशि 2015 में देय हो चुकी थी, तब तकनीकी कारणों का सहारा लेकर भुगतान टालना पूरी तरह गलत है.

अंत में अदालत ने बैंक को उपभोक्ता आयोग के आदेश के अनुसार 5 लाख रुपये, 12% ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दिया. हालांकि, बैंक के अनुरोध पर भुगतान के लिए 6 महीने का समय भी दे दिया गया.

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