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 अरशद वारसी की दर्दभरी कहानी: 14 साल की उम्र में खो दिए माता-पिता, लिपस्टिक बेचकर शुरू की जिंदगी, फिर बने ‘सर्किट’

मुंबई : बॉलीवुड के लोकप्रिय अभिनेता अरशद वारसी की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रही। आज जिन्हें लोग ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ के ‘सर्किट’ के रूप में पहचानते हैं, उनके पीछे संघर्ष, जिम्मेदारी और दर्द से भरा लंबा सफर छिपा है। कम उम्र में मातापिता को खोने के बाद अरशद पर घर की पूरी जिम्मेदारी आ गई थी, और हालात इतने कठिन थे कि उन्हें स्कूल तक छोड़ना पड़ा।

 अरशद वारसी की दर्दभरी कहानी: 14 साल की उम्र में खो दिए माता-पिता, लिपस्टिक बेचकर शुरू की जिंदगी, फिर बने ‘सर्किट’

अरशद वारसी ने हाल ही में अपने बचपन की सबसे दर्दनाक यादों को याद करते हुए बताया कि उनकी मां किडनी फेल होने के बाद डायलिसिस पर थीं। डॉक्टरों ने सख्त हिदायत दी थी कि उन्हें पानी नहीं देना है, लेकिन मां बारबार पानी मांगती थीं। अरशद ने बताया कि उन्होंने उस रात भी पानी देने से मना कर दिया, और उसी रात उनकी मां का निधन हो गया। यह घटना उन्हें आज भी भीतर तक तोड़ देती है।

उन्होंने यह भी बताया कि जब उनके पिता का निधन हुआ, तब हालात धीरेधीरे और खराब होने लगे। मां की मौत के बाद वह तुरंत रो भी नहीं पाए, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि अब घर संभालना उनकी जिम्मेदारी है। बाद में कई हफ्तों तक भीतर दबा दर्द बाहर आया, जब वह पूरी तरह टूटकर रोए।

बचपन में बदले हालात

19 अप्रैल 1968 को मुंबई में जन्मे अरशद वारसी का बचपन शुरुआत में आर्थिक रूप से अच्छा था। उनके पिता अहमद अली खान वारसी शायर और गायक थे, और परिवार का जीवन पहले काफी आरामदायक था। लेकिन कानूनी विवादों और आर्थिक नुकसान की वजह से परिवार की संपत्ति धीरेधीरे खत्म हो गई, और उन्हें बड़े घर से छोटे घरों में आना पड़ा।

14 साल की उम्र में अनाथ हो जाने के बाद अरशद को पढ़ाई छोड़नी पड़ी। घर चलाने के लिए उन्होंने कई छोटेमोटे काम किए, जिनमें कॉस्मेटिक्स बेचने से लेकर डोरटूडोर सेल्स तक शामिल थे। उन्होंने मुंबई की बसों में भी लिपस्टिक और दूसरे कॉस्मेटिक प्रोडक्ट बेचे, ताकि मां के इलाज और घर के खर्च पूरे हो सकें।

अरशद के मुताबिक, वे हफ्तेभर मेहनत करके कुछ सौ रुपये ही कमा पाते थे, जबकि मां के इलाज में हर हफ्ते करीब 800 रुपये खर्च हो जाते थे। यही वजह थी कि उन्होंने जल्दी समझ लिया कि जिंदगी में आर्थिक रूप से मजबूत होना कितना जरूरी है।

डांस ने बदली राह

मुश्किल हालात के बीच अरशद का डांस का शौक कभी खत्म नहीं हुआ।  डांस को करियर बनाने का फैसला किया और अकबर सामी के डांस ग्रुप से जुड़ गए। 1991 में उन्होंने ऑल इंडिया डांस प्रतियोगिता जीती, और 1992 में लंदन में आयोजित वर्ल्ड डांस चैंपियनशिप के मॉडर्न जैज वर्ग में चौथा स्थान हासिल किया।

इसके बाद उन्होंने अपना डांस स्टूडियो शुरू किया और फिल्मों में कोरियोग्राफी करने लगे। ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ के टाइटल ट्रैक से लेकर ‘ठिकाना’ और ‘काश’ जैसी फिल्मों में काम करते हुए उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में पहचान मिलने लगी।

अभिनय में एंट्री

कोरियोग्राफर के तौर पर काम करते समय अरशद की मुलाकात फिल्मी दुनिया के कई लोगों से हुई। इसी दौरान जया बच्चन ने उनकी प्रतिभा देखी और अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड की फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ में उन्हें अभिनय का मौका मिला। 1996 में रिलीज हुई इस फिल्म से अरशद वारसी ने बॉलीवुड में बतौर अभिनेता कदम रखा।

हालांकि पहली फिल्म के बाद भी उनके करियर को तुरंत रफ्तार नहीं मिली। ‘हीरो हिंदुस्तानी’, ‘होगी प्यार की जीत’, ‘मुझे मेरी बीवी से बचाओ’ और ‘जानी दुश्मन: एक अनोखी कहानी’ जैसी फिल्मों में काम करने के बावजूद उन्हें वह सफलता नहीं मिली, जिसकी उम्मीद की जाती है। खुद अरशद ने कहा था कि बाहर से आने वाले कलाकारों को फिल्म इंडस्ट्री में एक फ्लॉप के बाद दोबारा खुद को साबित करना पड़ता है। [

‘सर्किट’ बना पहचान

2003 में राजकुमार हीरानी ने जब उन्हें ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ में ‘सर्किट’ का रोल ऑफर किया, तब अरशद को लगा कि यह किरदार बहुत छोटा है और शायद उनके करियर का आखिरी मौका साबित हो सकता है। उन्होंने बाद में कहा था कि उस समय उन्हें यकीन नहीं था कि यह रोल इतना बड़ा बन जाएगा।

फिल्म हिट हुई और ‘सर्किट’ दर्शकों का पसंदीदा किरदार बन गया। अरशद ने किरदार के नाम, लुक और कई छोटे रचनात्मक सुझाव भी दिए थे। रोचक बात यह है कि इस रोल का नाम शुरुआत में ‘खुजली’ रखा गया था, जिसे बाद में बदला गया।

‘लगे रहो मुन्नाभाई’ ने इस लोकप्रियता को और मजबूत किया। इसके बाद लोग अरशद वारसी को सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि ‘सर्किट’ की पहचान के साथ देखने लगे।

अलगअलग किरदारों में भी चमके

अरशद वारसी ने अपने करियर में सिर्फ कॉमेडी तक खुद को सीमित नहीं रखा। ‘गोलमाल’ फ्रेंचाइजी में माधव, ‘धमाल’ में कॉमिक अंदाज, ‘इश्किया’ में बब्बन और ‘जॉली एलएलबी’ में जॉली त्यागी जैसे किरदारों ने उनकी बहुमुखी प्रतिभा को साबित किया।

2020 में आई वेब सीरीज ‘असुर’ ने उन्हें एक नई पहचान दी। इसमें उन्होंने फॉरेंसिक विशेषज्ञ धनंजय राजपूत का गंभीर और परतदार किरदार निभाया, जिसे दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने सराहा। अरशद का मानना है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म ने उनकी छवि बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।

तीन दशक बाद भी लगातार सक्रिय

करीब तीन दशक लंबे करियर में अरशद वारसी ने 50 से अधिक फिल्मों और कई वेब सीरीज में काम किया है। उन्होंने कभी फिल्मों की संख्या के पीछे भागने के बजाय अपनी पसंद की स्क्रिप्ट को प्राथमिकता दी। अरशद वारसी कहते हैं कि उन्हें कम काम करना मंजूर है, लेकिन ऐसा काम नहीं करना चाहते, जिसमें उन्हें खुद विश्वास न हो।

परिवार बना सबसे बड़ी ताकत

अरशद वारसी की निजी जिंदगी भी बैलेंस रही है। उन्होंने 1999 में मारिया गोरेटी से शादी की। दोनों की मुलाकात डांस के दिनों में हुई थी। अरशद कई मौकों पर कह चुके हैं कि संघर्ष के दिनों से लेकर सफलता तक मारिया ने हमेशा उनका साथ दिया। वे लाइमलाइट से दूर रहकर परिवार के साथ समय बिताना पसंद करते हैं और निजी जीवन को मीडिया की सुर्खियों से अलग रखते हैं।

 

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