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​जिस पुराने कुएँ को पूरा गाँव बेकार समझता था, उसी ने एक दिन सबकी जान बचाई……लेकिन फिर

 

​जिस पुराने कुएँ को पूरा गाँव बेकार समझता था, उसी ने एक दिन सबकी जान बचाई……लेकिन फिर

एक गाँव में एक ऐसा कुआँ था, जिसे लोग अपशकुनी मानते थे। कहते थे कि जो भी उसके पास जाता है, उसकी किस्मत बिगड़ जाती है। लेकिन एक दिन उसी कुएँ से ऐसी आवाज़ आई, जिसने पूरे गाँव का भविष्य बदल दिया।

यह कहानी है एक गरीब कुम्हार की, जिसकी बात पर कोई विश्वास नहीं करता था।

कहानी

बहुत समय पहले सुंदरपुर नाम का एक गाँव था। वहाँ के लोग खेती करके अपना जीवन बिताते थे। गाँव के बाहर एक पुराना कुआँ था, जिसके आसपास झाड़ियाँ उग आई थीं। कई वर्षों से उसका पानी किसी ने नहीं पिया था।

गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि बहुत पहले एक साधु ने उस कुएँ को श्राप दिया था। तभी से गाँव वालों ने उसके पास जाना छोड़ दिया था।

उसी गाँव में माधव नाम का एक गरीब कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के बर्तन बनाकर अपने परिवार का पेट पालता था। उसके पास न अधिक धन था, न खेत, लेकिन उसकी एक आदत थी—वह किसी चीज़ को बिना समझे बेकार नहीं मानता था।

एक दिन वह मिट्टी खोजते हुए उस पुराने कुएँ के पास पहुँचा। उसने देखा कि कुएँ की दीवार में एक जगह से मिट्टी लगातार गीली हो रही थी।

माधव ने मन ही मन सोचा, “यदि यहाँ पानी है, तो यह कुआँ सूखा कैसे हो सकता है?”

वह घर से एक रस्सी और बाल्टी लाया। उसने बाल्टी कुएँ में डाली, लेकिन पानी बहुत नीचे था। काफी प्रयास के बाद उसने थोड़ीसी मिट्टी मिली हुई नमी बाहर निकाली।

उसने मिट्टी को हाथ में लेकर देखा और समझ गया कि जमीन के नीचे कहीं पानी मौजूद है।

अगली सुबह वह गाँव के मुखिया के पास पहुँचा।

“मुखियाजी, पुराने कुएँ में पानी हो सकता है। यदि हम उसकी सफाई करवाएँ, तो गाँव के काम आ सकता है।”

मुखिया हँस पड़ा।

“अरे माधव! तू मिट्टी के बर्तन बना। कुओं के बारे में सोचना तेरा काम नहीं है। उस कुएँ के पास जाने वाले लोग अपनी जान जोखिम में डालते हैं।”

वहाँ बैठे कुछ लोग भी हँसने लगे।

एक किसान बोला, “जिस कुएँ को हमारे पूर्वजों ने छोड़ दिया, उसे यह गरीब कुम्हार ठीक करेगा!”

माधव चुपचाप वहाँ से चला गया।

लेकिन उसने हार नहीं मानी।

वह प्रतिदिन कुएँ के आसपास की जमीन देखता, मिट्टी की नमी जाँचता और अलगअलग जगहों पर छोटे गड्ढे खोदकर पानी की दिशा समझने का प्रयास करता। कुछ दिनों बाद उसे विश्वास हो गया कि कुएँ का रास्ता किसी बड़े पत्थर या मिट्टी के जमाव से बंद हो गया है।

उसने अपने मित्र गोपाल से सहायता माँगी।

गोपाल ने कहा, “माधव, लोग हमारा मजाक उड़ाएँगे। हम अपना समय क्यों बर्बाद करें?”

माधव मुस्कराया और बोला, “यदि कुआँ सचमुच बेकार निकला, तो हमारा केवल समय जाएगा। लेकिन यदि उसमें पानी मिल गया, तो पूरे गाँव का जीवन बदल सकता है।”

गोपाल उसकी बात सुनकर तैयार हो गया।

दोनों ने मिलकर कुएँ के आसपास की झाड़ियाँ हटाईं। उन्होंने पत्थर निकाले और उसकी दीवारों की सफाई शुरू की। कई दिन बीत गए, लेकिन उन्हें पानी नहीं मिला।

धीरेधीरे गोपाल का धैर्य टूटने लगा।

“माधव, अब बस कर। लगता है हम गलत थे।”

माधव ने थकी हुई आवाज़ में कहा, “एक दिन और प्रयास कर लेते हैं।”

उसी रात मौसम अचानक बदल गया। आसमान में काले बादल छा गए और तेज बारिश होने लगी। कई दिनों तक लगातार वर्षा होती रही।

गाँव के पास बहने वाली नदी उफान पर आ गई। खेतों में पानी भरने लगा और गाँव की निचली बस्ती में बाढ़ का खतरा पैदा हो गया।

गाँव वाले घबराकर अपना सामान समेटने लगे। मुखिया ने लोगों से कहा कि सभी ऊँचे टीले की ओर चलें।

लेकिन तभी गाँव के एक बूढ़े चरवाहे ने खबर दी कि नदी का पानी जिस दिशा में बढ़ रहा है, वहाँ की पुरानी नाली वर्षों पहले बंद हो चुकी है। पानी का बहाव गाँव की ओर मुड़ रहा था।

लोगों के पास बहुत कम समय था।

मुखिया ने घबराकर पूछा, “क्या कोई ऐसा रास्ता है, जिससे पानी गाँव में आने से पहले दूसरी ओर मोड़ा जा सके?”

किसी के पास उत्तर नहीं था।

तभी माधव को पुराने कुएँ के पास की जमीन याद आई। उसने कई दिनों तक उस क्षेत्र का अध्ययन किया था। उसे पता था कि कुएँ के पीछे जमीन का ढलान एक सूखी जलधारा की ओर जाता है, जो आगे चलकर नदी से दूर निकलती थी।

वह तुरंत मुखिया के पास पहुँचा।

“यदि हम पुराने कुएँ के पीछे की बंद जलधारा खोल दें, तो पानी का एक बड़ा हिस्सा गाँव से दूर जा सकता है।”

मुखिया ने संदेह से पूछा, “जिस कुएँ को तू इतने दिनों से साफ कर रहा था, क्या वह इतना पानी सँभाल सकता है?”

माधव ने उत्तर दिया, “कुआँ अकेला नहीं। उसके पीछे की पुरानी जलधारा भी है। हमें उसे खोलना होगा।”

इस बार किसी ने उसका मजाक नहीं उड़ाया।

गाँव के लोग फावड़े और कुदाल लेकर माधव के साथ चल पड़े। उन्होंने पूरी रात मेहनत की। कीचड़ हटाया, पत्थर निकाले और बंद जलधारा का रास्ता खोल दिया।

सुबह होतेहोते नदी का पानी उस रास्ते में मुड़ने लगा। गाँव की ओर बढ़ता पानी धीरेधीरे कम हो गया। कुछ घरों में पानी जरूर घुसा, लेकिन पूरा गाँव डूबने से बच गया।

बारिश थमने के बाद लोग पुराने कुएँ के पास इकट्ठा हुए।

कुएँ की सफाई के दौरान जमा हुई मिट्टी हट चुकी थी। अब उसके भीतर साफ पानी दिखाई दे रहा था। गाँव वालों ने पहली बार उस कुएँ को ध्यान से देखा।

मुखिया माधव के सामने आया। उसकी आँखें झुकी हुई थीं।

उसने कहा, “माधव, हमने तेरी बात सुने बिना तेरा मजाक उड़ाया। आज तूने पूरे गाँव को बचा लिया। बता, तुझे हमसे क्या चाहिए?”

माधव कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, “मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। बस इस कुएँ को किसी एक व्यक्ति की संपत्ति मत बनाना। इसका पानी सबके लिए होना चाहिए।”

मुखिया ने उसी दिन घोषणा कर दी कि कुआँ और उसके आसपास की जलधारा पूरे गाँव की साझा संपत्ति होगी।

कुछ महीनों बाद गाँव में एक नया नियम बना। हर वर्ष वर्षा से पहले सभी लोग मिलकर पुराने जलमार्गों, तालाबों और कुओं की सफाई करते थे।

जिस कुएँ को कभी लोग अपशकुनी मानते थे, वह अब गाँव की सबसे मूल्यवान जगह बन चुका था।

एक दिन गोपाल ने माधव से पूछा, “तुझे कैसे विश्वास था कि यह कुआँ एक दिन हमारे काम आएगा?”

माधव ने मुस्कराकर कहा, “मुझे यह विश्वास नहीं था कि कुआँ जरूर काम आएगा। मुझे केवल इतना विश्वास था कि बिना जाने किसी चीज़ को बेकार मान लेना गलत है।”

उसकी बात सुनकर गोपाल कुछ देर तक चुप रहा।

उसे समझ आ गया था कि कई बार हमारी सबसे बड़ी गलती किसी चीज़ का बेकार होना नहीं, बल्कि उसे समझने का प्रयास न करना होती है।

सीख

किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति को केवल उसके पुराने रूप के आधार पर बेकार मत समझो। कई बार जिसे दुनिया व्यर्थ मानकर छोड़ देती है, उसी में सबसे बड़ी समस्या का समाधान छिपा होता है।

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