UPI पेमेंट पर लगने वाले चार्ज को लेकर चर्चा तेज है. सरकार ने 2,000 रुपये से ज्यादा की मर्चेंट पेमेंट पर 0.4% MDR लगाने का फैसला किया है. इसी बीच संसद की वित्त पर बनी स्थायी समिति की 32वीं रिपोर्ट भी सुर्खियों में आई है. रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि आने वाले समय में UPI पर हर महीने 15 हजार करोड़ ट्रांजेक्शन हो सकते हैं और 60 करोड़ नए यूजर्स जुड़ सकते हैं.

साथ ही समिति ने UPI के लिए आत्मनिर्भर रेवेन्यू मॉडल की जरूरत भी बताई थी. ऐसे में सवाल है कि आखिर सरकार ने चार्ज लगाने का फैसला क्यों किया और इसके पीछे की पूरी स्ट्रैटजी क्या है?
मार्च 2026 में पेश की गई थी रिपोर्ट
संसद में पेश हुई इस समिति की 32वीं रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त मंत्रालय को एक ऐसी राजस्व व्यवस्था तैयार करनी चाहिए, जिससे सरकारी खजाने पर बारबार दबाव डाले बिना UPI को वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाया जा सके. यह रिपोर्ट मार्च 2026 में पेश की गई थी.
रिपोर्ट में समिति ने यह भी स्वीकार किया कि अगले तीन साल की प्रस्तावित योजना और कैशबैक जैसी व्यवस्थाएं मझोले और छोटे शहरों में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए जरूरी हैं.
खासकर उन इलाकों में जहां अभी तक डिजिटल पेमेंट की पहुंच पूरी तरह से नहीं बन पाई है, लेकिन इसके साथ ही समिति ने वित्तीय सेवा विभाग को यह भी सुझाव दिया है कि उसे एक आत्मनिर्भर राजस्व मॉडल तलाशने की दिशा में गंभीरता से काम करना होगा, ताकि योजना को लंबे समय तक बिना किसी वित्तीय संकट के चलाया जा सके.
समिति की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि MDR की पूरी तरह अनुपस्थिति यानी जीरोMDR व्यवस्था बैंकों और पेमेंट ऑपरेटरों के लिए वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं रह गई थी और यही वजह है कि अब चार्ज लगाने का फैसला लिया गया है.
क्यों लिया गया चार्ज लगाने का फैसला?
- इंफ्रास्ट्रक्चर लागत: UPI नेटवर्क को बनाए रखने में बैंकों और पेमेंट प्रोवाइडर्स का सालाना करीब 20 हजार करोड़ रुपये तक खर्च.
- टेक्नोलॉजी और सिक्योरिटी: बढ़ते ट्रांजैक्शन के साथ साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड रोकने और टेक्निकल अपग्रेड में लगातार निवेश की जरूरत.
- आत्मनिर्भर रेवेन्यू मॉडल: सरकारी सब्सिडी पर निर्भरता घटेगी. P2P और 2,000 रुपये से कम के ट्रांजैक्शन आम यूजर्स के लिए मुफ्त रहेंगे.
15 हजार करोड़ तक पहुंचेगा ट्रांजेक्शन
समिति ने अपनी रिपोर्ट में आंकड़ों के जरिए इस समस्या की गंभीरता को भी सामने रखा. समिति के अनुमान के मुताबिक, आने वाले समय में UPI के जरिए हर महीने करीब 150 अरब लेनदेन होने की उम्मीद है और इस दौरान करीब 60 करोड़ नए यूजर्स इस नेटवर्क से जुड़ सकते हैं.
यह आंकड़े बताते हैं कि UPI का दायरा किस तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ी दिक्कत भी सामने आती है. UPI को चलाने में बैंकों और पेमेंट कंपनियों का जो असली खर्च आता है, जैसे सर्वर, सिक्योरिटी, फ्रॉड रोकना और इंफ्रास्ट्रक्चर मेंटेन करना, सरकार उसका सिर्फ 11 प्रतिशत हिस्सा ही सब्सिडी या इंसेंटिव के तौर पर भरती है.
यानी हर 100 रुपये के खर्च में से सरकार सिर्फ 11 रुपये देती है. बाकी 89 रुपये का बोझ बैंकों और पेमेंट कंपनियों को खुद उठाना पड़ता है. इसी तरह, अगर सरकार UPI पर पहले जैसी सामान्य दर से MDR वसूलती, तो बैंकों और कंपनियों को जितनी कमाई होती सरकार अभी उसका सिर्फ 14 प्रतिशत हिस्सा ही “मुआवजे” के तौर पर दे रही है.
सीधे शब्दों में कहें तो UPI मुफ्त है, लेकिन इसे चलाना महंगा है और सरकार जो मदद देती है वह असल खर्च और संभावित कमाई, दोनों के मुकाबले बहुत कम पड़ती है.
समिति ने आगाह किया था कि इसी असंतुलन की वजह से एक ढांचागत वित्तपोषण अंतर यानी फंडिंग गैप पैदा हो रहा है, जिसका सीधा असर आने वाले वर्षों में UPI से जुड़े बुनियादी ढांचे में होने वाले निवेश पर पड़ सकता है.
समिति ने यह भी कहा था कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तेजी से पूंजी जुटाने, संभावित बड़े विलय और विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिशों की वजह से सरकारी बैंकों के जरूरी कामकाज कमजोर न पड़ें, जिनमें प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कर्ज देना और कम मुनाफे वाली ग्रामीण शाखाओं को सेवाएं देना शामिल है.
अभी कितना बड़ा है यूपीआई का मार्केट
अब बात करते हैं कि आखिर भारत में UPI का नेटवर्क फिलहाल कितना बड़ा हो चुका है. मौजूदा आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में हर दिन करीब 66 करोड़ UPI ट्रांजैक्शन हो रहे हैं.
सिर्फ जुलाई 2026 के महीने में ही करीब 2,366 करोड़ UPI ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए, और इन लेनदेन की कुल रकम करीब ₹29.88 लाख करोड़ रही. यह आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि UPI अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है.
वित्त वर्ष 202526 में देश में हुए कुल डिजिटल पेमेंट में UPI की हिस्सेदारी 84 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो साफ दिखाता है कि UPI अब रोजमर्रा के डिजिटल भुगतान का सबसे अहम और भरोसेमंद जरिया बन चुका है.
कुल मिलाकर देखा जाए तो सरकार का यह कदम एक सोचीसमझी रणनीति का हिस्सा नजर आता है. एक तरफ आम और छोटे ग्राहकों को 2000 रुपये तक के लेनदेन पर पूरी राहत दी गई है, वहीं बड़े और उच्च मूल्य वाले ट्रांजैक्शन पर मामूली शुल्क लगाकर सरकार इस विशाल नेटवर्क को दीर्घकालिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रही है.
संसदीय समिति की चेतावनी को गंभीरता से लेते हुए यह साफ है कि आने वाले वर्षों में UPI का दायरा जितनी तेजी से बढ़ेगा, उतनी ही जरूरत इसके वित्तपोषण मॉडल को मजबूत बनाने की भी महसूस होगी, ताकि इस डिजिटल क्रांति की रफ्तार पर कोई असर न पड़े.



