
भारत में कई ऐसी जगहें हैं, जिनका इतिहास और उनसे जुड़ी लोककथाएं आज भी लोगों को हैरान करती हैं। त्रिपुरा का उनाकोटी भी ऐसी ही एक अनोखी जगह है। घने जंगलों और हरियाली से घिरी पहाड़ियों के बीच यहां पत्थरों पर देवी-देवताओं की विशाल आकृतियां उकेरी गई हैं। इनमें भगवान शिव की लगभग 30 फुट ऊंची प्रतिमा सबसे खास मानी जाती है। लेकिन इस स्थान की सबसे दिलचस्प बात इसका नाम और उससे जुड़ी 99,99,999 देवताओं की कहानी है।
आखिर क्यों पड़ा उनाकोटी नाम?
उनाकोटी त्रिपुरा के उत्तरी हिस्से में स्थित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है। इसे ‘लॉस्ट हिल ऑफ फेसेज’ भी कहा जाता है। पहाड़ियों पर उकेरे गए विशाल चेहरे और देवी-देवताओं की आकृतियां इसे बाकी धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं।
यहां भगवान शिव की विशाल मुखाकृति के साथ मां दुर्गा, मां गंगा और भगवान गणेश की प्रतिमाएं भी दिखाई देती हैं। कुछ मूर्तियां चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं, जबकि कई आकृतियां पहाड़ी की सतह पर उकेरी गई हैं। इन शिल्पों को देखकर सहज ही सवाल उठता है कि आखिर प्राचीन समय में इतनी विशाल आकृतियां किसने और कैसे तैयार की होंगी?
भगवान शिव और 99,99,999 देवताओं की कथा
उनाकोटी के नाम के पीछे एक प्रचलित पौराणिक कथा सुनाई जाती है। मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान शिव काशी की यात्रा पर निकले थे। उनके साथ 99,99,999 देवी-देवता भी थे। रास्ते में सभी ने त्रिपुरा की इन पहाड़ियों पर विश्राम करने का फैसला किया।
कहा जाता है कि भगवान शिव ने सभी से सूर्योदय से पहले उठकर यात्रा दोबारा शुरू करने के लिए कहा था। लेकिन सुबह होने पर भगवान शिव के अलावा कोई भी देवता नहीं उठा। इससे नाराज होकर भगवान शिव ने सभी को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया।
लोकमान्यता है कि पहाड़ियों पर दिखाई देने वाली विशाल आकृतियां उन्हीं देवताओं की हैं। इसी कारण इस जगह को उनाकोटी कहा जाने लगा, जिसका अर्थ है एक करोड़ से एक कम।
शिल्पकार कल्लू गुर्जर से जुड़ी दूसरी कहानी
उनाकोटी को लेकर एक दूसरी लोककथा भी प्रचलित है। इसके अनुसार, कल्लू गुर्जर नाम का एक शिल्पकार भगवान शिव का बड़ा भक्त था। उसकी इच्छा थी कि वह शिव और माता पार्वती के साथ कैलाश पर्वत जाए।
कहानी के मुताबिक, भगवान शिव ने उसके सामने शर्त रखी कि यदि वह एक ही रात में एक करोड़ देवी-देवताओं की मूर्तियां बना देगा, तो उसे कैलाश ले जाया जाएगा।
कहा जाता है कि कल्लू ने पूरी रात मेहनत करके 99,99,999 मूर्तियां बना दीं, लेकिन एक मूर्ति अधूरी रह गई। सुबह होने पर भगवान शिव और माता पार्वती उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए। इसी अधूरी गिनती के कारण इस स्थान का नाम उनाकोटी पड़ने की मान्यता है।
हालांकि ये दोनों कहानियां लोकविश्वास का हिस्सा हैं। इनके ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
सातवीं से नौवीं शताब्दी के बीच बने होने का अनुमान
उनाकोटी की विशाल शिल्पकला का वास्तविक निर्माण किसने कराया था, इसकी स्पष्ट जानकारी आज भी नहीं मिल पाई है। इतिहासकार और शोधकर्ता इन शिल्पों को मोटे तौर पर सातवीं से नौवीं शताब्दी के बीच का मानते हैं। यहां की कला में धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय शिल्प परंपराओं की झलक दिखाई देती है।
पहाड़ों पर इतनी बड़ी आकृतियां उकेरना उस समय के शिल्पकारों की कला और मेहनत को दर्शाता है। यही वजह है कि उनाकोटी केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान है।
हर साल लगता है अशोकाष्टमी मेला
उनाकोटी में हर साल अशोकाष्टमी के अवसर पर बड़ा मेला आयोजित किया जाता है। इस दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। धार्मिक उत्सवों के समय पूरा इलाका भक्तों और पर्यटकों की आवाजाही से गुलजार हो जाता है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण से जुड़ा हुआ है। यहां मौजूद प्राचीन मूर्तियों और शिल्पों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि मौसम और प्राकृतिक परिस्थितियों का असर इन चट्टानों पर पड़ सकता है।
आज भी लोगों को आकर्षित करती हैं रहस्यमयी मूर्तियां
घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और विशाल पत्थर की आकृतियों के बीच स्थित उनाकोटी का वातावरण बेहद खास है। यहां पहुंचने वाले पर्यटक एक तरफ प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेते हैं, तो दूसरी तरफ प्राचीन शिल्पकला को देखकर हैरान रह जाते हैं।
किसने इन मूर्तियों को बनाया, इन्हें बनाने के पीछे क्या उद्देश्य था और 99,99,999 देवताओं की कथा का इस स्थान से क्या संबंध है—ऐसे कई सवाल आज भी लोगों की जिज्ञासा बढ़ाते हैं। यही वजह है कि त्रिपुरा का उनाकोटी भारत के उन ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है, जहां इतिहास, आस्था और लोककथाएं एक साथ दिखाई देती हैं।
सत्यम् रिपोर्ट: उनाकोटी से जुड़ी पौराणिक कहानियां स्थानीय लोकमान्यताओं पर आधारित हैं, जबकि मूर्तियों की प्राचीनता और निर्माण से संबंधित विवरण ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक अध्ययनों के आधार पर समझे जाते हैं।



