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Father’s Day 2026 Special: पिता के साथ से लेकर यादों तक, शेरों, नज़्मों और कविताओं में जिंदा है पिता का प्यार

Father’s Day 2026 Special: फादर्स डे सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि उस शख्स को याद करने का मौका है, जिसकी उंगली पकड़कर हम चलना सीखते हैं और जिसकी खामोश मेहनत हमारी जिंदगी की नींव बनती है।

Father’s Day 2026 Special: पिता के साथ से लेकर यादों तक, शेरों, नज़्मों और कविताओं में जिंदा है पिता का प्यार

उर्दू अदब और हिंदी कविता में पिता के प्यार, संघर्ष और उनके जाने के बाद भी दिलों में जिंदा रहने की भावना को कई रचनाकारों ने अपने अल्फाजों में अमर कर दिया है।

मशहूर शायरों के शेर हों, निदा फ़ाज़ली की मार्मिक नज़्म ‘वालिद की वफ़ात पर’ या फिर आलोक श्रीवास्तव की कविता ‘बाबू जी’, हर रचना पिता के उस अटूट रिश्ते की गवाही देती है जो समय और मृत्यु की सीमाओं से परे है।

ताहिर शहीर ने पिता के महत्व को मां के बराबर बताते हुए लिखा था,

“अज़ीज़तर मुझे रखता है वो रगएजाँ से,
ये बात सच है मिरा बाप कम नहीं माँ से।”

मेराज फ़ैज़ाबादी ने पिता के संघर्ष को उनकी झुर्रियों में पढ़ने की बात कही,

“हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब,
पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने।”

मुनव्वर राना ने मातापिता की सेवा को आने वाली पीढ़ियों की छांव बताया,

“ये सोच के माँ बाप की ख़िदमत में लगा हूँ,
इस पेड़ का साया मिरे बच्चों को मिलेगा।”

एक शेर पिता के त्याग को कुछ यूं बयान करता है,

“मुझ को छाँव में रखा और ख़ुद भी वो जलता रहा,
मैं ने देखा इक फ़रिश्ता बाप की परछाईं में।”

एक नज़्म निदा फाजली की 

लेकिन पिता के बिछड़ने के बाद उनके एहसासों के साथ जीने की सबसे गहरी तस्वीर निदा फ़ाज़ली की मशहूर नज़्म ‘वालिद की वफ़ात पर’ में दिखाई देती है। इस नज़्म में वे कहते हैं कि पिता कभी मरते नहीं, वे अपनी आवाज़, विचारों और खून के साथ अपनी संतान में हमेशा जिंदा रहते हैं।

“तुम्हारी क़ब्र पर जिस ने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूटा है,
तुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूँ,
तुम मुझ में ज़िंदा हो।”

आलोक श्रीवास्तव की ग़ज़ल बाबू जी 

वहीं कवि आलोक श्रीवास्तव ने अपनी चर्चित कविता ‘बाबू जी’ में पिता को घर की बुनियाद और परिवार को जोड़ने वाली ताकत के रूप में याद किया। उनकी पंक्तियां पिता के व्यक्तित्व को बेहद सहज तरीके से सामने रखती हैं

“घर की बुनियादें दीवारें बामओदर थे बाबू जी,
सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी।”

और आगे वे लिखते हैं

“भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता,
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी।”

फादर्स डे के मौके पर ये शेर, नज़्में और कविताएं सिर्फ साहित्य नहीं, बल्कि उस प्रेम, त्याग और संघर्ष को सलाम हैं, जिसे हर पिता बिना किसी उम्मीद के अपनी संतान के लिए जीता है।

पिता साथ हों तो उनकी मौजूदगी सबसे बड़ी ताकत होती है और अगर वे इस दुनिया में न भी हों, तो उनकी सीख, उनके संस्कार और उनकी यादें जीवन भर हमारे भीतर सांस लेती रहती हैं।

 

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