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National Doctors Day: 2500 साल पुरानी है डॉक्टरों की हिप्पाेक्रेटिक कसम, यह भारत की ‘चरक शपथ’ से कितनी अलग?

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और पेशे से चिकित्सक डॉक्टर विधान चंद्र राय के जन्मदिन और पुण्यतिथि एक जुलाई को डॉक्टर्स डे के रूप में मनाया जाता है. इस दिन डाक्टरों को उनके योगदान के लिए सम्मानित करने, डॉक्टर विधान चंद्र राय के चिकित्सा जगत में किए गए योगदान को याद किये जाने की परंपरा है. भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया है. आइए, इस डॉक्टर्स डे पर जानते हैं हिप्पोक्रेटिक ओथ की पूरी कहानी. ढाई हजार साल पुरानी शपथ आज भी डॉक्टर क्यों लेते हैं? इसमें समय के साथ क्या बदलाव आए?

हिप्पोक्रेटिक ओथ दुनिया की सबसे पुरानी चिकित्सा शपथों में से एक है. यह लगभग ढाई हजार साल पहले ग्रीस में बनी. डॉक्टर्स डे पर इसे अक्सर याद किया जाता है. हिप्पोक्रेटिस एक ग्रीक डॉक्टर थे. उन्हें आधुनिक चिकित्सा का जनक कहा जाता है. उनकी किताबें और शिक्षाएं चिकित्सा के नैतिक सिद्धांतों का स्रोत बनीं. ओथ का नाम उन्हीं के नाम पर पड़ा. मूल ओथ में डॉक्टरों से कहा गया था कि वे मरीज की भलाई को पहले रखेंगे. जानबूझकर किसी मरीज का नुकसान नहीं करेंगे. डॉक्टर अपने गुरु का सम्मान करेंगे. मरीजों को व्यर्थ की दवा नहीं देंगे.

क्यों आज भी इसका महत्व है?

ओथ नैतिक दिशा देता है. यह डॉक्टरों को मरीज के प्रति जवाबदेह बनाता है. कानून और प्रबंधन में यह मददगार हैं. लेकिन ओथ का उद्देश्य मानसिकता में बदलाव लाना है. यह बताता है कि चिकित्सा सिर्फ विज्ञान एवं तकनीक नहीं है. यह एक अहम जिम्मेदारी है.

डॉक्टर विधान चंद्र राय को समर्पित है नेशनल डॉक्टर्स डे.

पुरानी ओथ और आधुनिक चिकित्सा में टकराव

मूल ओथ के कई हिस्से आज के समय से मेल नहीं खाते. उदाहरण के लिए कुछ वाक्य पुरुष प्रधान समाज को दर्शाते हैं. कई शपथों में दवा या चिकित्सा पर कुछ प्रतिबंध थे. आधुनिक विज्ञान और मानवाधिकारों ने इनको बदलना आवश्यक कर दिया. दुनिया ने नए बदलावों को स्वीकार भी किया. 20वीं सदी में डिक्लेरेशन ऑफ जिनेवा आई. इसे 1948 में विश्व चिकित्सा संघ ने बनाया. इसका उद्देश्य नस्लवाद और युद्ध के समय हुए चिकित्सकीय दुरुपयोग से सीखना था. इसमें मानवता और बराबरी पर ज़ोर दिया गया.

क्या हैं आधुनिक शपथ की मुख्य बातें?

मरीज की भलाई सबसे ऊपर होगी. किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा. डॉक्टर अपने ज्ञान और कौशल से निरंतर सीखेंगे. मानवाधिकारों का सम्मान करेंगे. ओथ कानूनी दस्तावेज नहीं होती. यह नैतिक दिशा देती है. लेकिन अदालत और चिकित्सा नियम भी महत्वपूर्ण हैं. कई बार ओथ और कानून में टकराव दिखाई देता है. यह स्थिति तब पैदा होती है जब मरीज की इच्छा और परिवार की मांग अलगअलग होती हुई देखी जाती है. आज की शपथ में पहले के पारिवारिक और आर्थिक वादों को हटा दिया गया है. अब डॉक्टर अपने गुरु के बेटों को फ्री में पढ़ाने या अपनी संपत्ति गुरु के साथ साझा करने की शपथ नहीं लेते. अब यह एक पेशेवर रिश्ता है, न कि कोई पुराना कबीलाई या पारिवारिक बंधन. अब शिक्षा और चिकित्सा का अधिकार पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए समान है.

शपथ में कहा गया है कि मरीज की भलाई सबसे ऊपर होगी. किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा. फोटो: Pexels

क्यों आलोचना का शिकार हुई हिप्पोक्रेटिक ओथ?

हिप्पोक्रेटिक ओथ की आलोचना हुई है, क्योंकि यह पूरी तरह से समकालीन मुद्दों को नहीं पकड़ती.प्रारम्भिक ओथ में दासता और पुरुष केन्द्रित विचार थे. इसीलिए कई जगहों पर संशोधित ओथ अपनाई गई. प्रारंभिक या मूल हिप्पोक्रेटिक ओथ लगभग 2500 साल पहले लिखी गई थी. उस समय का ग्रीक समाज आज के आधुनिक लोकतांत्रिक समाज से बहुत अलग था.

यहां पुरुष केंद्रित विचार के क्या हैं मायने?

प्राचीन यूनान में चिकित्सा का पेशा और शिक्षा पूरी तरह पुरुषों के हाथ में थी. ओथ की भाषा और उसके नियम इसी को दर्शाते थे. मूल शपथ में डॉक्टर यह वादा करता था कि वह चिकित्सा का ज्ञान सिर्फ अपने बेटों, अपने गुरु के बेटों और उन शिष्यों को देगा जिन्होंने शपथ ली है. इसमें बेटियों को शिक्षा देने का कोई उल्लेख नहीं था. शपथ की पूरी शब्दावली पुरुषों के लिए थी, क्योंकि उस दौर में महिलाओं को डॉक्टर बनने की अनुमति नहीं थी. महिलाओं को अक्सर मरीज के तौर पर भी स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं था, उनके स्वास्थ्य संबंधी निर्णय परिवार के पुरुष सदस्य लेते थे.

दासता, सामाजिक भेदभाव और चिकित्सा धर्म

उस समय यूनान में दास प्रथा एक स्वीकृत सामाजिक व्यवस्था थी. मूल ओथ में इसका असर साफ दिखता था. ओथ में कहा गया था कि डॉक्टर किसी भी घर में जाए तो वह वहां रहने वालों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, लेकिन व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र नागरिकों और दासों के इलाज की गुणवत्ता में बहुत अंतर रखा जाता था. ओथ में एक लाइन है: मैं किसी भी घर में प्रवेश करूं, तो मैं वहां रहने वाले स्त्री या पुरुष, चाहे वे स्वतंत्र हों या दास, उनके साथ यौन अनाचार नहीं करूंगा. यह वाक्य यह साबित करता है कि उस दौर में दासों का यौन शोषण एक आम समस्या थी, जिसे रोकने के लिए विशेष रूप से शपथ में शामिल करना पड़ा. दासों का अपना कोई अधिकार नहीं था, वे अपने मालिक की संपत्ति माने जाते थे. डॉक्टर की वफादारी अक्सर दास मरीज के प्रति होने के बजाय उसके मालिक के प्रति होती थी.

समय के साथ बदलाव क्यों आए?

इन्हीं भेदभावपूर्ण बातों के कारण आधुनिक समय में मूल हिप्पोक्रेटिक ओथ को बदल दिया गया है. अब डॉक्टरों की शपथ में लिंग, जाति, धर्म या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न करने की बात स्पष्ट रूप से जोड़ी गई है. अब ज्ञान देने की बात केवल बेटों तक सीमित नहीं है. चिकित्सा शिक्षा सभी के लिए खुली है. साल 1948 के जिनेवा घोषणा पत्र ने इन पुरानी कमियों को दूर किया और इसे पूरी तरह मानवतावादी और निष्पक्ष बनाया.

पुरुष प्रधान समाज का असली मतलब क्या था?

मूल ओथ में डॉक्टर एक बहुत ही गंभीर वादा करता था, जो उस जमाने में पुरुष प्रधान समाज की मजबूती को दिखाता था. डॉक्टर शपथ लेता था कि मैं अपने गुरु को अपने पिता के समान मानूंगा. वह कसम खाता था कि अगर मेरे गुरु को कभी पैसों की जरूरत हुई, तो मैं अपनी संपत्ति उनके साथ साझा करूंगा. डॉक्टर वादा करता था कि मैं अपने गुरु के पुत्रों को अपने भाइयों की तरह मानूंगा और अगर वे चिकित्सा सीखना चाहें, तो उन्हें बिना किसी फीस या लिखित अनुबंध के यह शिक्षा दूंगा.

यहां पुरुष प्रधानता कहां दिखती है?

शपथ में स्पष्ट रूप से गुरु के बेटों को सिखाने की बात कही गई है, बेटियों की नहीं. यह उस समय के पुरुष प्रधान ढांचे को दिखाता है जहाँ ज्ञान और पेशा केवल पुरुषों को विरासत में मिलता था. संपत्ति साझा करने का वादा भी पुरुषों के बीच के समझौतों को दर्शाता है, क्योंकि उस समय की कानूनी व्यवस्था में महिलाएं संपत्ति की मालिक नहीं होती थीं.

मरीज की सहमति और स्वायत्तता

आज मरीज की इच्छा को महत्व दिया जाता है. इन्हें इन्फॉर्म्ड कंसेंट कहा जाता है. मूल ओथ में यह स्पष्ट नहीं था, लेकिन आधुनिक शपथों में यह एक अहम हिस्सा बन गया है. आधुनिक समय में कुछ दुविधाएँ भी सामने आती हैं. कुछ नैतिक दिक्कतें नई हैं. जैसे गर्भपात, जीवनसमाप्ति निर्णय, जीनसंपादन आदि. इन पर डॉक्टरों के भीतर अलगअलग विचार हैं. शपथ इन सवालों के लिए स्पष्ट उत्तर नहीं देती. पर, यह डॉक्टरों को विचारशील और जवाबदेह बनाती है.

भारतीय डॉक्टरों के शपथ का मूल भाव

भारत में मेडिकल छात्र डॉक्टर बनते समय जो शपथ लेते हैं, उसे अब चरक शपथ कहा जाता है. डॉक्टर कहते हैं कि मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं बीमार व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दूंगा. मेरा मुख्य उद्देश्य मरीजों को बीमारी से मुक्त करना और उन्हें आरोग्य प्रदान करना होगा. मैं मरीजों का इलाज केवल पैसे या लाभ के लिए नहीं करूंगा. मैं अपनी चिकित्सा सेवा को कर्तव्य मानकर निभाऊंगा. मैं इलाज करते समय मरीज की जाति, धर्म, रंग या उनके अमीरगरीब होने के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करूंगा. मरीज के घर जाने पर या इलाज के दौरान मुझे उनके परिवार के बारे में जो भी गुप्त जानकारी मिलेगी, उसे मैं कभी भी बाहर किसी को नहीं बताऊंगा. मैं अपने आचरण को हमेशा पवित्र और साफ रखूँगा. मैं महिलाओं का सम्मान करूँगा. मैं लगातार अपने चिकित्सा ज्ञान को बढ़ाता रहूँगा ताकि मरीजों को बेहतर इलाज दे सकूँ. मैं कभी भी किसी मरीज को जानबूझकर नुकसान नहीं पहुँचाऊंगा.

सरल शब्दों में कहें तो हिप्पोक्रेटिक ओथ का इतिहास लंबा है. यह चिकित्सा के नैतिक आधार का पहला रूप था. समय के साथ यह बदली और आधुनिक मानदंडों के अनुरूप हुई. आज भी यह डॉक्टरों को नैतिक रूप से मार्गदर्शित करती है. डॉक्टर्स डे पर इसे याद करना जरूरी है. यह हमें बताता है कि चिकित्सा केवल विज्ञान नहीं है. यह मानवता और सेवा का काम भी है.

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