इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश गोवंश वध निवारण अधिनियम के तहत एक वाहन को अवैध रूप से जब्त किए जाने के मामले में राज्य सरकार कड़ी फटकार लगाई है. कोर्ट ने कहा कि पर्याप्त कानूनी आधार के बिना वाहन को जब्त करना फिर उसकी नीलामी कर देना कानून के मुताबिक नहीं था. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को वाहन मालिक को दो लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है.

इलाहाबाद कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसका वाहनगोवंश को वध के लिए ले जाने को लेकर गलत आरोप में जब्त किया गया था. फिर उसकी नीलामी कर दी थी. अब न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने कहा कि केवल इस आधार पर कि वाहन में गोवंश ले जाया जा रहा था, यह नहीं माना जा सकता कि उन्हें वध के लिए ले जाया जा रहा था.
अदालत ने अपने आदेश में क्या कहा?
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रदेश के भीतर गोवंश के परिवहन के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं है. राज्य सरकार की तरफ से यह साबित नहीं हो सका कि गोवंश के उद्देश्य से वाहन राज्य से बाहर ले जाया जा रहा था.ऐसे में वाहन की जब्ती और बाद की नीलामी पूरी तरह अवैध और मनमानी थी. सिर्फ शक और आशंका के आधार पर इस तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती है.
इस फैसले को गोवंश परिवहन से जुड़े मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अदालत के आदेश के मुताबिक गोवंश वध कानून के तहत कार्रवाई करते समय प्रशासन को कानूनी प्रक्रिया और पर्याप्त साक्ष्यों का पालन करना होगा.
अदालत में सरकार को मुआवजा देने का आदेश दिया
कोर्ट ने कहा कि प्रशासन की कार्रवाई से वाहन मालिक को आर्थिक नुकसान हुआ क्योंकि वाहन उसकी आजीविका का प्रमुख साधन था. अब अदालत ने राज्य सरकार को कम से कम 2 लाख रुपये का मुआवजा सात दिन के भीतर देने का निर्देश दिया है. अदालत ने यह भी कहा कि अगर सरकार चाहे तो यह राशि उस अधिकारी से वसूल सकती है, जिसने इस मामले में कार्रवाई की थी.
पहले भी कोर्ट इस तरह के फैसले दे चुका है
इलाहाबाद हाईकोर्ट इससे पहले भी इस तरह के फैसले दे चुका है कि उत्तर प्रदेश के भीतर गोवंश के परिवहन के लिए परमिट आवश्यक नहीं है. केवल संदेह या अनुमान के आधार पर वाहन जब्त नहीं किया जा सकता. अब यह साबित नहीं हो कि गोवंश को वध के लिए राज्य से बाहर ले जाया जा रहा था, तो गोवंश वध निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है.



