महात्मा गांधी ने कहा कि अगर कांग्रेस उनके प्रस्ताव के साथ नही है, तब वे अकेले ही संघर्ष शुरु करेंगे. जनता से कहा इसी समय से खुद को आजाद समझें. ‘करो या मरो’ का नारा देते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि यह लड़ाई लुकछिपकर नहीं बल्कि खुलकर लड़नी है. गोलियों का सामना करने के लिए छाती खोल देनी है. यह आखिरी और निर्णायक लड़ाई है जिसमें या तो आजादी छीन लें या फिर उसके लिए जान गंवा दें.

9 अगस्त 1942, आजादी के संघर्ष का निर्णायक मोड़ था. इसने अंग्रेजी सत्ता को भारत से विदाई का संदेश दिया. लेकिन दूसरी तरफ़ कांग्रेस की लीडरशिप के लंबे समय तक जेल में रहने के कारण मुस्लिम लीग को पैर पसारने का मौका दिया. आंदोलन की वर्षगांठ के मौके पर पढ़िए गांधी तब रुकने को क्यों नहीं थे तैयार?
क्रिप्स मिशन के जरिए टालमटोल
दूसरे विश्वयुद्ध में उलझा ब्रिटेन अभी भारत छोड़ने को तैयार नहीं था. युद्ध में भारत के सहयोग के लिए उसने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा. क्रिप्स के प्रस्तावों में युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने तथा संविधान सभा के गठन का आश्वासन था. लेकिन इसमें सत्ता हस्तांतरण का जिक्र नहीं था. इतना ही नहीं, इस पेशकश में प्रांतों को संघ से अलग होने का विकल्प देकर भविष्य के विभाजन का भी बीज बो दिया गया था. कांग्रेस ने इसे “टालमटोल का प्रस्ताव” माना, जबकि मुस्लिम लीग को अलग देश पाकिस्तान से कम कुछ मंजूर नहीं था. इसने गांधी को इस नतीजे पर पहुंचा दिया कि ब्रिटिश सरकार आसानी से सत्ता छोड़ने वाली नहीं है. निर्णायक लड़ाई की शुरुआत जरूरी है.
भारत छोड़ो आंदोलन को मिले भारी जनसमर्थन से अंग्रेज सरकार घबरा गई थी.
अकेले निकल पड़ने की गांधी की चेतावनी
संघर्ष के अलावा अब कोई रास्ता शेष नहीं था. महात्मा गांधी जिनका धैर्य और संयम उनके अनुयायियों तक को बेचैन कर देता था, निर्णायक संघर्ष की मुद्रा में थे. इलाहाबाद में 29 अप्रैल से 2 मई 1942 तक सम्पन्न कांग्रेस की बैठक में मीरा बेन के जरिए जो प्रस्ताव उन्होंने भेजा, उसमें अंग्रेजों से भारत को उसके हाल पर छोड़ देने की मांग की गई थी. इसी महीने एक बार फिर उन्होंने दोहराया, “भारत को भगवान के भरोसे छोड़ दीजिए.
अगर यह कुछ ज्यादा हो तो उसे अराजकता के भरोसे छोड़ दीजिए. यह व्यवस्थित और अनुशासित अराजकता समाप्त होनी चाहिए और अगर पूरी बदअमनी फैलती है, तो उसका जोखिम उठाने को मैं तैयार हूं.” सात जुलाई से चौदह जुलाई तक वर्धा में हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में गांधी इस हद तक चले गए कि अगर कांग्रेस उनके प्रस्ताव के साथ नही है, तब वे अकेले ही संघर्ष शुरु करेंगे. हालांकि मौलाना आजाद, पंडित नेहरु, पण्डित गोविंद बल्लभ पंत, सैय्यद महमूद और आसफ़ अली जैसे नेता इस मौके पर आंदोलन शुरू करने के पक्ष में नहीं थे. इस समूह की दलील थी कि युद्ध के बीच आंदोलन से जर्मनीजापान के फासिस्ट गठजोड़ के खिलाफ़ मित्र राष्ट्रों की लड़ाई कमजोर होगी.
महात्मा गांधी.
गोलियां खाने के लिए खोल दो छातियां
गांधी पर इस ऐतराज का कोई असर नहीं था. बम्बई अधिवेशन में गांधी का आठ अगस्त 1942 का भाषण संघर्ष का शंखनाद था. उन्होंने कहा था, “देश की जनता इसी समय से खुद को आजाद समझें. जब हम खुद को आजाद मान लेते हैं, उसी समय गुलामी के बन्धन टूट जाते हैं.” खुली लड़ाई का ऐलान करते हुए ‘करो या मरो’ का नारा उन्होंने इसी भाषण में दिया और जोर देकर कहा कि यह लड़ाई लुकछिपकर नहीं बल्कि खुलकर लड़नी है. गोलियों का सामना करने के लिए छाती खोल देनी है. यह आखिरी और निर्णायक लड़ाई है जिसमें या तो आजादी छीन लें या फिर उसके लिए जान गंवा दें. गांधी की सोच के मुताबिक एक बार आंदोलन के पक्ष में फैसला हो जाने के बाद पूरी कांग्रेस उनके पीछे एक जुट थी.
लीग को साथ लेने की एक और नाकाम कोशिश
हमेशा की तरह जिन्ना और मुस्लिम लीग गांधी के प्रति आक्रामक थे. लेकिन गांधी ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी. उन्होंने मुस्लिम लीग से आंदोलन से जुड़ने की अपील करते हुए पेशकश की कि अगर वह बिना शर्त कांग्रेस के साथ पूरा सहयोग करते हुए फ़ौरन आजादी की मांग के लिए तैयार हो जाए तो ब्रिटिश सरकार द्वारा उसे, पूरे भारत के नाम पर सारे अधिकार दे देने में भी कांग्रेस को कोई ऐतराज नहीं होगा.
मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के संस्थापक कहलाए.
मुस्लिम लीग जो सरकार बनाएगी, कांग्रेस उसके कामकाज में कोई अड़चन नहीं डालेगी और शासन चलाने के लिए सरकार में शामिल भी होगी. गांधी की तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेस से दूरी रखने के सवाल पर जिन्ना अडिग रहे. हालांकि मुस्लिम लीग का एक हिस्सा इस सवाल पर जिन्ना से सहमत नहीं था. लेकिन जिन्ना नहीं माने और लीग की बैठक में आंदोलन से दूरी रखने के साथ ही कांग्रेस की जमकर आलोचना भी की.
वीरांगना अरुणा आसफ़ अली ने लहराया तिरंगा
8 अगस्त 1942 की रात बम्बई अधिवेशन में अगले दिन से आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव मंजूर हुआ. लेकिन प्रशासनपुलिस ने सुबह का इंतजार नहीं किया. देर रात से 9 अगस्त की भोर के बीच महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, आचार्य कृपलानी सहित कांग्रेस का लगभग पूरा राष्ट्रीय नेतृत्व गिरफ्तार कर लिया गया. सरकार नेताओं को कैद कर आंदोलन को शुरुआती दौर में ही कुचल देना चाहती थी. लेकिन इन गिरफ्तारियों ने आंदोलन को और धार दी. नेता जेल में थे और जनता सड़कों पर थी. उसी सुबह बंबई के गोवालिया टैंक मैदान में एक वीरांगना ने अंग्रेजी सत्ता को सीधी चुनौती दी. वे अरुणा आसफ अली थीं,जो पुलिस की घेराबंदी को चीरती हुई मैदान में पहुंचीं.
अरुणा आसफ अली.
छोटा लेकिन रोमांचित करने वाला भाषण दिया और तिरंगा फहरा दिया. पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी. लाठियां बरसाईं. भीड़ को तितरबितर करने की नाकाम कोशिश की. तिरंगा मैदान में शान से लहराता रहा . अरुणा यहीं नहीं थमी. पुलिस को चकमा देकर वे वहां से निकलीं और आगे भूमिगत रहते उन्होंने आंदोलन को जारी रखा. 1946 में गांधी जी ने फरार अरुणा आसफ अली को आत्मसमर्पण की सलाह दी. इसे ठुकराते हुए उन्होंने संघर्ष जारी रखा.
सच्चे अर्थों में जनांदोलन
9 अगस्त 1942 को शुरू हुआ यह संघर्ष ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ जारी लंबी लड़ाई का सबसे बड़ा आंदोलन था जो स्वतः स्फूर्त जनविद्रोह में बदल गया था. इसमें रेल लाइनें उखाड़ी गईं. तार काटे गए. डाकघरों और थानों पर हमले हुए.अनेक स्थानों पर समानांतर राष्ट्रीय सरकारें बनीं. बलिया , सतारा और तामलुक इसके चर्चित उदाहरण हैं. यह सच्चे अर्थों में जनांदोलन था. ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए असाधारण दमन का सहारा लिया. पुलिस ने बड़े पैमाने पर अनेक स्थान पर गोलियां चलाईं.
आजादी के हजारों मतवालों की शहादत हुईं. लाखों गिरफ्तार किए गए. अनेक स्थानों पर सेना सड़कों पर उतारी गई. ब्रिटिश इतिहासकार पेंडरेल मून के अनुसार 1942 का विद्रोह भले तत्काल सफल नहीं हुआ, पर उसने यह साफ कर दिया कि ब्रिटेन के लिए भारत पर पुराने ढंग से शासन करना अब असंभव हो गया है.जूडिथ ब्राउन ने लिखा कि 1942 के बाद ब्रिटिश सरकार और भारतीय जनता के बीच विश्वास का जो अंतिम धागा बचा था, वह भी टूट गया.
मुस्लिम लीग हुई अंग्रेजों के और नज़दीक
इस आंदोलन का एक दूसरा पहलू भी था. अंग्रेजी हुकूमत ने 1942 से 1945 तक कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को जेल में बंद रखा. इसका जिन्ना और मुस्लिम लीग ने खूब लाभ उठाया. आंदोलन से कुपित अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग को और ज्यादा तरजीह देना शुरू किया. इस बीच वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो और उनके बाद लॉर्ड वेवल से जिन्ना की नजदीकियां खूब बढ़ीं . इतिहासकार आयशा जलाल के मुताबिक 1942 से 1945 के बीच का समय जिन्ना की राजनीतिक शक्ति को निर्णायक रूप से बढ़ाने वाला काल सिद्ध हुआ. इसी दौरान ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण के सवाल पर लीग को एक अपरिहार्य पक्ष के तौर पर स्वीकार करना शुरू किया. मुस्लिम वोटरों पर भी लीग की पकड़ का विस्तार हुआ.
1946 के सेंट्रल लेजिस्लेटिव और फिर प्रांतीय असेंबलियों के चुनाव नतीजों ने इसके सबूत दिए. इस चुनाव में लीग को मुस्लिम सीटों पर 90 फीसद वोट के साथ जबरदस्त जीत हासिल हुई थी. कांग्रेस की कामयाबी जनरल सीटों पर सीमित थी. प्रांतीय असेंबलियों के चुनाव में उत्तर पश्चिम सीमांत को छोड़कर अन्य राज्यों की मुस्लिम सीटों पर लीग का दबदबा रहा. यूनाइटेड प्रॉविंस की शहरी मुस्लिम सीटों पर कांग्रेस को एक फीसद से भी कम वोट मिले. पंजाब की 86 में 75 मुस्लिम सीटें, बंगाल की 119 में 113, असम की 34 में 33, सिंध की 34 में 28, सयुंक्त प्रान्त की 66 में 54, बम्बई और मद्रास की सभी क्रमशः 30 और 29, केंद्रीय प्रान्त की 14 में 13, उड़ीसा की चारों, बिहार की 40 में 34 और पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त की 38 में 17 मुस्लिम सीटें हासिल करने के बाद जिन्ना ने एक बार फिर हुंकार भरी कि मुसलमानों के वे इकलौते लीडर हैं. कांग्रेस सिर्फ हिंदुओं की बात करे.
विभाजन की मांग हुई और तेज
इधर गांधी हिन्दूमुस्लिम एकता की अपीलें कर रहे थे तो दूसरी तरफ़ मुस्लिम सीटों पर एकतरफा जीत की बदौलत जिन्ना का हौसला आसमान पर था. बेहद आक्रामक अंदाज में वे बराबर दोहराते रहे कि मिस्टर गांधी के विचारों का आजाद भारत हमारी सोच से बुनियादी तौर पर अलग है. गांधी के लिए आजादी का मतलब है कांग्रेस का राज. मैं उनसे कहता हूं कि वे मुसलमानों को यह कह कर बेवकूफ बनाने का खेल छोड़ दें कि हम पाकिस्तान हासिल करने के लिए अंग्रेजों पर निर्भर हैं. मुसलमानों से उन्हें कोई मतलब नहीं होना चाहिए. वे सिर्फ हिंदुओं के लीडर हैं और उन्हीं की बात करें.
मुसलमान पूरी तौर पर लीग के साथ हैं और उनका इकलौता लीडर मैं हूं. बेशक भारत छोड़ो आंदोलन ने संदेश दिया कि अंग्रेजों की विदाई नजदीक है. लेकिन इस कामयाबी के साथ यह विडंबना थी कि जिस आंदोलन ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दीं, उसमें लंबे समय तक कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं के जेल में बंद रहने की वजह से जिन्ना और मुस्लिम लीग को पांव पसारने का भरपूर मौका मिला . अगर 1942 का आंदोलन आजादी की लड़ाई का निर्णायक मोड़ बना तो दूसरी और विभाजन की राजनीति के तेज़ होने का यह महत्वपूर्ण पड़ाव भी था.



