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बोइंग या एयरबस, भारत का सबसे बड़ा विमान सप्लायर कौन? 210 एयरक्राफ्ट खरीदने की तैयारी

भारत सरकार ने भारतीय सेना, वायु सेना और नौ सेना को मजबूती देने के इरादे से दो बड़े फैसले लिए हैं. पहले फैसले के तहत सरकार 60 ट्रांसपोर्ट तथा 150 ट्रेनर एयरक्राफ्ट खरीदने का फैसला लिया है. दूसरा महत्वपूर्ण फैसला यह है कि ज्यादा से ज्यादा जहाज देश में बनें, यह भी सुनिश्चित हो. ऐसा करने का मतलब यह हुआ कि तकनीक बाहर से लेकर अपने देश में ही निर्माण करने का प्रयास है. अभी तक देश में सरकारी कंपनी एचएएल इस क्षेत्र में है. अब उसके सामने निजी क्षेत्र ने भी दस्तक दे दी है. टाटा और महिंद्रा जैसे औद्योगिक समूहों ने विमानन क्षेत्र में कदम बढ़ा दिए हैं.

टाटा ने तो ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट निर्माण की ओर कदम भी बढ़ा दिए हैं. देखना रोचक होगा कि नए सौदे में भारतीय कंपनियां कितना सहयोग कर पाती हैं. क्योंकि यह सौदा एक लाख करोड़ से भी ज्यादा का बताया जा रहा है. आइए, इसी सरकार के इस ताजे फैसले के बहाने समझते हैं कि भारत को विमान की सबसे ज्यादा आपूर्ति करने वाले देश या कंपनियां कौनकौन हैं?

नागरिक विमानन: एयरबस की बड़ी पकड़

भारत का घरेलू विमानन बाजार तेजी से बढ़ रहा है. यात्रियों की संख्या बढ़ रही है. नए हवाई अड्डे बन रहे हैं. एयरलाइंस अपने बेड़े का विस्तार कर रही हैं. ऐसे में भारत अब केवल आयात पर निर्भर नहीं रहना चाहता. देश का लक्ष्य विमान खरीदने के साथसाथ उन्हें भारत में बनाना, मरम्मत करना और भविष्य में निर्यात करना भी है. एयरबस और बोइंग, दोनों कंपनियों को भारत से बड़े ऑर्डर मिल रहे हैं. फिर भी घरेलू उड़ानों में एयरबस आगे है. इसका मुख्य कारण इंडिगो है. इंडिगो भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन है. उसके बेड़े में अधिकतर एयरबस ए320 और ए321 विमान हैं.

भारतीय वायुसेना का विमान एयरबसC 295. फोटो: PTI

एयरबस के ये विमान छोटी और मध्यम दूरी की उड़ानों के लिए उपयोगी माने जाते हैं. भारत के घरेलू बाजार में एयरबस विमानों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक रही है. इसके मुकाबले बोइंग की मौजूदगी कम है. अंतरराष्ट्रीय और लंबी दूरी की उड़ानों में बोइंग की भूमिका मजबूत है. एयर इंडिया के पास बोइंग 777 और 787 ड्रीम लाइनर जैसे बड़े विमान हैं.

एयरबस को बड़े ऑर्डर क्यों मिले?

एयरबस को भारत में बढ़त मिलने के कई कारण हैं.

  • पहला कारण है ईंधन दक्षता. ए320 और ए321 जैसे विमान पुराने मॉडल की तुलना में कम ईंधन खर्च करने के लिए बनाए गए हैं. ईंधन किसी एयरलाइन की बड़ी लागत होती है.
  • दूसरा कारण है सीट क्षमता. ए321 जैसे विमान एक ही उड़ान में अधिक यात्री ले जा सकते हैं. इससे प्रति सीट लागत कम होती है.
  • तीसरा कारण है रखरखाव में सुविधा. जब किसी एयरलाइन के पास एक ही परिवार के अधिक विमान होते हैं, तो पायलट प्रशिक्षण, स्पेयर पार्ट्स और इंजीनियरिंग प्रबंधन आसान हो जाता है.

इंडिगो ने 500 एयरबस ए320 परिवार के विमानों का बड़ा ऑर्डर दिया था. यह वैश्विक नागरिक विमानन के सबसे बड़े एकल ऑर्डरों में शामिल रहा. एयर इंडिया ने भी एयरबस से बड़े पैमाने पर विमान खरीदे हैं. एयर इंडिया के 570 विमानों के विस्तार कार्यक्रम में 350 विमान एयरबस के हैं.

भारतीय नौसेना का IN327 बोइंग P8I नेपच्यून विमान. फोटो: PTI

बोइंग की भूमिका भी कम नहीं

एयरबस की बढ़त का अर्थ यह नहीं कि बोइंग भारत में कमजोर है. बोइंग विशेष रूप से लंबी दूरी के बाजार में महत्वपूर्ण है. एयर इंडिया के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में बोइंग 777 और 787 विमानों की बड़ी भूमिका है. ये विमान अमेरिका, यूरोप और अन्य दूरस्थ गंतव्यों तक उड़ान भरने में सक्षम हैं. एयर इंडिया एक्सप्रेस के पास बोइंग 737 विमान हैं. अकासा एयर भी बोइंग 737 मैक्स परिवार के विमान इस्तेमाल करती है. इसलिए भारत का बाजार केवल एक कंपनी पर निर्भर नहीं है. एयरलाइंस अक्सर एयरबस और बोइंग दोनों से विमान खरीदती हैं. इससे आपूर्ति में जोखिम कम होता है. प्रतिस्पर्धा भी बनी रहती है.

रक्षा क्षेत्र में रूस का स्थान महत्वपूर्ण

रक्षा विमानन की तस्वीर एकदम से जुदा है. भारत को लंबे समय तक सबसे अधिक सैन्य विमान और हथियार देने वाले देशों में रूस सबसे आगे रहा है. सोवियत संघ के दौर से भारत ने रूस से लड़ाकू विमान, परिवहन विमान और हेलीकॉप्टर खरीदे हैं. भारतीय वायुसेना के कई प्रमुख प्लेटफॉर्म रूसी मूल के हैं. इनमें मिग21, मिग29, सुखोई30 एमकेआई, आईएल76 परिवहन विमान और एएन32 परिवहन विमान शामिल हैं.

सुखाेई.

भारतीय नौसेना भी मिग29के लड़ाकू विमान चलाती है. सेना और वायुसेना में रूसी मूल के कई हेलीकॉप्टर भी उपयोग में हैं. सुखोई30 एमकेआई भारतीय वायुसेना की लड़ाकू क्षमता का एक बड़ा आधार रहा है. यह विमान रूस के सुखोई डिजाइन पर आधारित है, लेकिन इसका उत्पादन भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने किया है. इसमें भारतीय, रूसी, फ्रांसीसी और इजरायली प्रणालियों का मिश्रण है.

रूस पर निर्भरता और नई चुनौतियां

रूस भारत का महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार है, लेकिन निर्भरता के साथ चुनौतियां भी हैं. युद्धक विमानों को लंबे समय तक चलाने के लिए इंजन, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता और उन्नयन की जरूरत होती है. किसी एक देश पर बहुत अधिक निर्भरता आपूर्ति जोखिम पैदा कर सकती है. रूसयूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ा. इससे कई देशों के रक्षा खरीद कार्यक्रमों पर असर पड़ा. भारत ने भी अपने रक्षा स्रोतों में विविधता बढ़ाने की कोशिश तेज की है. अब भारत फ्रांस, अमेरिका, इजरायल और अन्य देशों से भी रक्षा उपकरण खरीद रहा है.

राफेल.

रक्षा क्षेत्र में फ्रांस और अमेरिका की बढ़ती भूमिका

भारत की रक्षा खरीद में फ्रांस का महत्व बढ़ा है. राफेल विमान, स्कॉर्पीन पनडुब्बी परियोजना और अन्य सहयोग इस संबंध को मजबूत बनाते हैं. भविष्य की लड़ाकू विमान जरूरतों में भी फ्रांस का नाम महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अमेरिका भी भारत को परिवहन और निगरानी विमान उपलब्ध करा रहा है. भारतीय वायुसेना के सी17 ग्लोबमास्टर और सी130जे सुपर हरक्यूलिस विमान अमेरिकी मूल के हैं. भारतीय नौसेना के पी8I समुद्री निगरानी विमान भी अमेरिका से आए हैं. ये विमान समुद्री निगरानी, पनडुब्बी रोधी अभियान और लंबी दूरी की गश्त में उपयोगी हैं. इस तरह रक्षा विमानन में रूस पुराना और बड़ा स्रोत है, लेकिन फ्रांस और अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़ रही है.

सार्वजनिक क्षेत्र में HALसबसे महत्वपूर्ण

भारत के सार्वजनिक क्षेत्र में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड सबसे बड़ी एयरोस्पेस और रक्षा विमान निर्माण कंपनी है. एचएएल की भूमिका केवल विमान असेंबल करने तक सीमित नहीं है. कंपनी निर्माण, रखरखाव, मरम्मत, उन्नयन और परीक्षण का काम भी करती है. एचएएल ने तेजस हल्का लड़ाकू विमान बनाया है. यह भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम का प्रमुख चेहरा है. एचएएल सुखोई30 एमकेआई का लाइसेंस उत्पादन कर चुकी है. कंपनी ध्रुव हेलीकॉप्टर, लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड और लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर जैसे प्लेटफॉर्म भी बनाती है. इसके सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी तेजस मार्क1ए की समय पर आपूर्ति है. भारतीय वायुसेना पुराने मिग विमानों को चरणबद्ध रूप से हटाना चाहती है. ऐसे में स्वदेशी विमानों की समय पर डिलीवरी जरूरी है.

DRDO की भूमिका भी अहम

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन नए विमान और तकनीक विकसित करने में अहम भूमिका निभाता है. तेजस कार्यक्रम में डीआरडीओ की एजेंसियों का योगदान रहा है. भविष्य का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट भी भारत की बड़ी परियोजना है. नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज और एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी भी डिजाइन और अनुसंधान में भागीदार हैं. सार्वजनिक क्षेत्र का उद्देश्य केवल विदेशी डिजाइन पर उत्पादन नहीं, बल्कि अपनी तकनीक विकसित करना है.

इस तरह कहा जा सकता है कि नागरिक विमानन में भारत का सबसे बड़ा विमान सप्लायर एयरबस है. घरेलू उड़ानों में उसकी पकड़ सबसे मजबूत है. बोइंग लंबी दूरी और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में महत्वपूर्ण बना हुआ है. रक्षा क्षेत्र में रूस ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़ा विदेशी विमान और सैन्य प्लेटफॉर्म सप्लायर रहा है. लेकिन अब भारत फ्रांस, अमेरिका और अन्य देशों के साथ भी साझेदारी बढ़ा रहा है. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि भारत अब खरीदार से निर्माता बनने की दिशा में बढ़ रहा है. एचएएल, डीआरडीओ और भारतीय उद्योग इस परिवर्तन के केंद्र में हैं. भविष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्वदेशी विमान समय पर, उचित लागत पर और विश्वसनीय गुणवत्ता के साथ तैयार होते हैं.

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