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​National Nutrition Week 2026: 30 साल पहले भारतीयों की थाली में क्या होता था? आज की प्लेट से तुलना करें तो दिखेगा बड़ा बदलाव

न्यूट्रिशनल वीक यानी पोषण सप्ताह एक तरह का अभियान होता है, जिसमें ये समझाने की कोशिश की जाती है कि खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं खाना चाहिए, बल्कि इससे आपको सही पोषण मिलना चाहिए जैसे अलगअलग तरह के विटामिनमिनरल्स, प्रोटीन, अमीनो एसिड्स, गुड फैट्स. इसका उद्देश्य कुपोषण के मामलों के बारे में जागरूक करना भी है. 2026 के राष्ट्रीय पोषण सप्ताह की थीम “डिस्कवर द पावर ऑफ न्यूट्रिशन” रखी गई है. इस मौके पर जानेंगे कि कैसे 30 सालों में भारतीय खाने की थाली में बदलाव आया है.

खाना हमारी इम्यूनिटी को बूस्ट करके कई बीमारियों से बचाए रखने में मदद करता है. अगर थाली में सही मात्रा में पोषक तत्व न हो तो इससे न सिर्फ शरीर कमजोर होने लगता है, बल्कि कई हेल्थ प्रॉब्लम भी हो सकती हैं. आज के टाइम में बिगड़ा हुआ खानपान लोगों में बीमार पड़ने, मोटापे की बड़ी वजह है. चलिए जान लेते हैं भारतीय खाने में आए बदलावों के बारे में.

भारतीय संस्कृति में खाना

30 साल यानी 1995 से 2026 तक भारत के खानपान के तरीकों से लेकर फूड्स तक में काफी बदलाव आया है. हमारे यहां खाने को संस्कृति और परंपरा से भी जोड़ा जाता है. अन्न को भगवान के बराबर दर्जा देते हैं, क्योंकि ये हमारा भरणपोषण करता है. पहले के समय में लोग ज्यादातर सही समय पर खाना खा लिया करते थे. जैसे डिनर कम से कम 8 बजे तक कर लेते थे तो वहीं सुबह जल्दी उठते थे, इसलिए नाश्ता भी 7 से 8 के बीच में और लंच 12 से 1 के बीच में किया जाता था. आज भी ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर इसी टाइमटेबल को फॉलो किया जाता है.

तीन दशक में खाने में आए बदलाव

30 साल पहले यानी लगभग 1995 में भारतीय परिवारों की खाने की थाली में मुख्य रूप से चावल और गेहूं की रोटियां होती थीं. इसी के साथ मौसमी सब्जियों, दालों और दूधदही, छाछ, कच्चा सलाद, अचार, चटनी जैसी चीजों को शामिल किया जाता था. गांवों में अलगअलग तरह के अनाज की रोटियां मौसम के हिसाब से थाली का हिस्सा बनती थीं. इसमें खासियत ये थी कि ज्यादातर सब्जी, फल मौसम के हिसाब से और ताजे ही आते थे.

नाश्ते में भी घर की तैयार चीजें

उस टाइम में लोग नाश्ते में भी घर की चीजें ज्यादा पसंद किया करते थे. इसमें गेहूं या किसी और अनाज का मीठा दलिया, नमकअजवाइन के सादा पराठे, चीला, प्याज जैसी सब्जियों के पराठे और यहां तक कि सब्जीरोटी भी खा ली जाती थी. इसके अलावा स्थानीय पारंपरिक व्यंजनों में क्षेत्र के हिसाब से पोहा, उपमा, इडली, थेपला, ढोकला, जैसी चीजें शामिल होती थीं और चाय तो बहुत पुराने समय से मॉर्निंग रूटीन का हिस्सा रही है.

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पैकेज्ड और फास्ट फूड

1995 और 1996 एक ऐसा टाइम था जब बड़े फास्ट फूड चेन के आउटलेट्स भारत में शुरू हुए और लोगों ने पिज्जा, बर्गर को जानना शुरू किया. इन कंपनियों ने खाने में एक्सपेरिमेंट करके भारतीय स्वाद को भी इसमें शामिल किया जैसे आलू टिक्की. हालांकि उस दौरान फास्ट फूड या फिर रेडी टू ईट वाले पैकेज्ड फूड थाली का अहम हिस्सा नहीं थे, बल्कि इसे कभीकभी ही लोग चखते थे और आम लोगों के एक तबके की पहुंच में ये लंबे समय के बाद आया.

ये आया बड़े बदलाव

1995 से लेकर 2026 तक खाने में धीरेधीरे बदलाव हुए, लेकिन इस दौरान सबसे बड़े बदलाव की बात करें तो भारतीय थाली में अनाज बेस्ड खाने की तरफ से लोग अलगअलग वैरायटी के खाने की तरफ बढ़ने लगे. इसका मतलब ये नहीं था कि लोगों ने रोटीचावल खाना बहुत कम किया, बल्कि कुल खाने में दालों और कैरेल्स की हिस्सेदारी कम हो गई. इसी के साथ बाकी के फूड्स जैसे फलसब्जियां ज्यादा बढ़ गए.

नीति आयोग के मुताबिक 1999 में भारतीय ग्रामीण परिवारों के औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च में cereals की हिस्सेदारी 22.23% थी, जो 202223 में घटकर 4.91% रह गई. शहरी क्षेत्रों में यह हिस्सेदारी 12.39% से घटकर 3.64% हो गई.

के एक और विश्लेषण के अनुसार, 201112 और 202223 के बीच ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में दूध और दूध से बने उत्पादों, फलों, पेय पदार्थों और प्रोसेस्ड फूड की हिस्सेदारी बढ़ी. ग्रामीण इलाकों में अंडे, मछली और मांस की हिस्सेदारी भी बढ़ी, जबकि शहरी इलाकों में यह लगभग स्थिर रही.

बदलते लाइफस्टाइल का खाने पर असर

2000 से 2010 के बीच नौकरी, रोजगार के लिए शहरों की तरफ लोगों का रुख होना, आय में बढ़ोत्तरी, बाजार में प्रोडक्ट्स की बढ़ती उपलब्धता और समय की कमी की वजह से खाने की आदतों में बदलाव आने लगे. लोग पैकेज्ड फूड, खासकर मेट्रो सिटीज में ऐसे फूड ज्यादा पॉपुलर हुए.

2020 से तेजी से बदली आदतें

जब कोविड आया तो लोग लॉकडाउन की वजह से घरों में कैद हो गए. इस वजह से ऑनलाइन ग्रॉसरी मंगवाना आम हो गया. इसी के साथ लोग पैक्ड और प्रोसेस्ड फूड्स भी मंगवाने लगे और कई तरह के खाने के ऑप्शन बढ़ गए. इस वजह से लोगों में मोटापा के मामले भी काफी देखने को मिले.

2026 में भारतीय खाना

बात करें आज के समय की तो हर गलीनुक्कड़ पर जंक फूड के स्टॉल्स मिल जाते हैं. इसी के साथ सुपर मार्केट में पैक्ड फूड की भरमार है, जो लोग जॉब में हैं और परिवार से दूर अकेले रहते हैं, वो समय की कमी की वजह से मिनटों में बनने वाले पैक्ड फूड्स पर ज्यादा निर्भर हैं. नॉर्मली खाने की थाली की बात करें तो अब जहां एक तरफ लोग अनहेल्दी चीजें कन्ज्यूम कर रहे हैं तो दूसरी तरफ फिटनेस को लेकर जागरुकता भी बढ़ी है. हालांकि अब हर मौसम में आपको हर तरह के फलसब्जियां मिल जाते हैं, क्योंकि स्टोरेज के तरीके में भी कई बदलाव आए हैं. इसी के साथ अब लोग सीड्स और नट्स को भी तरजीह देने लगे हैं. सोशल मीडिया पर भी हेल्दी चीजों को लेकर जानकारी वाली रील्स वीडियो आते रहते हैं, जिससे लोग धीरेधीरे पुराने खाने को भी जानपहचान रहे हैं.

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