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कश्मीर को दशकों तक हिंसा, आतंक और अलगाववाद की आग में झोंकने वाले प्रतिबंधित आतंकी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के प्रमुख यासीन मलिक का नया हलफनामा सामने आया है।
अदालत में दाखिल यह दस्तावेज कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन इसकी भाषा और प्रस्तुति ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या मलिक अदालत में अपना बचाव कर रहा है या इतिहास में अपनी छवि बचाने की कोशिश?
सरला भट्ट हत्याकांड में मलिक ने अपनी भूमिका से इनकार किया है। साथ ही उसने कहा है कि वह अब मुकदमे की कार्यवाही को आगे चुनौती नहीं देगा और अदालत से अपने लिए मृत्युदंड की मांग की है। लेकिन उसी हलफनामे में उसने यह भी स्पष्ट किया है कि मुकदमा न लड़ने के उसके फैसले को अपराध स्वीकार करना नहीं माना जाए।
यानी आरोप स्वीकार नहीं, लेकिन मौत स्वीकार करने की पेशकश।यह विरोधाभास साधारण नहीं है। यही वह बिंदु है जहां एक कानूनी दस्तावेज राजनीतिक संदेश का रूप लेता दिखता है।
भावना की ढाल, सहानुभूति का रास्ता
हलफनामे में पत्नी, बेटी, मां, आस्था, मृत्यु, त्याग और पारिवारिक पीड़ा का विस्तार से उल्लेख है। परिवार के प्रति संवेदना होनी चाहिए। मलिक के राजनीतिक फैसलों या उसके खिलाफ लगे आरोपों की जिम्मेदारी उसकी पत्नी और बेटी पर डालना न न्यायसंगत है, न मानवीय।लेकिन सवाल यह है कि क्या निजी पीड़ा को सार्वजनिक राजनीतिक छवि की ढाल बनाया जा रहा है?
मौत की मांग अपने आप में ऐसा भावनात्मक दृश्य तैयार करती है जिसे समर्थक आसानी से ‘बलिदान’ और ‘शहादत’ के नरेटिव में बदल सकते हैं। फिर कहानी का केंद्र बदल जाता है—आरोप से व्यक्ति पर, पीड़ित से आरोपित पर और न्याय से कथित बलिदान पर।यही वह भावनात्मक राजनीति है जिससे सावधान रहने की जरूरत है।क्योंकि अदालत में भावनाएं नहीं, साक्ष्य निर्णायक होते हैं।
सरला भट्ट कहां हैं?
1990 में 27 वर्षीय कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट का अपहरण और हत्या उस दौर की भयावह स्मृति है, जब घाटी आतंक और लक्षित हिंसा की चपेट में थी। जून 2026 में राज्य जांच एजेंसी ने 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल कर यासीन मलिक समेत पांच जेकेएलएफ सदस्यों को आरोपी बनाया। मलिक आरोपों से इनकार करता है। इसलिए दोषी कौन है, इसका अंतिम फैसला अदालत ही करेगी।
लेकिन इस हलफनामे के बाद पैदा हुए सार्वजनिक विमर्श में एक सवाल अनिवार्य है—क्या आरोपित की कहानी इतनी बड़ी हो सकती है कि पीड़ित की कहानी ही दब जाए?नहीं।मलिक की पत्नी का दर्द वास्तविक है। उसकी बेटी की पीड़ा वास्तविक है।
लेकिन सरला भट्ट भी किसी की बेटी थीं, किसी परिवार की उम्मीद थीं। उनके परिवार ने भी वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा की। पीड़ित को इतिहास की हाशिये की पंक्ति बनाकर आरोपित को कथा का नायक नहीं बनाया जा सकता।
कश्मीर ने किसकी कीमत चुकाई?
यासीन मलिक का राजनीतिक जीवन उस दौर से जुड़ा है जब अलगाववादी राजनीति ने हिंसक रूप लिया और जेकेएलएफ बंदूक आधारित संघर्ष का प्रमुख चेहरा बना। बाद में मलिक ने बंदूक छोड़कर राजनीतिक रास्ते की बात की। यह उसके राजनीतिक जीवन का एक पक्ष है।लेकिन दूसरा पक्ष भी है—वह कश्मीर जिसने इस हिंसक राजनीति की कीमत चुकाई।
घर उजड़े,परिवार टूटे, कश्मीर में जगह जगह कब्रीस्तान बने,कश्मीरी पंडित विस्थापित हुए,व्यापार और पर्यटन प्रभावित हुए। शिक्षा बाधित हुई,बंद और हिंसा ने सामान्य जीवन को बंधक बनाया।और सबसे गहरी चोट पड़ी—कश्मीर के सामाजिक विश्वास और कश्मीरियत पर।
जिस अलगाववादी राजनीतिक संस्कृति के प्रमुख चेहरों में मलिक रहा, उसके परिणामों से उसकी राजनीतिक विरासत को अलग करना भी इतिहास के साथ बेईमानी होगी क्योंकिक किसी भी विचारधारा की असली कीमत नारों से नहीं, नतीजों से तय होती है।इसलिए बेशक उसके गुनाह अदालत तय करेगी,लेकिन इतिहास सवाल करेगा।
मलिक दोषी है या नहीं, अदालत तय करेगी
सरला भट्ट मामले में मलिक दोषी है या नहीं, अदालत तय करेगी। लेकिन उसका राजनीतिक अतीत सार्वजनिक विमर्श का विषय बना रहेगा। आतंकी फंडिंग मामले में 2022 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। यह भी उसके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा है।
इसलिए उसे केवल एक भावुक पति, पिता या मौत का सामना कर रहे कैदी के रूप में पेश करना उसके अतीत की आधी तस्वीर दिखाना होगा।
परिवार के लिए करुणा—हां। पीड़ितों के लिए न्याय—हां। आरोपि के अधिकार—हां। लेकिन हिंसक विचारधारा के लिए राजनीतिक छूट—नहीं।
कश्मीर को फिर ‘बलिदान’ का रोमांस नहीं चाहिए
मलिक की मृत्युदंड की मांग को अपराध स्वीकार करना नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि इसे समर्थकों ने ‘बलिदान’ के राजनीतिक आख्यान में बदल दिया, तो यह कश्मीर की नई पीढ़ी के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा।
आज का कश्मीरी युवा बंदूक नहीं, किताब, रोजगार, कारोबार, तकनीक, खेल और सुरक्षित भविष्य चाहता है। वह उस राजनीति से आगे बढ़ना चाहता है जिसने उसके माता-पिता की पीढ़ी को भय और अनिश्चितता दी।कश्मीर को अपना अतीत भूलना नहीं है। लेकिन उसे अतीत का बंधक भी नहीं बनना है। यासीन मलिक को न मिथक बनाया जाना चाहिए, न कानून से ऊपर।
इतिहास से निकला सबक चाहिए
समाज इतिहास देखे और उससे सबक ले। क्योंकि एक हलफनामा किसी व्यक्ति की छवि बचा सकता है, लेकिन कश्मीर का इतिहास नहीं बदल सकता। उस इतिहास में यासीन मलिक की कहानी है, लेकिन सिर्फ वही कहानी नहीं है।
उसमें सरला भट्ट की कहानी है। उन परिवारों की कहानी है जिन्होंने अपने प्रियजन खोए। उन कश्मीरी पंडितों की कहानी है जिन्होंने अपना घर छोड़ा। उन आम कश्मीरियों की कहानी है जिन्होंने दशकों तक हिंसा की कीमत चुकाई।इसलिए असली सवाल यह नहीं कि यासीन मलिक अपने लिए कौन-सी सजा मांग रहा है।कश्मीर को बलिदान की नई पटकथा नहीं, इतिहास से निकला सबक चाहिए।



