
Ganesha Story: भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था। वे हर मांगलिक कार्य और पूजा-पाठ में सभी देवताओं से सबसे पहले पूजे और आह्वान किए जाते हैं, क्योंकि वे देवों में ‘प्रथम पूज्य’ हैं। उनके अग्रपूज्य या प्रथम पूज्य बनने की कथा बहुत रोचक, शिक्षाप्रद और मोटिवेशनल है। इसके उन्हें सभी देवताओं के बीच ब्रह्मांड की रेस जीतनी पड़ी थी और उन्होंने बताया की जीवन का असली तीर्थ क्या है। आइए जानते हैं, यह पूरी कथा…
देवों में प्रथम पूजा का विवाद
एक बार देवलोक में इंद्र समेत सभी देवताओं में यह विवाद शुरू हो गया कि देवताओं में सबसे पहले पूजा किसकी होगी। अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्रमा सहित सभी देवताओं ने अपने अपने महत्व का बखान किया कि क्यों उनकी पूजा सबसे पहले होनी चाहिए। हर देवता स्वयं को श्रेष्ठ और प्रथम पूज्य होने का दावेदार बता रहे थे। बहुत विकट स्थिति थी।
ब्रह्मांड के 3 चक्कर
कहते जब विवाद का कोई हल नहीं निकला, तो वे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने ही ब्रह्मांड और संसार के नियम बनाए थे। उन्होंने देवताओं से कहा कि आप सभी देवता अपने वाहनों पर सवार होकर इस पूरे ब्रह्मांड का 3 चक्कर लगाएं। जो देव सबसे पहले यह काम पूरा कर लेंगे, उसे देवों में अग्रगण्य और प्रथम पूज्य का अधिकार प्राप्त होगा।
शुरू हुई देव प्रतियोगिता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्रथम पूज्य प्रतियोगिता की यह चुनौती प्राप्त होते ही सभी देवता आपने वाहनों और सवारियों पर ब्रह्मांड की दौड़ पर निकल पड़े। यह सृष्टि की पहली प्रतियोगिता थी। इंद्र अपने ऐरावत पर, वायुदेव अपने हिरण पर, कार्तिकेय अपने मोर और दूसरे देव अपनी-अपनी सवारियों पर भागे जा रहे थे।
गणेश जी ने लगाई बुद्धि
इधर गणेश जी के समक्ष भारी संकट उपस्थित हो गया। उनके पास मंदगामी छोटा मूषक वाहन था। दूसरे उनके शरीर का वजन अत्यधिक था। वे जानते थे, ब्रह्मांड की इस रेस में वे देवों पराजित नहीं कर पाएंगे। वे परमशास्त्र ज्ञानी थे। उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और विवेक का सहारा लिया।
माता-पिता की परिक्रमा
गणेश जी ने निवेदन कर अपने माता-पिता यानी माता पार्वती और पिता महादेव गणेश को आदरपूर्वक एक आसन पर बैठाया और वे अपने वाहन मूषकराज पर बैठ गए। और इसके बाद उन्होंने श्रद्धापूर्वक 3 चक्कर लगाकर पार्वती जी और शिव जी को नमन किया।
देवताओं ने की आपत्ति
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, जब सभी देवगण पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर वापस लौटे तो थके-हारे देवताओं को गणेश जी वहां पहले से उपस्थित मिले। ब्रह्मा जी हर बात जानते थे। उन्होंने गणेश को विजेता घोषित कर दिया। इसपर देवताओं ने काफी आपत्ति जताई, विशेषकर कार्तिकेय जी ने जिन्होंने ब्रह्मांड के 3 चक्कर सबसे पहले लगाए थे।
ब्रह्मा जी का न्याय
देवताओं पर आपत्ति पर ब्रह्मा जी ने शास्त्रों का प्रमाण देते हुए कहा कि जो संतान अपने माता-पिता सेवा, पूजा और परिक्रमा करते हैं, उसे पूरे ब्रह्मांड और पृथ्वी की परिक्रमा का फल स्वतः मिल जाता है। माता-पिता की सेवा और पूजा ही असली तीर्थ है। इस अभिभाषण और तर्क के आगे सभी देवताओं का सिर झुक गया। तभी से गणेश जी हिन्दू संस्कृति के देव समूह में ‘प्रथम पूज्य देव’ हैं।



