मां बनने को एक खूबसूरत एहसास माना जाता है लेकिन प्रेगनेंसी का पीरियड अपने साथ कई चुनौतियां भी लाता है. मां को मूड स्विंग्स होना, हेल्थ में उतारचढ़ाव ऐसी कई चीजें होती हैं जो एक महिला को अलगअलग तरह से प्रभावित करती हैं. इसमें कई अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं. किस अल्ट्रासाउंड में क्या पता चलता है चलिए आपको बताते हैं…

एक्सपर्ट ने क्या कहा डॉ. प्रज्ञा कंसल कहती हैं कि प्रेग्नेंसी में हर अल्ट्रासाउंड का एक अलग मकसद होता है. जैसेजैसे प्रेग्नेंसी आगे बढ़ती है, वैसेवैसे हम बेबी की अलग अलग चीजें चेक करते हैं.
प्रेगनेंसी का पहला अल्ट्रासाउंड शुरुआत में जो अर्ली प्रेग्नेंसी स्कैन होता है, उसमें सबसे पहले यह देखा जाता है कि प्रेग्नेंसी बच्चेदानी के अंदर सही जगह पर है या नहीं. साथ ही बेबी कितने हफ्तों का है, उसकी हार्टबीट आ रही है या नहीं और एक बेबी है या ट्विन्स, यह भी पता चलता है.
दूसरा अल्ट्रासाउंड फिर 11 से 14 हफ्ते के आसपास एनटी स्कैन किया जाता है. इसमें बेबी की गर्दन के पीछे जो थोड़ा सा फ्लूइड होता है, उसकी मोटाई देखी जाती है. अगर यह ज्यादा हो, तो कुछ जेनेटिक प्रॉब्लम्स का रिस्क हो सकता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बेबी को कोई प्रॉब्लम है. इसके लिए आगे और टेस्ट की जरूरत पड़ सकती है.
तीसरा अल्ट्रासाउंड इसके बाद 18 से 22 हफ्ते में अनोमली स्कैन होता है. इसमें बेबी की बॉडी को काफी डीटेल में देखा जाता है, जैसे ब्रेन, हार्ट, स्पाइन, किडनी, हाथ पैर और दूसरे ऑर्गन्स ठीक से बन रहे हैं या नहीं.
ब्लड सप्लाई चेक करना आगे चलकर ग्रोथ स्कैन में बेबी का वजन और ग्रोथ देखी जाती है, जबकि डॉप्लर से ब्लड फ्लो चेक किया जाता है, ताकि पता चले कि बेबी को प्लेसेंटा के जरिए सही ब्लड सप्लाई मिल रही है या नहीं. इसलिए हर स्कैन सिर्फ बेबी को देखने के लिए नहीं होता. हर स्टेज पर इसका एक अलग रोल होता है और इससे हमें प्रेग्नेंसी सही तरह से आगे बढ़ रही है या नहीं, यह समझने में मदद मिलती है.


