
लखनऊ, अमृत विचार। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने गुरुवार को ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के पूर्व कुलपति प्रो. महरुख मिर्जा की बर्खास्तगी रद्द करने वाले एकल पीठ के फैसले पर स्थगन आदेश पारित किया है। एकल पीठ ने पांच अगस्त 2026 को मिर्जा की बर्खास्तगी को निरस्त कर दिया था।न्यायमूर्ति राजन रॉय व न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय की ओर से दाखिल विशेष अपील पर यह आदेश पारित किया है। विशेष अपील में एकल पीठ के पांच अगस्त के फैसले को चुनौती दी गई थी।
खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ ने मिर्जा के खिलाफ लगाए गए आरोपों के गुणदोष पर निष्कर्ष दर्ज किए। जबकि विभागीय कार्रवाई के मामले में न्यायिक समीक्षा की सीमाओं को ध्यान में रखा जाना आवश्यक था। पीठ ने प्रथम दृष्टया तीन आरोपों एनओसी में कथित जालसाजी, कथित अवैध नियुक्तियां और बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज न करने से संबंधित निष्कर्षों पर असहमति जतायी है।
न्यायालय ने कहा कि आरोपों की प्रकृति को देखते हुए और प्रथम दृष्टया तीन आरोपों से संबंधित निष्कर्ष पर असहमत होने के कारण हम एकल पीठ के प्रश्नगत फैसले पर रोक लगाते हैं मामले को दो माह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है विश्वविद्यालय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एलपी मिश्रा ने दलील दी कि एकल पीठ का फैसला सही नहीं है।
13 नियुक्तियों से भी जुड़ा है विवाद
उन्होंने कहा कि विवाद मिर्जा के कुलपति कार्यकाल के दौरान कथित रूप से की गई 13 नियुक्तियों से भी जुड़ा था। इनमें से सात नियुक्तियों को विश्वविद्यालय की कार्य परिषद अथवा कुलाधिपति द्वारा बाद में मान्यता दे दी गई थी, जबकि शेष छह कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। इन कर्मचारियों की ओर से दाखिल याचिकाएं हाईकोर्ट में लंबित हैं। कहा कि एकल पीठ ने बिना सारे तथ्यों पर गौर किए ही पूर्व कुलपति महरुख मिर्जा की बर्खास्तगी रद्द कर दी।



