
संवाददाता/अल्मोड़ा, अमृत विचार : अदालत ने तो सुरेंद्र कोली को निठारी कांड के सभी मामलों से बरी कर दिया था, लेकिन समाज और गांव के लोगों ने उसे कभी बरी नहीं किया। यही अकेलेपन की सजा उसकी मौत का कारण बन गई। 19 साल बाद जेल से बाहर आया तो दरवाजे पर लेने वाला कोई नहीं था और अंत में हरिद्वार की एक चाय की दुकान में अकेले ही उसने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।
सुरेंद्र कोली का पैतृक घर अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे ब्लॉक मंगरूखाल में है। रोजीरोटी के लिए वर्ष 2000 में सुरेंद्र कोली दिल्ली गया था। वहां से नोएडा में कारोबारी मोनिंदर सिंह पंधेर की कोठी में घरेलू नौकर बन गया। यहीं से उसकी जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि वह देश के सबसे चर्चित हत्याकांड का मुख्य आरोपी बन गया।
जेल से बाहर आने के बाद सुरेंद्र ने सोचा था कि अब नई जिंदगी शुरू करेगा, लेकिन बाहर की दुनिया और भी कठिन थी। सलाखों के पीछे रहने के बाद अदालत ने तो उसे आजाद कर दिया था, लेकिन समाज की अदालत और ग्रामीणों के बीच वह फिर भी दोषी ही रहा। उसी सामाजिक बहिष्कार और अपनों की बेरुखी ने आखिरकार अल्मोड़ा के सुरेंद्र कोली को मौत की नींद सुला दिया।
बिखर चुका था परिवार
निठारी कांड के बाद उसका परिवार पूरी तरह बिखर गया था। उसकी पत्नी शांति देवी दोनों बच्चों सिमरन और बेटे को लेकर 10 साल पहले गांव छोड़कर हरियाणा चली गई थी और गुमनामी की जिंदगी जी रही है। बेटे के इंतजार में उसकी मां कुंती देवी ने तीन साल पहले ही दम तोड़ दिया था। भाइयों ने भी गांव से नाता तोड़ लिया था। वहीं, गांव में उसका घर पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है।
रिहाई पर लेने नहीं आया कोई
सुप्रीम कोर्ट ने निठारी कांड के आखिरी मामले में भी सुरेंद्र कोली को बरी कर रिहाई का आदेश दिया तो जेल के बाहर उनको लेने वाला कोई नहीं था। वह अकेला ही जेल से बाहर निकला। सामाजिक बहिष्कार के चलते व न गांव लौट सका, न परिवार के पास जा सका।
पत्नी ने हरियाणा में बसाई नई दुनिया
निठारी कांड में सुरेंद्र को फांसी की सजा सुनाई गई तो पत्नी शांति अपनी 13 साल की बेटी और 8 साल के बेटे को लेकर दिल्ली चली गई। इसके बाद बाद सुरेंद्र की पत्नी शांति कभी गांव नहीं लौटी। उसने हरियाणा के गुरुग्राम में अपनी पहचान छुपाकर नौकरी की और बच्चों को स्कूल में दाखिल कराया। निठारी के साये से दूर तीनों ने वहीं अपनी दुनिया बसा ली।



