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​छुक-छुक से सन्नाटे तक… बहेड़ी की केसर मिल हुई पराई, 90 साल पुराने रिश्ते का हुआ अंत

​छुक-छुक से सन्नाटे तक… बहेड़ी की केसर मिल हुई पराई, 90 साल पुराने रिश्ते का हुआ अंत

केसर मिल की बिक्री के साथ ही एक युग का अंत हो गया। केसर के नाम से जानी जाने वाली चीनी मिल बहेड़ी के लोगों में एक तरह से रचबस गई थी। केसर की चीनी दूरदूर तक मशहूर हुआ करती थी और उसी के साथ बहेड़ी का नाम भी देश भर में जाना जाता रहा। केसर से बहेड़ी के रिश्ते की डोर आखिरकार टूट गई और अब इस पर मालिकाना हक अवध फूड्स एंड मल्टी वैयर हाउस लिमिटेड का हो गया। केसर बिकने की खबर ने उन लोगों में मायूसी देखी जा रही है, जिन्होंने बचपन से केसर को देखते और बरतते उसके नाम के साथ जिंदगी गुजारी।

ब्रिटिश शासन में सन् 19321933 में बहेड़ी में केसर शुगर मिल की स्थापना हुई थी। गुजरात से मुंबई पहुंचकर व्यापार कर रहे सेठ किलाचंददेवचंद ग्रुप ने बहेड़ी में केसर शुगर वर्क्स के नाम से यहां चीनी मिल लगाई थी। गन्ना पेराई के लिए उस वक़्त हॉलैंड की स्टॉक कंपनी के एंटीक भाप इंजन को लगाया गया था और उस वक्त इसकी गन्ना पेराई की क्षमता 800 टन प्रतिदिन थी, जो अब बढ़कर 7200 टन हो गई है। सन् 1991 में केसर शुगर वर्क्स का नाम केसर इंटरप्राइजेज हो गया था। केसर इंटरप्राइजेज के सीएमडी की हैसियत से सेठ हर्ष आर किलाचंद इस मिल को संभाल रहे थे। इस दौरान यहां 45 केएल क्षमता की डिस्टलरी और 44 मेगा वाट क्षमता का पावर प्लांट भी लगा, जिसमें 190 टन क्षमता का बॉयलर है। डिस्टलरी पिछले काफी समय से बंद पड़ी है। केसर ने इस दौरान 1 लाख चीनी की बोरी रखने की क्षमता का गोदाम और एक आलीशान एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक बनाया।

रॉयल फैमिली थी किलाचंद का परिवार, अब ऐसा मिलना मुश्किल 

किलाचंद परिवार के सेठ जब यहां आए, तो उन्होंने यहां के लोगों की भलाई के खूब काम किए, जिसके चलते उनकी यहां बड़ी इज्जत हुआ करती थी। सन् 1934 में बहेड़ी नोटिफाइड एरिया बना और केसर ने उसके लिए हाल बनाकर दिया, जो वर्तमान में नगर पालिका का कार्यालय है। उस वक्त के यूपी के गवर्नर एचई सर हेयरी हैग ने 1936 में इसका उद्घाटन किया था। केसर स्कूल और सरकारी अस्पताल बनवाए। गन्ना उत्पादक महाविद्यालय बनाने में सहयोग किया। गन्ना समिति के लिए जगह दी और किसान भवन का निर्माण भी कराया। बहेड़ी के लोगों ने भी सेठ किलाचंद को फैक्ट्री लगाने में पूरी मदद की। फैक्ट्री लगाने से लेकर गन्ना पैदा करने के लिए जमीन उनको लीज पर दे दीं। मिल के अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रति भी किलाचंद परिवार हमेशा बहुत नरम रहा और उनको काम करने की पूरी छूट दी गई। केसर मिल बिकने के बाद अब यह चर्चा आम है कि किलाचंद परिवार की तरह मालिक अब मिलने वाला नहीं।

बिहार और यूपी के लोगों को भी मिला रोजगार 

केसर मिल, जिस जमाने में यहां लगी, उस वक्त यहां के लोगों के लिए अनोखी चीज थी। बहेड़ी क्षेत्र की यह रौनक बनी और लोगों की तरक्की का जरिया भी। मिल से लोगों को रोजगार मिला, लेकिन स्किल लोगों के न होने के चलते बाहर के लोग यहां नौकरी करने आए। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों की रोजगार पाने वालों में तादाद ज्यादा थी। सीजनल कर्मचारियों में ज्यादातर पूरब के ही हैं। यहां के व्यापार को पंख लगाने में भी केसर की बड़ी भूमिका रही। ट्रांसपोर्ट का काम मिल की बदौलत बढ़ा।

इंजनिया ढोती थी चीनी, चलती तो देखने जमा हो जाते बच्चे 

केसर के पास अपना एक भाप इंजन है, जिसे उस जमाने में लोग इंजनिया कहते थे। मिल के गोदाम से रेलवे स्टेशन तक रेल पटरी बिछी हुई थी, जिसके ज़रिए रेलवे के वैगन में चीनी रेलवे स्टेशन तक पहुंचाई जाती थी। यह इंजन वैगन स्टेशन से मिल के गोदाम और फिर स्टेशन तक लाने ले जाने का काम करता था। जब यह इंजन छुकछुक करता स्टेशन जाता था, तो रास्ते में बच्चे इसको देखने के लिए जमा हो जाते थे। यह इंजन आज भी केसर के मंदिर परिसर में खड़ा है।

आर्थिक संकट में फंसना रही केसर के जाने की वजह 

केसर मिल का मालिकाना हक खत्म होने के पीछे वजह मिल का आर्थिक संकट में फंसना रहा। केसर मिल की मुंडिया और खुरपिया की करीब 11 हजार बीघा जमीन का सीलिंग में निकलना और फिर मिल का कई बरस तक घाटे में जाना केसर के लिए न उबर पाने वाला साबित हुआ। गन्ना भुगतान न कर पाने के चलते गन्ना सेंटरो का कटना भी इसके बैठने में अहम रहा। डिस्टलरी का रेनूएशन और फिर इसका न चल पाना भी आर्थिक संकट की वजह बना।

अवध फूड्स के सामने भी हैं कई चुनौतियां 

केसर को खरीदने वाले अवध फूड्स एंड मल्टी वैयर हाउस को भी कई तरह की चुनौतियों का सामना करना होगा। सबसे पहली चुनौती तो गन्ना मूल्य का भुगतान कर सरकार से मिल के वह गन्ना क्रय केंद्र वापस लेने की है, जो शासन ने काटकर दूसरी मिलों को दे दिए हैं। ऐसा न होने पर मिल के सामने गन्ने का बड़ा संकट रहेगा। दूसरा डिस्टलरी की क्षमता को कम से कम 150 के एल करने और इसे ग्रेन बेस करना होगा। तीसरा काम शुगर मिल की क्षमता को 10 हज़ार टीडीसी करना होगा, ताकि 1 करोड़ कुंटल से ज़्यादा गन्ना पेराई हो। अब देखना होगा कि नया ग्रुप किस तरह काम आगे बढ़ाता है।

एक बेहद तकलीफदेय मोड़, लेकिन था जरूरी: शरत 

करीब 35 बरस पहले केसर में एक ट्रेनी की हैसियत से नौकरी शुरू कर केसर के सर्वोच्च पद सीईओ के पद पर पहुंचे शरद मिश्रा के लिए केसर का बिकना एक सदमे की तरह है। पूरी नौकरी जबान से केसरकेसर अदा करते रहे शरत, केसर की बिक्री की प्रक्रिया में अपना रोल निभा रहे हैं। वह कहते हैं कि यह मुकाम बेहद तकलीफदेय तो है, लेकिन किसानों, व्यापारियों, क्षेत्र के लोगों और मिल के कर्मचारियों के हित में इस फैसले को लेना मजबूरी था और जो सेठ जी ने लिया भी। सीईओ शरद मिश्रा का कहना है कि मिल आर्थिक संकट में आ गई थी। हमारे पास किसानों को पैसा देने के लिए मिल की बिक्री के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। हमारा प्रयास था कि मिल चलती रहे और खुशी इस बात की है कि खरीदार मिल चलाएंगे। नया सीजन शुरू होने से पहले किसानों का भुगतान करने की शर्त पर ही यह सौदा हुआ है। मिल की बिक्री की प्रक्रियाएं जल्द पूरी कर ली जाएंगी।

देहली के सर्राफ दे देते थे केसर की गन्ना पर्ची पर पैसा : प्रमोद अग्रवाल 

केसर शुगर मिल हमारा प्राइड रही और लाइफ लाइन भी। यह केसर के नाम की पहचान और उस पर भरोसा ही था कि देहली के सर्राफ केसर की गन्ना पर्ची को गिरवी रखकर यहां के लोगों को पैसा दे दिया करते थे। आज किसी भी मिल की पर्ची पर कोई इस तरह का भरोसा नहीं जता सकता। मशहूर सर्राफा व्यापारी और फार्मर प्रमोद अग्रवाल कहते हैं कि केसर को 1960 से हमने देखा। इसका नाम दूरदूर तक था। देहली तक के केसर की गन्ना पर्ची गिरवी रख इस भरोसे पर पैसा देते थे कि केसर का सेठ ईमानदार है। फैक्ट्री के सेठ रॉयल हुआ करते थे। न जाने इसके क्यों बुरे दिन आ गए,जो मिल बिकी। केसर के बिकने की खबर निश्चित तौर पर सदमा पहुंचाने वाली है। जो भी मिल खरीद रहा है, वह किसानों की बेहतरी के लिए काम करे। किसान खुशहाल होगा, तो सब खुशहाल होंगे।

  • शुऐब, बहेड़ी

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