
‘हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद…’परदेस में रहकर अपने देश की चिंता, कालिदास के ‘मेघदूत’ की तरह संदेश पहुंचाने की कल्पना और जीवन में समानता के आदर्शों को जगह देना, राही मासूम रजा की रचनात्मक दुनिया की पहचान थी। उनकी कलम में भारत केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि साझा संस्कृति, रिश्तों और स्मृतियों से बना एक जीवंत संसार था। संस्कृत से उर्दू और महाकाव्य से गजल तक उनकी रचनात्मक यात्रा भारतीयता के उस व्यापक रूप को सामने लाती है, जिसमें धर्म, भाषा और मजहब की सीमाएं पीछे छूट जाती हैं।
राही मासूम रजा का जन्म 1 सितंबर 1927 को गाजीपुर के गंगौली गांव में एक जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता बशीर हसन आब्दी गाजीपुर के प्रतिष्ठित वकील थे। बचपन से ही रजा का स्वभाव स्वतंत्र और बेबाक था। वह अपनी राह खुद चुनने में विश्वास रखते थे। कम उम्र में ही उनका झुकाव साम्यवादी विचारधारा की ओर हुआ और वे कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ गए। उनकी औपचारिक शिक्षा भी इस दौर में प्रभावित हुई, लेकिन किताबों और विचारों से उनका रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ा।
‘अगर कल्लू काका नहीं होते तो’
राही मासूम रजा के जीवन में बचपन की बीमारी भी एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आई। महज 11 वर्ष की उम्र में उन्हें टीबी हो गई। लंबे समय तक आराम के दौरान उन्होंने घर में मौजूद तमाम किताबें पढ़ डालीं। इसी समय उनका साथ देने और उनका मन बहलाने के लिए कल्लू काका को रखा गया। रजा बाद में अक्सर कहते थे कि अगर कल्लू काका नहीं होते, तो शायद वे कभी कहानीकार नहीं बन पाते। कल्लू काका उन्हें कहानियां सुनाते थे और इन कहानियों ने बाल मन में कल्पना की ऐसी दुनिया रची, जिसने आगे चलकर उनके साहित्य को गहराई दी। औपचारिक पढ़ाई भले ही शुरुआती दौर में बाधित हुई, लेकिन रजा ने बाद में अपनी शिक्षा आगे बढ़ाई। उन्होंने जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से उर्दू में अदीब कामिल की पढ़ाई की और फिर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में एमए किया। इस दौरान उनकी साहित्यिक प्रतिभा लगातार निखरती गई। युवा अवस्था तक पहुंचतेपहुंचते वे एक चर्चित शायर के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे।
साहित्य से सिनेमा तक
राही मासूम रजा की रचनात्मकता किसी एक विधा तक सीमित नहीं रही। उपन्यास, कविता, शायरी, गजल, फिल्मी पटकथा और संवादउन्होंने लगभग हर क्षेत्र में अपनी अलग छाप छोड़ी। उनकी भाषा में साहित्यिक गहराई के साथ बोलचाल की सहजता थी। यही वजह थी कि उनकी रचनाएं आम पाठक और दर्शक दोनों से सीधे जुड़ती थीं।
मुंबई पहुंचने के बाद उन्होंने फिल्म जगत के लिए बड़े पैमाने पर लेखन किया। उन्होंने सौ से अधिक फिल्मों की पटकथा और संवाद लिखे। ‘गोलमाल’, ‘मिली’ और ‘आलाप’ जैसी फिल्मों से जुड़े उनके संवादों ने उनकी लेखकीय क्षमता को व्यापक पहचान दिलाई। संवाद लेखन के लिए उन्हें तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’, ‘तवायफ’ और ‘लम्हे’ के लिए उन्हें यह सम्मान मिला।
फिल्मी दुनिया को करीब से देखने के अनुभवों को उन्होंने अपने उपन्यास ‘सीन 75’ में भी अभिव्यक्त किया। इसमें फिल्म उद्योग में लेखकों की स्थिति और उनके संघर्षों को रेखांकित किया गया है। साहित्य से सिनेमा तक रजा की यात्रा यह बताती है कि उनकी कलम गंभीर विचारों को भी ऐसी भाषा दे सकती थी, जो सीधे लोगों के मन तक पहुंचे।
‘महाभारत’ से जुड़ा ऐतिहासिक अध्याय
राही मासूम रजा के लेखन जीवन का सबसे चर्चित अध्याय बीआर चोपड़ा के टेलीविजन धारावाहिक ‘महाभारत’ के संवाद लेखन से जुड़ा है। उस दौर में धारावाहिक ने देशभर में अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की। रविवार को इसके प्रसारण के समय शहरों से लेकर गांवों तक लोग टेलीविजन के सामने जुट जाते थे। इसकी लोकप्रियता में संवादों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जटिल कथानक और पात्रों को सहज भाषा में प्रस्तुत करने का काम रजा की कलम ने किया।
हालांकि उनके ‘महाभारत’ से जुड़ने पर उस समय विरोध भी हुआ। कुछ लोगों ने यह सवाल उठाया कि एक मुसलमान लेखक हिंदू महाकाव्य पर आधारित धारावाहिक के संवाद कैसे लिख सकता है। विरोध में बीआर चोपड़ा को कई पत्र मिले। उन पत्रों में इसी तरह की आपत्तियां दर्ज थीं।
चोपड़ा ने ये पत्र राही मासूम रजा तक पहुंचाए। इस पर रजा ने अपने मित्र से कहा कि वे ‘महाभारत’ लिखेंगे। उनका तर्क किसी धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि अपनी भारतीय पहचान से जुड़ा था। उन्होंने स्वयं को गंगा की संतान और भारतीय संस्कृति का हिस्सा माना। उनके लिए ‘महाभारत’ किसी एक समुदाय की सीमा में बंधा ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की साझा सांस्कृतिक विरासत था।
रजा की कविता की पंक्ति‘मेरे रगरग में गंगा का पानी दौड़ रहा है’उनकी इसी सांस्कृतिक चेतना को व्यक्त करती है। गंगा उनके लिए केवल एक नदी नहीं थी, बल्कि भारत की साझा स्मृति और सभ्यता का प्रतीक थी।
गंगाजमुनी तहजीब के रचनाकार
राही मासूम रजा की रचनाओं में गांव, गंगा, मिट्टी, रिश्ते और सांस्कृतिक विविधता बारबार लौटते हैं। वे उस भारत के लेखक थे जहां अलगअलग भाषाएं, परंपराएं और धार्मिक विश्वास साथसाथ जीवन का हिस्सा बनते हैं। विभाजन और सांप्रदायिक तनाव उन्हें भीतर तक विचलित करते थे। उनकी रचनाओं में बिखरते समाज की पीड़ा और साझा संस्कृति को बचाए रखने की आकांक्षा दोनों दिखाई देती हैं।
इसीलिए राही मासूम रजा को केवल उर्दू के लेखक या हिंदी के लेखक के रूप में सीमित करना उनके व्यापक रचनात्मक व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। वे भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करने वाले रचनाकार थे। उनकी कलम में गंगौली की मिट्टी भी थी और महानगर की बेचैनी भी, शायरी की नजाकत भी थी और सामाजिक सवालों की तल्खी भी। राही मासूम रजा की सबसे बड़ी पहचान शायद यही है कि उन्होंने अपनी रचनाओं में भारत को किसी एक रंग में नहीं देखा। उनके लिए भारत अनेक रंगों, आवाजों और संस्कृतियों से मिलकर बनी वह तस्वीर था, जिसमें हर रंग की अपनी जगह थी। उनकी लेखनी आज भी उस साझा भारतीयता की याद दिलाती है, जिसकी धारा गंगा की तरह निरंतर बहती रही है।
टोपी शुक्ला : सांप्रदायिकता के बीच अकेले पड़ते मनुष्य की कहानी
राही मासूम रजा आब्दी वल्द सय्यद बशीर हुसैन आब्दी अपने युग के सामाजिक हृासविकास के साक्षी रहे हैं। उनके साहित्यसृजन का आरंभ काव्य से हुआ, किंतु असंख्य गजलों, नज्मों और मसनवियों के बाद भी शायद कुछ कहने की छटपटाहट उन्हें कविता के सीमित संसार से निकालकर उपन्यास की जमीन पर ले आई। उनका पहला उपन्यास ‘आधा गांव’ कालजयी साबित हुआ और राही का नाम उच्चकोटि के उपन्यासकारों में लिया जाने लगा। इसके बाद 1969 में प्रकाशित ‘टोपी शुक्ला’ ने उन्हें सांप्रदायिकता और सामाजिक विडंबनाओं को बेबाकी से चित्रित करने वाले लेखक के रूप में स्थापित किया। ‘टोपी शुक्ला’ हिंदूमुस्लिम संबंधों की जटिलताओं और सांप्रदायिक मानसिकता के प्रभावों को सामने लाने वाला उपन्यास है। राही ने इसमें किसी एक समुदाय को कठघरे में खड़ा करने के बजाय उन परिस्थितियों को उघाड़ा है, जिनमें इंसान की पहचान उसके मनुष्य होने से पहले धर्म के आधार पर तय होने लगती है। उपन्यास के पात्र इसी वातावरण में अपने अस्तित्व, प्रेम, दोस्ती और सम्मान के लिए संघर्ष करते हैं।
सांप्रदायिकता के बीच पिसता टोपी
अट्ठारह अध्यायों में विभाजित ‘टोपी शुक्ला’ उपन्यास के प्रमुख पात्र बलभद्र नारायण शुक्ला, जिन्हें टोपी शुक्ला कहा जाता है, इफ्फन और इफ्फन की पत्नी सकीना हैं। टोपी और इफ्फन बचपन से गहरे मित्र हैं, लेकिन दोनों की जिंदगी धार्मिक पहचान से जुड़ी सामाजिक धारणाओं से लगातार प्रभावित होती रहती है। टोपी का जीवन बचपन से ही उपेक्षा और अकेलेपन से घिरा है। परिवार में बड़े भाई मुन्नी बाबू को मिलने वाला स्नेह उसे नहीं मिलता। उसके रूपरंग को लेकर भी उसका मजाक उड़ाया जाता है। घर में उसे सिखाया जाता है कि मुसलमान बुरे होते हैं, फिर भी उसका सबसे गहरा दोस्त इफ्फन एक मुसलमान है। यही विरोधाभास टोपी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विडंबना बन जाता है।
वह कहता है कि घर में उसकी थाली अलग रखी जाती है और उसे ‘मलेच्छ’ कहा जाता है। यहां तक कि मां के स्नेह में भी धार्मिक शुद्धता की धारणा आड़े आती है। इस तरह टोपी के भीतर बचपन से ही एक कुंठा और अकेलापन जन्म लेता है।
दोस्ती के सामने धर्म की दीवार
टोपी और इफ्फन की दोस्ती उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष है। दोनों अलग धार्मिक पृष्ठभूमि से होने के बावजूद एकदूसरे के करीब हैं। इफ्फन के घर टोपी का आनाजाना है और उसकी पत्नी सकीना से भी उसकी बेतकल्लुफी है। सकीना कभी उसे पैसे देती है, कभी उसकी बेरोजगारी पर व्यंग्य करती है, लेकिन दोनों के बीच एक आत्मीय रिश्ता बना रहता है। टोपी मजाक में सकीना से राखी बांधने की इच्छा जताता है, लेकिन सकीना के जीवन में दंगों और हिंसा की स्मृतियां इतनी गहरी हैं कि वह इसके लिए तैयार नहीं हो पाती। उसके भाई और पिता सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए थे और जिस महेश को वह राखी बांधती थी, वह भी राखी की लाज बचाते हुए मारा गया था। इसलिए उसके भीतर हिंदुओं के प्रति गहरा आक्रोश है। यहीं राही दो मनुष्यों की निजी संवेदनाओं और समाज में मौजूद सामूहिक पूर्वाग्रहों का टकराव दिखाते हैं। दोस्ती, आत्मीयता और विश्वास के बावजूद धर्म की दीवार दोनों के जीवन को प्रभावित करती रहती है।
पहचान का संकट और बेरोजगारी
टोपी का सबसे बड़ा संकट उसकी धार्मिक पहचान है। वह न तो अपने परिवार की कट्टर धारणाओं को स्वीकार कर पाता है और न ही मुसलमानों के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रहों को। अलीगढ़ के हिन्दू कॉलेज में उसे इसलिए नौकरी नहीं मिलती कि वह पुराणपंथी विचारों का विरोधी है और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का छात्र है। दूसरी ओर, मुस्लिम कॉलेज में आवेदन की बात आने पर वह अपने नाम की ओर संकेत करता है ‘मेरा नाम बलभद्र नारायण शुक्ला है।’ यानी उसकी समस्या केवल नौकरी की नहीं, पहचान की भी है। वह धर्म की सीमाओं में समा नहीं पाता। राही इसी माध्यम से यह प्रश्न उठाते हैं कि ऐसे व्यक्ति के लिए समाज में जगह कहां है, जो मनुष्य को धर्म से पहले मनुष्य मानना चाहता है। इफ्फन भी सांप्रदायिक वातावरण से परेशान है। वह मुस्लिम राजपूत डिग्री कॉलेज में अध्यापक बनता है, लेकिन वहां के वातावरण से क्षुब्ध होकर नौकरी छोड़ देता है। बाद में मुस्लिम विश्वविद्यालय में नियुक्त होता है।
दंगों की स्मृतियां और नफरत
विभाजन के बाद हुए दंगे उपन्यास के पात्रों के जीवन पर गहरी छाप छोड़ते हैं। इफ्फन बचपन में अपने पिता से पूछता है कि क्या हिंदू बहुत खराब होते हैं और क्या सिख भी बुरे होते हैं। राही इस प्रसंग के माध्यम से बताते हैं कि दूसरी ओर पाकिस्तान में हिंदू और सिख बच्चे भी अपने परिवारों से मुसलमानों के बारे में ऐसे ही सवाल पूछ रहे होंगे। राही लिखते हैं कि इफ्फन हिंदुओं से डरता था और इसलिए उनसे नफरत करता था, जबकि टोपी को भारत की प्राचीन संस्कृति से प्रेम था और इसलिए वह मुसलमानों से नफरत करने लगा था, लेकिन पुरानी दोस्ती जब इस नफरत की दीवार के ऊपर से झांकती है, तो दोनों उदास हो जाते हैं। यह उपन्यास की सबसे मार्मिक स्थितियों में से एक है।
राजनीति और समाज का बढ़ता विभाजन
टोपी का परिवार भी राजनीति में अलगअलग दिशाओं में बंट जाता है। उसका बड़ा भाई मुन्नी बाबू जनसंघ के टिकट पर और छोटा भाई भैरव कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ता है। टोपी इस राजनीतिक वातावरण से अलग अपना रास्ता तलाशता है और कम्युनिस्ट उम्मीदवार कल्लन का समर्थन करने बनारस पहुंचता है। ट्रेन में शेरवानी पहनने के कारण उसे मुसलमान समझ लिया जाता है और हिंदूमुस्लिम तथा पाकिस्तान के सवाल पर उसका विवाद हो जाता है। टोपी कट्टरता पर सवाल उठाते हुए कहता है कि यदि मुसलमानों को लगातार पराया समझा जाएगा, तो उन्हें भारतविरोधी राजनीति की ओर कौन धकेल रहा है। उसके लिए धर्म से ऊपर मनुष्य और देश की साझी संस्कृति है।
प्रेम, अफवाह और अकेलापन
टोपी के जीवन में प्रेम भी आता है। वह सलीमा नाम की लड़की से मन ही मन प्रेम करता है, लेकिन अलीगढ़ पहुंचने पर उसे पता चलता है कि उसकी शादी हो चुकी है। यह आघात उसे भीतर से तोड़ देता है। दूसरी ओर, सकीना को लेकर उसके संबंधों की अफवाहें भी उसके जीवन को प्रभावित करती हैं। एक समय टोपी के स्थान पर पंडित रामविलास बेखटक की नियुक्ति हो जाती है। नौकरी, प्रेम और सामाजिक स्वीकृति तीनों मोर्चों पर लगातार असफलताएं उसे और अधिक अकेला करती जाती हैं। इफ्फन और सकीना के बीच भी परिस्थितियां बिगड़ती हैं। अंततः नौकरी से इस्तीफा देकर परिवार के साथ जम्मू चला जाता है। टोपी अकेला रह जाता है।
टोपी की मृत्यु : सभ्यता की हार
अंततः टोपी अपने जीवन के पुराने घावों को याद करता है। बचपन की उपेक्षा, परिवार से दूरी, बेरोजगारी, प्रेम में असफलता, सामाजिक ताने और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह सब कुछ उसकी चेतना में एक साथ लौट आता है। उसे इफ्फन, सकीना और शबनम की स्मृतियां घेर लेती हैं। वह अलीगढ़ छोड़ने का निर्णय करता है, लेकिन अगली सुबह वह मृत पाया जाता है। विडंबना यह है कि उसके सिरहाने दो पत्र मिलते हैं। एक में इफ्फन द्वारा उसके लिए नौकरी की व्यवस्था किए जाने की सूचना होती है और दूसरे में बहराइच के एक कॉलेज में उसकी नियुक्ति का पत्र। अर्थात जिस समय उसके सामने जीवन की एक नई राह खुल चुकी थी, वह उससे पहले ही जीवन समाप्त कर चुका था। राही के लिए टोपी की आत्महत्या कोई व्यक्तिगत घटना मात्र नहीं है। वे इसे सभ्यता की हार मानते हैं। टोपी जैसे व्यक्ति को समाज ने इतना अकेला कर दिया कि अवसर सामने आने के बावजूद वह उसे देख नहीं पाया।
डॉ. समराना फैयाज, शिक्षिका बरेली
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