पिछले लगभग नौ महीनों में, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस पर लाखों रुपये का जुर्माना लगाया है. इस दौरान कानूनी और प्रक्रिया से जुड़ी कई कमियां सामने आईं. गिरफ्तारी की वजह बताने, कोर्ट के आदेशों को न मानकर गिरफ्तारी करने, हिरासत की अवधि को लेकर विवाद और CCTV फुटेज न होने पर स्पष्टीकरण मांगने जैसे मामले सामने आए. इस रिपोर्ट में हम आपको उन खास मामलों के बारे में बताएंगे जिनमें हाई कोर्ट ने पुलिस के खिलाफ सख्त कार्रवाई की.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कमलेश कुमार को 5 दिन तक गैरकानूनी तरीके से पुलिस हिरासत में रखने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. कोर्ट ने माना कि पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक कमलेश को 15 अगस्त से 19 अगस्त 2026 तक हिरासत में रखा गया, जबकि उनकी गिरफ्तारी 19 अगस्त को दिखाई गई थी.
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा कि पुलिस की इस गलती की वजह से कमलेश 5 दिन तक बिना जरूरी कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में रहे. हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि कमलेश की कथित बांग्लादेशी नागरिकता के आरोपों पर वह इस स्तर पर कोई फैसला नहीं दे रहा है. कोर्ट ने सिर्फ 15 अगस्त से उनकी हिरासत लीगल थी या नहीं, इस पर विचार किया.
दरअसल, कमलेश कुमार का मामला इस साल का अकेला उदाहरण नहीं है. जनवरी से सितंबर 2026 के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने ऐसे कई मामले आए, जिनमें गिरफ्तारी, हिरासत, पुलिस कार्रवाई, संपत्ति जब्त करने और प्रशासनिक कार्रवाई में नियमों के पालन को लेकर सवाल उठे.
सुनील कांडू की गिरफ्तारी पर उठे सवाल
सुनील कांडू: 1 लाख रुपये मुआवजा फरवरी में हाईकोर्ट ने 2017 में हुई सुनील कांडू की गिरफ्तारी से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को 1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. कोर्ट ने गिरफ्तारी के लिए पुलिस के पास मौजूद जानकारी की पर्याप्तता और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए.
रिहाई में देरी पर पुलिस को फटकार
सचिन आर्य: रिहाई में करीब 20 घंटे की देरी मार्च में सचिन आर्य के मामले में कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के पालन पर सवाल उठाया. कोर्ट के रिहाई आदेश के बाद भी उनकी रिहाई में करीब 20 घंटे की देरी हुई. हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर टिप्पणी करते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए.
हाई कोर्ट के फैसले पर एससी की रोक
मनोज कुमार: 10 लाख रुपये, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक 7 मई के आदेश में हाईकोर्ट ने मनोज कुमार को 3 महीने से ज्यादा समय तक गैरकानूनी हिरासत में रखने और गिरफ्तारी के लिखित कारण नहीं बताए जाने के मामले में 10 लाख रुपये की exemplary costs देने का आदेश दिया. हालांकि, जून में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर हाईकोर्ट के 10 लाख रुपये के भुगतान वाले आदेश पर रोक लगा दी. इसलिए इस रकम को फिलहाल वास्तव में दिए गए मुआवजे के तौर पर नहीं गिना जाना चाहिए.
5 लाख रुपये मुआवजा देने के निर्देश
अनिल सोनी: 5 लाख रुपये मुआवजा 29 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनिल सोनी की गिरफ्तारी और हिरासत के मामले में राज्य सरकार को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. कोर्ट के मुताबिक उनकी गिरफ्तारी उस समय हुई, जब हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा रहा था. कोर्ट ने संबंधित SHO के खिलाफ डिपार्टमेंटल एक्शन का निर्देश भी दिया और राज्य को मुआवजे की रकम संबंधित अधिकारी से वसूलने की अनुमति दी.
चंदर पाल सिंह: 75 हजार रुपये जून में चंदर पाल सिंह को 24 घंटे से ज्यादा समय तक गैरकानूनी हिरासत में रखने के मामले में हाईकोर्ट ने 25 हजार रुपये प्रति दिन के हिसाब से कुल 75 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया.
मंसूर अहमद: 2 लाख रुपये 10 जून के आदेश में मंसूर अहमद को 8 दिन तक गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने के मामले में 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया गया. कोर्ट ने 25 हजार रुपये प्रति दिन की दर को इसका आधार बनाया.
यासीन मामला: 50 हजार रुपये की कॉस्ट जुलाई में यासीन से जुड़े मामले में पुलिस की ओर से जरूरी जानकारी नहीं देने की वजह से जमानत की सुनवाई में 10 दिन से ज्यादा की देरी हुई. हाईकोर्ट ने इस देरी के लिए राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये की कॉस्ट लगाई.
20 हजार रुपये प्रति माह का मुआवजा
विनोद कुमार सिंह: 20 हजार रुपये प्रति माह का मुआवजा अगस्त में विनोद कुमार सिंह के वाहन को गैरकानूनी तरीके से जब्त करने के मामले में हाईकोर्ट ने वाहन की रिहाई तक 20 हजार रुपये प्रति माह के हिसाब से मुआवजा देने का आदेश दिया. इसके अलावा मानसिक परेशानी, आर्थिक नुकसान और बेवजह परेशान किए जाने के लिए 25 हजार रुपये अतिरिक्त देने को कहा. 5 अगस्त 2026 के आदेश के समय यह मुआवजा करीब 4.75 लाख रुपये बैठ रहा था.
SHO की सैलरी से मुआवजा वसूलने का निर्देश
देवरिया: चार लोगों को 65 हजार रुपये इसी महीने सितंबर में देवरिया के गौरी बाजार थाने में 4 लोगों को कथित तौर पर करीब 10 दिन तक गैरकानूनी हिरासत में रखने के मामले में हाईकोर्ट ने कुल 65 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. कोर्ट ने पुलिस स्टेशन का CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं होने को लेकर SHO और SP से सवाल किए. 4 याचिकाकर्ताओं में 3 को 2020 हजार रुपये और एक को 5 हजार रुपये दिए गए. रकम संबंधित SHO की सैलरी से वसूलने का निर्देश दिया गया
गुंडा एक्ट की कार्रवाई पर 50 हजार रुपये हर्जाना
10 सितंबर को हाईकोर्ट ने अभिषेक त्यागी के खिलाफ उत्तर प्रदेश गुंडा कंट्रोल एक्ट के तहत की गई कार्रवाई को रद्द करते हुए 50 हजार रुपये damages देने का आदेश दिया. कोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक या दो मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को गुंडा नहीं माना जा सकता.
अदालत ने कहा कि अधिकारियों की ऐसी कार्रवाई से लोगों को परेशानी होती है और राज्य को संबंधित अधिकारियों की सैलरी से हर्जाने की रकम वसूलने की अनुमति दी. यह मामला सीधे तौर पर गैरकानूनी हिरासत का नहीं था. इसलिए इसे पुलिस हिरासत से जुड़े मामलों से अलग समझना जरूरी है.
कमलेश कुमार: 5 दिन की गैरकानूनी हिरासत पर 50 हजार रुपये
अभी सितंबर के ताजा मामलों में कमलेश कुमार की याचिका पर हाईकोर्ट ने पाया कि उन्हें 15 अगस्त से 19 अगस्त तक पुलिस हिरासत में रखा गया, जबकि रिकॉर्ड में उनकी गिरफ्तारी 19 अगस्त को दिखाई गई थी. पुलिस अधिकारियों ने कोर्ट के सामने अपनी गलती मानी. कोर्ट ने कहा कि पुलिस की इस चूक की वजह से कुमार को 5 दिन तक जरूरी कानूनी प्रक्रिया के बिना हिरासत में रहना पड़ा. अदालत ने 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और जिम्मेदारी तय होने के बाद रकम की वसूली की प्रक्रिया पूरी करने को कहा.
पुलिस और सरकारी अधिकारियों की प्रक्रिया की जांच
इन आदेशों से यह पता चलता है कि 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने गिरफ्तारी, हिरासत और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़े कई मामलों में पुलिस और सरकारी अधिकारियों की प्रक्रिया की जांच हुई. कमलेश कुमार के मामले में कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों की ओर से गलती माने जाने की बात की सराहना की. साथ ही यह भी साफ किया कि पुलिस की ऐसी चूक की वजह से किसी व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया से बाहर रखकर हिरासत में नहीं रखा जा सकता.



