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​कहानी Silve Fish की, कभी ब्रिटिश राजघराने ने भी माना था इस कारीगरी का लोहा; दिवाली पर क्यों खास हो जाती है?

Hamirpur News: दिवाली आते ही चांदी की मछली की धूम मची है. एकदम जिंदा सी दिखने वाली चांदी की मछली के बिना बुंदेलखंड में दिवाली की पूजा अधूरी मानी जाती है. नतीजतन यहां घरघर में चांदी की मछली खरीदी जाती है. यहां धनतेरस के दिन चांदी की मछली खरीदने का अपना अलग महत्व है. दिवाली में यहां की मछली बुंदेलखंड ही नहीं पूरे देश में धूम मचा देती है.

​कहानी Silve Fish की, कभी ब्रिटिश राजघराने ने भी माना था इस कारीगरी का लोहा; दिवाली पर क्यों खास हो जाती है?

पूरे देश में सिर्फ हमीरपुर जिले के मौदहा कस्बे में एक परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इसको बनाता आ रहा है. मछली बनाने वाले कारीगर राजेश सोनी बताते हैं कि देखने वालों को पहली नजर में अपना दीवाना बना लेने वाली जिंदा सी दिखने वाली यह मछली शुद्ध चांदी से बनती है. दिवाली आते ही इसकी मांग खासी बढ़ जाती है. छोटी से बड़ी हर किस्म की खुबसूरत और दिलकश मछलियां तो पूरे साल बिकती हैं, मगर दिवाली के मौके पर इसकी मांग खासी बढ़ जाती है.

5 ग्राम से लेकर 5 किलो तक के वजन की मछली

राजेश सोनी कहते हैं दिवाली पर इसकी आपूर्ति करने में बनाने वालों को खासी मशक्कत करनी पड़ती है. कारीगर और व्यवसायी राजेन्द्र सोनी बताते हैं कि घरघर के पूजा स्थलों में अपनी पैठ बनाने वाली यह चांदी की मछली 5 ग्राम से लेकर 5 किलो तक के वजन की बाजार में उपलब्ध है, लेकिन पूरे देश में सिर्फ हमीरपुर जिले के मौदहा कस्बे में एक परिवार द्वारा पीढी दर पीढी से बनाई जा रही है.

अगलअलग तरह से उपयोग की जाती है चांदी की मछली

राजेन्द्र सोनी बताते हैं कि अंग्रेजी शासन में जब इस परिवार के बुजुर्गो ने विक्टोरिया राजकुमारी को चांदी की मछली भेंट की थी तो राजकुमारी ने मछली की खूबसूरती को देखकर इन्हें एक मैडल भी दिया था. मछली की इसी कला के कारण इस परिवार का नाम आईने अकबरी पुस्तक में भी दर्ज है. इन मछलियों को लोग अलगअलग तरीके से इस्तेमाल करते हैं. कोई कोट में लगाता है तो कोई कान में पहनता है.

बच्चे इस मछली को गले में पहनते हैं और घरों में ये पूजा स्थलों के अतिरिक्त ड्राइंग रूम की भी शोभा बढ़ती है. आज तक ये मछलियां सिर्फ हाथों से ही बनाई जा रही हैं. हस्त कला और दस्तकारी का यह नायब नमूना किसी को भी अपना दीवाना बना सकता है.

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