राजाओं की प्रशंसा में लिखे गए ग्रंथों की गिनती नहीं है. पर कल्हण जैसे लेखक भी हुए जिन्होंने अपने समय के शासकों की गलतियों, कमजोरियों, दरबारी षड्यंत्रों और अत्याचारों को लिखने से गुरेज नहीं किया. कल्हण यहीं नहीं रुके. उन्होंने अथक शोध बाद सदियों पहले के कश्मीर के राजाओं का इतिहास लिख दिया. कल्हण की कृति राजतरंगिणी की महत्ता यूनेस्को द्वारा उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिए जाने से पता चलती हैं. आखिर इस ग्रंथ में ऐसा क्या है जो उसे यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशियापैसिफिक रीजनल रजिस्टर में शामिल किया गया है?

यह दस्तावेजी विरासत के संरक्षण और उसके वैश्विक महत्व को मान्यता देने वाला रजिस्टर है. 5 नवंबर 2026 को जकार्ता में हुई इसकी 11वीं बैठक में राजतरंगिणी के साथ महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र की पांडुलिपियों को भी स्थान प्राप्त हुआ है.
यूनेस्को ने आखिर क्या खासियत देखी?
यूनेस्को की टिप्पणी में राजतरंगिणी को कश्मीर के सांस्कृतिक सार का भंडार बताया गया है. कल्हण की स्रोतों की जांच पद्धति, कालक्रम निर्धारण और लेखक के नजरिए को यूनेस्को ने दक्षिण एशियाई साहित्य में दुर्लभ ऐतिहासिक चेतना का प्रमाण माना. यह केवल किसी प्रसिद्ध किताब का सम्मान नहीं बल्कि उसकी प्रमाणिकता की स्वीकृति है. ऐसी कृति जो कि कश्मीर की सदियों की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृतियों को संजोए हुए है.
यूनेस्को के “मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड” कार्यक्रम की शुरुआत 1992 में हुई थी. इसका उद्देश्य दुनिया की महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासत को नष्ट होने, बिखरने और समय के साथ भुला दिए जाने से बचाना है. इसके तहत पांडुलिपियों, अभिलेखों और दूसरे महत्वपूर्ण दस्तावेजों को अंतरराष्ट्रीय या क्षेत्रीय पहचान दी जाती है. राजतरंगिणी के साथ इस बार महाभारत की एक दुर्लभ भोजपत्र पांडुलिपि और कौटिल्य के अर्थशास्त्र की ताड़पत्र पांडुलिपि को भी एशियापैसिफिक क्षेत्रीय रजिस्टर में जगह मिली है. इससे पहले भारत की रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयालोकलोचन जैसी कृतियां भी इस क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल हो चुकी हैं.
राजतरंगिणी में कश्मीर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक मिलती है.
कल्हण कौन थे?
कश्मीर में 12वीं सदी में जन्मे कल्हण प्रकांड विद्वान और संस्कृत कवि थे. उनके पिता चंपक, राजा हर्ष के दरबार में मंत्री थे. कल्हण को राजदरबार और सत्ता के गलियारों को करीब से देखने का अवसर मिला था. लेकिन उन्होंने किसी राजा की प्रशस्ति लिखने के बजाय कश्मीर के राजाओं का सिलसिलेवार इतिहास लिखने का बीड़ा उठाया. 114749 ईस्वी के आसपास उन्होंने राजतरंगिणी की रचना की.
संस्कृत में लिखे गए इस ग्रंथ का शाब्दिक अर्थ है राजाओं की नदी. जिस तरह नदी की धारा लगातार आगे बहती है, उसी तरह इसमें कश्मीर के राजाओं और राजवंशों की कहानी आगे बढ़ती है. ग्रंथ में कुल आठ तरंग हैं. इनमें लगभग 7,826 श्लोक हैं. इसकी कथा कश्मीर की प्राचीन परंपराओं और शुरुआती राजाओं से शुरू होकर कल्हण के अपने समय तक पहुंचती है.
अथक श्रमशोध के बाद तटस्थ इतिहास लेखन
कल्हण का लेखन श्रमसाध्य और तटस्थ है.राजतरंगिणी में केवल कश्मीर के राजाओं के नाम और उनके शासनकाल नहीं दर्ज हैं. खासियत यह है कि कल्हण ने ग्रन्थ रचना के लिए दुर्लभ सामग्री खोजी भी. इस विषय पर पहले लिखे गए 11 ऐतिहासिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया. इनमें कई कृतियां अब उपलब्ध नहीं हैं. उन्होंने नीलमत पुराण, पुराने राजकीय अभिलेखों, शिलालेखों, ताम्रपत्रों, भूमि अनुदान के दस्तावेजों, मंदिरों के निर्माण संबंधी रिकॉर्ड और सिक्कों से भी जानकारी जुटाई. इससे पता चलता है कि सैकड़ों साल पहले इतिहास लिखते समय कल्हण ने अन्य लेखकों के लेखन पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया. प्रमाणिकता के लिए उन्होंने हर संभव सूत्रसाक्ष्य जुटाए और फिर किसी नतीजे पर पहुंच उसे दर्ज किया.
उनके इस प्रयास ने राजतरंगिणी को विशिष्ट बनाया. उसमें केवल यह बताने की कोशिश नहीं है कि कौन राजा कब पैदा हुआ और किसके बाद कौन गद्दी पर बैठा? उन राजाओं के समय की घटनाओं, पीछे की परिस्थितियों तथा परिणामों को भी समझने का प्रयास किया गया.
कश्मीर का समग्र प्रमाणिक इतिहास
राजतरंगिणी को केवल राजाओं की वंशावली समझना भूल होगी. इसमें कश्मीर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक भी मिलती है. किसी राजा ने मंदिर बनवाया तो उसका उल्लेख है. किसी ने भूमि दान की तो उसका विवरण है. धार्मिक संस्थाओं, विद्वानों, मंत्रियों, सेनापतियों और महिलाओं की भूमिका भी सामने आती है.इसमें राजमहलों के भीतर की राजनीति है तो जनता पर पड़ने वाले शासन के प्रभाव का भी उल्लेख हैं.
युद्ध, अकाल, प्राकृतिक आपदाएं, सत्ता परिवर्तन और धार्मिक गतिविधियां भी कथा का हिस्सा हैं. कल्हण ने कश्मीर को केवल एक राजसत्ता के रूप में नहीं देखा. उनके विवरण में एक ऐसा समाज दिखाई देता है जिसमें धर्म, राजनीति, संस्कृति और अर्थव्यवस्था एकदूसरे से जुड़े हुए थे. यह कृति आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि उस दौर के कश्मीर को समझने के लिए दूसरे स्रोत बहुत सीमित हैं. कश्मीर से जुड़े कई ऐसे प्रसंग हैं, जिनकी जानकारी राजतरंगिणी से ही मिल पाती है.
Indias timeless wisdom finds its place on the world stage!
The Mahabharata, Rajatarangini by Kalhana and Arthashastra by Kautilya have earned a place in UNESCOs Memory of the World AsiaPacific Regional Register.
A global recognition of India’s extraordinary literary and intellectual heritage.
#UNESCO #IndianHeritage
— MyGovIndia November 6, 2026
इतिहासकार को होना चाहिए न्यायाधीश जैसा निष्पक्ष
आमतौर पर राजशाही के दौर में लिखे जाने वाले ग्रंथों में शासक की वीरता, दानशीलता और उपलब्धियों का बखान मिलता है. कल्हण ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने शासकों के अच्छे कामों के साथ उनकी कमजोरियों, सत्ता संघर्ष, षड्यंत्रों, अत्याचारों और गलत फैसलों का भी उल्लेख किया. उनके लेखन में राजा कोई देवता नहीं, बल्कि खूबियों और कमजोरियों वाला सामान्य मनुष्य है.
राजतरंगिणी के आरंभ में ही वे कहते हैं कि अतीत का वर्णन करते समय लेखक को राग और द्वेष से मुक्त रहना चाहिए. उसकी वाणी न्यायाधीश की तरह निष्पक्ष होनी चाहिए. हालांकि इसे आज के अर्थ में पूरी तरह वैज्ञानिक इतिहास नहीं कहा जा सकता. इसमें काव्यात्मक कल्पना, धार्मिक मान्यताएं और लोकपरंपराएं भी हैं. शुरुआती राजाओं के विवरणों और कालक्रम की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर सवाल उठते रहे हैं. लेकिन उपलब्ध स्रोतों की जांच और निष्पक्षता के प्रयास ने इसे हर दौर की असाधारण रचना बना दिया.



