Satya Report: शेयर बाजार की दुनिया में एक बात अक्सर कही जाती है कि असली मैनेजमेंट की परीक्षा तब होती है, जब मार्केट में उथलपुथल मची हो. वित्त वर्ष 202526 की आखिरी तिमाही ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट का कुछ ऐसा ही कड़ा इम्तिहान लिया. ईरान युद्ध और मिडिल ईस्ट में बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन के कारण कच्चे तेल की सप्लाई लाइन बुरी तरह चरमरा गई थी. ऐसे में देश की सबसे बड़ी प्राइवेट रिफाइनिंग कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपनी फुर्ती और सटीक रणनीति से न सिर्फ इस संकट को पार किया, बल्कि घरेलू बाजार में भी ईंधन की कोई कमी नहीं होने दी. कंपनी के हालिया अर्निंग्स प्रेजेंटेशन से यह साफ हुआ है कि मुश्किल वक्त में लिया गया उनका ‘प्लान बी’ कितना कारगर रहा.

खाड़ी के संकट से कैसे निपटी दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी?
रिलायंस की गुजरात स्थित जामनगर रिफाइनरी दुनिया का सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स है. इसे पूरी क्षमता से चलाने के लिए रोजाना लाखों बैरल क्रूड ऑयल की जरूरत होती है, जिसका एक बड़ा हिस्सा फारस की खाड़ी से आता है. जब ईरान विवाद के कारण इस रूट पर संकट गहराया और सप्लाई बाधित होने का खतरा बढ़ा, तो रिलायंस ने एक पल भी नहीं गंवाया. कंपनी ने तुरंत अपनी निर्भरता खाड़ी देशों से हटाकर दुनिया के दूसरे हिस्सों के सप्लायर्स की तरफ शिफ्ट कर दी. बिजनेस की भाषा में इसे ‘सप्लाई डायवर्सिफिकेशन’ कहते हैं. इसके अलावा, जो कच्चा तेल बीच समंदर में फंसा था, उसे सुरक्षित निकालने के लिए सप्लायर्स के साथ मिलकर रातोंरात नए रूट तैयार किए गए. इस एक फैसले ने रिफाइनरी का कामकाज रुकने से बचा लिया.
लागत कम करने के लिए लॉजिस्टिक्स को ऑप्टिमाइज किया
मार्च की तिमाही बिजनेस के लिहाज से कई बड़े झटके लेकर आई. ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की उपलब्धता कम होने से दाम तो रिकॉर्ड स्तर पर थे ही, साथ ही माल ढुलाई और इंश्योरेंस का खर्च भी आसमान छूने लगा था. इसके ऊपर, घरेलू बाजार में स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी के फिर से लागू होने से कंपनी के मुनाफे पर सीधा असर पड़ रहा था. एक बिजनेस नजरिए से देखें तो यह किसी भी कंपनी के लिए दोहरी मार थी. लेकिन रिलायंस ने अपनी लागत कम करने के लिए लॉजिस्टिक्स को ऑप्टिमाइज किया. कई छोटे कार्गो मंगाने की बजाय उन्हें एक साथ मिलाकर मंगाया गया. साथ ही, रिफाइनरी में ग्रिड पावर का इस्तेमाल बढ़ाकर बिजली का खर्च घटाया गया, जिससे कंपनी की बैलेंस शीट पर ज्यादा डेंट नहीं पड़ा.
आम कंज्यूमर को कैसे मिली राहत?
जब भी ग्लोबल सप्लाई चेन बिगड़ती है, तो सबसे पहली मार आम कंज्यूमर पर पड़ती है. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में रिलायंस ने घरेलू बाजार की जरूरतों को प्राथमिकता पर रखा. कंपनी ने अपनी सप्लाई चेन को इस तरह रीडिजाइन किया कि भारत के लोकल मार्केट में पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की कोई किल्लत न हो. आम आदमी की रसोई गैस की बढ़ती मांग को देखते हुए कंपनी ने प्रोपेन और ब्यूटेन की सप्लाई को एलपीजी उत्पादन की ओर मोड़ दिया. इसके अलावा, प्राथमिकता वाले सेक्टर्स को केजीडी6 गैस की सप्लाई लगातार जारी रखी गई. इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि इस भारी अंतरराष्ट्रीय संकट के बावजूद देश के अंदर पेट्रोल पंपों या गैस एजेंसियों पर कोई पैनिक देखने को नहीं मिला.
क्या कहता है एनर्जी मार्केट का आउटलुक?
रिलायंस मैनेजमेंट का साफ मानना है कि आने वाले दिनों में ग्लोबल एनर्जी मार्केट में वोलैटिलिटी जारी रह सकती है. साल 2026 में दुनिया भर में तेल की डिमांड में मामूली गिरावट आने का अनुमान है. हालांकि, नई रिफाइनरियों की क्षमता भी बहुत सीमित गति से बढ़ रही है, इसलिए फ्यूल क्रैक्स ऊंचे स्तर पर बने रह सकते हैं.



