
दुनिया की हर जगह की अपनी एक अलग पहचान होती है. कहीं प्रकृति ने हरी-भरी वादियां बिछाई हैं तो कहीं बर्फीली चोटियां मन मोह लेती हैं. कुछ स्थान अपने खान-पान की विविधता से प्रसिद्ध हैं तो कुछ अपनी ऐतिहासिक इमारतों के कारण. झारखंड राज्य का कोडरमा जिला अपनी धरती की चमक से पहचाना जाता है. यहां जमीन की खुदाई करते ही आंखें चौंधिया जाती हैं क्योंकि नीचे चमकदार अभ्रक यानी माइका के पत्थर भरे पड़े हैं.
इन चमकीले पत्थरों को दुनिया भर में भेजा जाता था और आज भी कोडरमा की पहचान इन्हीं से जुड़ी हुई है. कोडरमा को कभी भारत की अभ्रक राजधानी या अब्रख नगरी कहा जाता था. यह जिला छोटा नागपुर पठार का हिस्सा है और यहां की भूगर्भीय संरचना में अभ्रक की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. अभ्रक एक खास तरह का खनिज है जो परतदार और चमकदार होता है. इसे आसानी से पतली चादरों में अलग किया जा सकता है. इसकी चमक इतनी तेज होती है कि धूप में या रोशनी में देखने पर आंखें चकाचौंध हो जाती हैं. स्थानीय लोग इसे अब्रख कहते हैं. इस जिले का इतिहास भी उतना ही दिलचस्प है जितना इसका खनिज भंडार.
चमकीला है इतिहास
ब्रिटिश काल में उन्नीसवीं सदी के मध्य में यहां वैज्ञानिक तरीके से अभ्रक खनन की शुरुआत हुई थी. 1843 के आसपास कोडरमा गवर्नमेंट एस्टेट में संगठित खनन शुरू हुआ. यूरोपीय उद्यमी एफएफ क्रिस्टियन ने यहां विस्फोटकों का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर निकालना शुरू किया. उन्होंने देखा कि अभ्रक की इंसुलेशन क्वालिटी एस्बेस्टस से भी बेहतर है. लंदन में सैंपल भेजने के बाद इसकी कीमत आसमान छूने लगी. धीरे-धीरे स्थानीय व्यापारियों ने भी इस कारोबार में कदम रखा. वैश्य बंधु छठू राम और होरील राम जैसे लोगों ने दो विश्व युद्धों के बीच विशाल खनन और निर्यात का नेटवर्क खड़ा कर दिया. बीसवीं सदी के मध्य तक भारत दुनिया के अभ्रक बाजार पर लगभग राज करता था. 1940 और 1950 के दशक में भारत विश्व की मांग का बड़ा हिस्सा पूरा करता था. कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग और आसपास के इलाके मिलकर ग्रेट माइका बेल्ट बनाते थे जो करीब 160 किलोमीटर लंबा और 25 से 40 किलोमीटर चौड़ा था. कोडरमा क्षेत्र इसमें सबसे महत्वपूर्ण था.
उच्च क्वालिटी का माल
कोडरमा में उच्च गुणवत्ता वाला रूबी माइका मिलता था जो इलेक्ट्रॉनिक्स और विद्युत उद्योग के लिए बेहद कीमती माना जाता था. अभ्रक के उपयोग कई क्षेत्रों में होते हैं. यह बिजली का अच्छा कुचालक है इसलिए पुराने समय में रेडियो, टीवी, हीटर, माइक्रोवेव और अन्य उपकरणों में इंसुलेटर के रूप में इस्तेमाल होता था. आज भी कॉस्मेटिक्स में चमक पैदा करने, पेंट्स, प्लास्टिक और कुछ विशेष औद्योगिक अनुप्रयोगों में इसकी मांग बनी हुई है. इसकी रासायनिक स्थिरता और गर्मी सहन करने की क्षमता इसे खास बनाती है. 1970 और 1980 के दशक में कोडरमा में सैकड़ों खदानें सक्रिय थीं. दिबौर घाटी और नीरू पहाड़ी जैसे इलाके प्रमुख केंद्र थे. हजारों मजदूर इन खदानों में काम करते थे. क्लियर माइका की कीमत उस समय प्रति किलो 15 रुपये से लेकर हजारों रुपये तक पहुंच जाती थी. झुमरी तिलैया कस्बा अभ्रक व्यापार का बड़ा केंद्र बन गया था. निर्यात से अच्छी आमदनी होती थी और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत थी. लेकिन 1980 में वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद स्थिति बदल गई. अधिकांश खदानें घने जंगलों और बाद में घोषित वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्रों में स्थित थीं. पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी खनन बंद कर दिया गया. आधिकारिक रूप से बड़े पैमाने का औद्योगिक खनन रुक गया. इसके बाद उत्पादन में भारी गिरावट आई. आज आधिकारिक आंकड़ों में झारखंड से अभ्रक उत्पादन लगभग ना के बराबर दर्ज होता है जबकि आंध्र प्रदेश और राजस्थान आधिकारिक उत्पादन में आगे हैं. फिर भी कोडरमा की धरती में अभ्रक की उपस्थिति बनी हुई है. कुछ क्षेत्रों में छोटे पैमाने पर संग्रहण की गतिविधियां चलती रही हैं.



