उत्तर प्रदेश की घोसी, दुद्धी और फरीदपुर विधानसभा सीटें पिछले कई महीनों से खाली पड़ी हैं, लेकिन इन पर उपचुनाव नहीं कराए जाने को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है. आमतौर पर किसी सीट के खाली होने के बाद चुनाव आयोग कुछ समय के भीतर उपचुनाव कराता है, लेकिन इस बार देरी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

समाजवादी पार्टी इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को घेर रही है. सपा का आरोप है कि बीजेपी को संभावित हार का डर सता रहा है, इसलिए जानबूझकर उपचुनाव टाले जा रहे हैं. पार्टी का कहना है कि अगर चुनाव होते हैं तो जनता का मूड बीजेपी के खिलाफ जा सकता है, जिससे 2027 के विधानसभा चुनावों पर भी असर पड़ेगा.
तीनों सीटें आसानी से जीत सकती है बीजेपी
वहीं भारतीय जनता पार्टी प्रवक्ता हीरो बाजपेई का कहना है कि चुनाव कराना पूरी तरह चुनाव आयोग का काम है और पार्टी हर चुनाव के लिए तैयार है. बीजेपी नेताओं का दावा है कि वे तीनों सीटें आसानी से जीत सकते हैं. हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि अंदरखाने बीजेपी उपचुनाव से बचना चाहती है, क्योंकि किसी भी हार की स्थिति में उसका राजनीतिक नैरेटिव प्रभावित हो सकता है और संगठन को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी.
समय पर उपचुनाव कराना संभव नहीं
चुनाव आयोग की ओर से भी संकेत दिए गए हैं कि हाल के महीनों में कुछ राज्यों में चल रहे चुनावी कार्यक्रमों और प्रशासनिक व्यस्तताओं के कारण समय पर उपचुनाव कराना संभव नहीं हो सका. साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि अब आम चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है, ऐसे में अलग से उपचुनाव कराने पर पुनर्विचार किया गया है.
चुनाव आयोग और सरकार पर सवाल
इस पूरे मामले पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी चुनाव आयोग और सरकार पर सवाल उठाए हैं. उनका आरोप है कि अगर उपचुनाव होते तो बीजेपी प्रशासनिक मशीनरी और सुरक्षा बलों के सहारे चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश करती. उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी हार के डर से चुनाव से बच रही है.
उपचुनाव न कराए जाने के पीछे वजह
दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उपचुनाव न कराए जाने के पीछे कई प्रशासनिक और रणनीतिक कारण हो सकते हैं, लेकिन इसका सीधा असर राजनीतिक बहस पर पड़ रहा है. विपक्ष इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़कर देख रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे चुनाव आयोग का निर्णय बता रहा है.


