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​मानसून की बेरुखी और सूखे का बड़ा असर! फसलों को भारी नुकसान, अब विदेश से मंगवाना होगा खाने-पीने का सामान

देश में सूखे के कारण सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलों का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है. खाद्य तेल का आयात 1.75 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जबकि पोल्ट्री उद्योग ने सोयाबीन मील और मक्का के आयात की अनुमति मांगी है. भारत में इस वित्त वर्ष कृषि उत्पादन पर सूखे का असर दिखाई देने लगा है. घरेलू बाजार में खाद्य पदार्थों और पशु आहार की सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं. ऐसे में देश को खाने के तेल, सोयाबीन मील, मक्का, चीनी और दूसरे कृषि उत्पादों का आयात बढ़ाना पड़ सकता है.

​मानसून की बेरुखी और सूखे का बड़ा असर! फसलों को भारी नुकसान, अब विदेश से मंगवाना होगा खाने-पीने का सामान

ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, खरीफ सीजन में सोयाबीन और मूंगफली की फसल प्रभावित होने से खाद्य तेल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है. दूसरी ओर, पोल्ट्री उद्योग पशु आहार की बढ़ती लागत से परेशान है और सरकार से सोयाबीन मील तथा मक्का के आयात की अनुमति देने की मांग कर रहा है. इसका असर केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा. खाद्य तेल, चिकन, अंडे और दूसरे खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है. हालांकि, कीमतें कितनी बढ़ेंगी, यह घरेलू उत्पादन, अंतरराष्ट्रीय बाजार, आयात नीति और सरकार के फैसलों पर निर्भर करेगा.

बढ़ सकता है इंपोर्ट

इस मामले से जुड़े लोगों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में भारत द्वारा खाद्य पदार्थों, पशु चारे और कृषि कच्चे माल का आयात बढ़ने की संभावना है. सूखे के कारण फसलों के उत्पादन में कमी आई है, जिससे सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. वहीं, उद्योग जगत अपनी कॉस्ट को कंट्रोल करने के लिए आयात को आसान बनाना चाहता है. खरीफ सीजन में सोयाबीन और मूंगफली के उत्पादन में गिरावट की आशंका है, जिससे खाद्य तेल का आयात बढ़ सकता है. इसके अलावा, सर्दियों में होने वाली सरसों की फसल को लेकर भी चिंताएं बनी हुई हैं. चीनी उद्योग को पहले ही कच्चे चीनी के आयात के लिए समयसीमा बढ़ाने की मंजूरी मिल चुकी है. पोल्ट्री उद्योग सोयाबीन मील और मक्के के आयात की अनुमति मांग रहा है, जबकि कपड़ा निर्माता कपास पर आयात शुल्क हटाने की मांग कर रहे हैं. स्टार्च उद्योग को डर है कि अगर मक्के का एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में चला गया, तो उन्हें चीन से और अधिक स्टार्च आयात करना पड़ सकता है.

अलनीनो ने डाला असर

कृषि पर ‘अलनीनो’ के असर के कारण भारतीय रसोई में आयातित जरूरी खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी बढ़ सकती है. अब तक के सबसे शक्तिशाली ‘अलनीनो’ ने दाल, चीनी, तिलहन और धान जैसी आवश्यक फसलों के उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है. अफ्रीका के सबसे कम विकसित देशों से भारत का सोयाबीन आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, क्योंकि पिछले साल अत्यधिक बारिश के कारण फसल प्रभावित हुई थी. इस वित्त वर्ष में भी सोयाबीन की कमी बनी रहने की आशंका है. मराठवाड़ा, विदर्भ, तेलंगाना और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में सूखे के कारण फसलें सूख गई हैं.

किसानों को हो सकता है नुकसान

‘कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन’ के पूर्व अध्यक्ष, दिव्या कुमार गुलाटी ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि हमने सरकार से 30 लाख टन सोयाबीन मील के आयात की अनुमति मांगी है. पोल्ट्री चारे में 80% हिस्सा सोयाबीन मील और मक्के का होता है, और फसल कटाई का समय होने के बावजूद इनकी कीमतें पहले से ही बहुत अधिक हैं. उन्होंने आगे कहा कि अगर हम आयात की अनुमति नहीं देते हैं, तो पोल्ट्री उत्पादों की कीमतें बेतहाशा बढ़ सकती हैं और किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन के ताजा अनुमान के अनुसार, इस साल खरीफ मूंगफली के उत्पादन में 20% से अधिक की गिरावट आ सकती है. कमोडिटी ब्रोकरेज हाउस ‘सनविन ग्रुप’ के CEO संदीप बाजोरिया ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि हमें उम्मीद है कि खाद्य तेल का कुल आयात 202526 के 16.5 मिलियन टन से बढ़कर 202627 में 17.5 मिलियन टन हो जाएगा. इसकी वजह है कि हमें घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन पर सूखे के असर का सामना करना पड़ रहा है. सटीक आंकड़े जानने के लिए हमें सरसों की फसल के उत्पादन का इंतजार करना होगा.

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