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लखनऊ समिट बिल्डिंग साइबर केस में बड़ा उलटफेर ! 119 गिरफ्तारियां, चार आरोपियों को जमानत और अब पुलिस की कार्रवाई पर बड़े सवाल!

लखनऊ, अमृत विचार। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चर्चित समिट बिल्डिंग अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड केस में 19 अगस्त को उस वक्त बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मामले में चार आरोपियों को जमानत दे दी। सबसे खास बात यह है कि इसी मामले में लखनऊ पुलिस ने एक साथ 119 लोगों को आरेस्ट कर बड़े संगठित साइबर अपराध नेटवर्क का खुलासा करने का दावा किया था।

लेकिन अब अदालत में हुई सुनवाई और पुलिसकर्मियों पर हुई कार्रवाई के बाद पूरी गिरफ्तारी और विवेचना की प्रक्रिया सवालों के घेरे में है। मामले में हैबियस कॉर्पस की सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्रवाई और गिरफ्तारियों को लेकर गंभीर सवाल सामने आए। अदालत के आदेश के बाद तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित और छह को लाइन हाजिर किया गया। इससे मामले की जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर सवाल और गहरे हो गए हैं।

119 गिरफ्तारियां, फिर पुलिस कार्रवाई पर ही सवाल

लखनऊ पुलिस ने जिस कार्रवाई को बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध नेटवर्क के भंडाफोड़ के तौर पर पेश किया था, उसी मामले में अब प्रक्रियात्मक चूक, जांच में जल्दबाजी और कथित घूसखोरी से जुड़े आरोपों ने कार्रवाई की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले का एक अहम पहलू यह भी है कि 119 लोगों की गिरफ्तारी के बाद कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने मीडिया के सामने इस कार्रवाई और कथित साइबर अपराध के खुलासे को बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रस्तुत किया था। अब जब पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई हो चुकी है और चार आरोपियों को अदालत से जमानत मिल गई है, तो सवाल उठ रहा है कि उस पूरी कार्रवाई की जवाबदेही आखिर किस स्तर पर तय होगी?

क्या सिर्फ निलंबन से खत्म हो जाएगी जवाबदेही?

मामले में तीन पुलिसकर्मियों के निलंबन और छह को लाइन हाजिर किए जाने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि जिस कार्रवाई को वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में बड़ी सफलता बताया गया था, उसकी जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित रहेगी या पूरे घटनाक्रम की उच्चस्तरीय समीक्षा भी होगी।

कोर्ट में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर क्या कहा गया?

19 अगस्त के जमानत आदेश में अदालत ने इस बात पर गौर किया कि लैपटॉप, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जांच एजेंसी पहले ही अपने कब्जे में ले चुकी है। अदालत के समक्ष आगे हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता पर्याप्त रूप से प्रदर्शित नहीं की जा सकी। अदालत ने माना कि अभियोजन जिन महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर भरोसा कर रहा है, वे पहले ही सुरक्षित किए जा चुके हैं। ऐसे में लगातार हिरासत में रखने का कोई सार्थक उद्देश्य स्पष्ट नहीं हुआ। अदालत ने आरोपियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 21 के अधिकार को भी ध्यान में रखा।

मजबूत कानूनी पैरवी से आरोपियों के पक्ष को मिली मजबूती

आरोपियों की ओर से अधिवक्ता ईशान बघेल, निश्चल वर्मा, सागर सिंह, पार्थ सिंह और दीपेश सिंह तथा उनके सहयोगी अजय, रामेंद्र और नमन प्रताप सिंह ने अदालत के समक्ष प्रभावी पैरवी की। कानूनी पक्ष की ओर से पुलिस की कार्रवाई और हिरासत की आवश्यकता से जुड़े पहलुओं को अदालत के सामने रखा गया।

अब सबसे बड़ा सवाल119 गिरफ्तारियों की जवाबदेही किसकी?

समिट बिल्डिंग साइबर केस में अब सवाल केवल साइबर अपराध के आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह भी है कि 119 लोगों को एक साथ गिरफ्तार करने के पीछे पुलिस के पास क्या ठोस आधार था और जांच की प्रक्रिया में हुई कथित खामियों की जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

एक तरफ 119 गिरफ्तारियां, बड़े पुलिसिया दावे और मीडिया में कार्रवाई का प्रचार हुआ। दूसरी तरफ तीन पुलिसकर्मी निलंबित हुए, छह लाइन हाजिर किए गए और अब चार आरोपियों को अदालत से जमानत मिल गई है। ऐसे में समिट बिल्डिंग मामला अब साइबर अपराध के खुलासे के साथसाथ पुलिस कार्रवाई, जांच की निष्पक्षता और जवाबदेही का भी बड़ा सवाल बन गया है।

 

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