नई दिल्ली। दिल्ली विकास प्राधिकरण ने वित्त वर्ष 202627 की पहली तिमाही में 1,020 करोड़ रुपये की कमाई की है, जो पिछले साल की इसी तिमाही से 120 प्रतिशत ज्यादा है। इस दौरान कुल 1,284 फ्लैट बिके हैं। ऊपर से देखने में यह आंकड़े भले बड़े लगते हैं, लेकिन जमीन पर इसकी कहानी कुछ अलग है। इस बार की पूरी बिक्री केवल एक ही इलाके के भरोसे रही है। कुल बिके फ्लैटों में से 90 प्रतिशत सिर्फ नरेला में बिके हैं।

बुनियादी सुधारों से पलटी नरेला की किस्मत
नरेला में अचानक आई इस तेजी के पीछे उन पुरानी खामियों को दूर करना है, जिनकी वजह से सालों से यहाँ फ्लैट बिक नहीं रहे थे। दिल्ली के पूर्व एलजी और डीडीए के अध्यक्ष पूर्व वीके सक्सेना ने इन कमियों को दूर करने के लिए कई कड़े कदम उठाए। सुरक्षा के लिए य विशेष तौर पर पुलिस चौकी और स्टेशन शुरू करवाए गए, साथ ही कनेक्टिविटी सुधारने के लिए डीटीसी बसों के नए रूट तय किए गए।
मेट्रो के नरेला तक विस्तार के लिए डीडीए द्वारा डीएमआरसी को फंड भी जारी करवाया गया। इसके अलावा, खरीदारों को आकर्षित करने के लिए फ्लैटों की कीमतों में लगातार 25 प्रतिशत तक की छूट की स्कीम लाई गई और यहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्टेडियम बनाने के लिए निविदाएं भी आमंत्रित कर ली गई हैं। इन प्रशासनिक सुधारों और यूईआरII सड़क के निर्माण से लोगों का भरोसा जगा है, जिससे अब नरेला के फ्लैट बिकने लगे हैं और डीडीए के राजस्व में यह बड़ा उछाल आया है।
पाश इलाकों में स्टाक की कमी और एचआइजी में चुनौती
एलजी के प्रयासों से नरेला में बिक्री तो बढ़ी है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि पॉश दिल्ली में नया स्टॉक न होने के कारण डीडीए की पूरी कमाई अब केवल बाहरी दिल्ली के इन किफायती फ्लैटों पर ही टिक गई है। इस तिमाही में मध्यम वर्ग के 435 फ्लैट बिके हैं, जबकि उच्च वर्ग में सिर्फ 191 फ्लैट ही बिक पाए। इससे साफ है कि महंगे फ्लैटों के मामले में लोग अब भी डीडीए के बजाय प्राइवेट बिल्डरों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
स्टाक निकालने की कोशिश, लंबा रास्ता तय करना बाकी
नजरिये के तौर पर देखें तो यह भारी राजस्व डीडीए की किसी पूरी तरह से नई व्यावसायिक सफलता से ज्यादा, उसके सालों से डंप पड़े स्टॉक को निकालने की एक सोचीसमझी रणनीति को दिखाता है। डीडीए ने ‘पहले आओपहले पाओ’ जैसी ऑनलाइन स्कीम शुरू करके और इसकी तारीख को 31 जुलाई, 2026 तक बढ़ाकर अपने उन पुराने फ्लैटों को निकालने की कोशिश की है जो सालों से धूल खा रहे थे।
बुनियादी सुधारों, ‘तुरंत कब्जा’ और ‘फ्रीहोल्ड’ के आकर्षक विकल्पों के कारण कम बजट वाले खरीदारों को एक सुरक्षित ठिकाना जरूर मिल गया है, लेकिन डीडीए के पास खाली फ्लैटों का जो भारी स्टॉक जमा है, उसे पूरी तरह से खत्म करने में अभी लंबा समय लगेगा।


